आदि पर्व
अध्याय
३९
सूत उवाच
निवृत्ते काश्यपे तस्मिन्समय़ेन महात्मनि |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
निवृत्ते च सत्रे सरस्वत्यभिगम्य तं भर्तारं वरय़ामास |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
निवृत्ते चैव नो युद्धे प्रीतिश्च स्यात्परस्परम् |
२७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
निवृत्ते तु ततः कर्णे नकुलः कौरवान्ययौ ||
३८ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
निवृत्ते तु तदा देवा विषादमगमन्परम् |
५१ क
सभा पर्व
अध्याय
४५
दुर्योधन उवाच
निवृत्ते त्वय़ि राजेन्द्र मरिष्येऽहमसंशय़म् ||
४३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
निवृत्ते नैमिषेय़े वै सत्रे द्वादशवार्षिके |
४० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
निवृत्ते पौरवर्गे तु राजा सान्तःपुरस्तदा |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४४
धृतराष्ट्र उवाच
निवृत्ते भीमसेने च पाण्डवे च युधिष्ठिरे |
१ क
वन पर्व
अध्याय
१०२
लोमश उवाच
निवृत्ते मय़ि शैलेन्द्र ततो वर्धस्व कामतः ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
निवृत्ते युधि गाङ्गेय़े न्यस्तशस्त्रे च भारत ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३३
वैशम्पाय़न उवाच
निवृत्ते विदुरे चैव भीष्मे पौरजने तथा |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
२१९
वैशम्पाय़न उवाच
निवृत्तेषु तु देवेषु वागुवाचाशरीरिणी |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
निवृत्तेषु तु पाण्डूनां पुनः सैन्येषु भारत |
३० क
वन पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
निवृत्तेषु तु पौरेषु रथानास्थाय़ पाण्डवाः |
३९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
निवृत्तैश्च तथा पार्थैर्भग्नं शत्रुवलं महत् ||
३ ग
वन पर्व
अध्याय
२६३
मार्कण्डेय़ उवाच
निवृत्तो ददृशे धीमान्भ्रातरं लक्ष्मणं तदा ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
वैशम्पाय़न उवाच
निवृत्तो नारदो राजंस्तरसा मेरुमागमत् |
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
निवृत्तोऽभिमुखो राजन्येन नागाह्वय़ं पुरम् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९७
भीष्म उवाच
निवृत्तौ वा प्रवृत्तौ वा सम्प्रधार्य गुणागुणान् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५५
भीष्म उवाच
निवृत्त्या वर्तमानस्य तपो नानशनात्परम् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
निवृत्तय़ज्ञस्वाध्याय़ा निर्वषट्कारमङ्गला ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०२
नारद उवाच
निवृत्तय़ज्ञस्वाध्याय़ा प्रणष्टनृपतिद्विजा |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
निवृत्तय़ज्ञस्वाध्याय़ाः पिण्डोदकविवर्जिताः |
२७ क
सभा पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
निवृत्य च महावाहुर्मदर्वीकं महीधरम् |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
निवृत्य तु महावीर्यौ समुच्छ्रितगदावुभौ |
१९ क
सभा पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
निवृत्योपय़युः सर्वे स्वपुरं पुरुषर्षभाः |
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
निवेदनः सुधाजातः सुगन्धारो महाधनुः ||
१२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७६
अम्वो उवाच
निवेदितं मय़ा ह्येतद्दुःखमूलं यथातथम् |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
भीष्म उवाच
निवेदितं व्रह्मलोके व्रह्मणो यत्पुराभवत् ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
निवेद्य धर्मराजस्य त्वमानृण्यं गमिष्यसि ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
भीष्म उवाच
निवेद्य नाम गोत्रं च पितरं च नरर्षभ |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
निवेद्य नामधेय़े स्वे तस्य पादावगृह्णताम् ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
२७३
मार्कण्डेय़ उवाच
निवेद्य पुनरागच्छत्त्वरय़ाजिशिरः प्रति ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
निवेद्य मानसं चापि तूष्णीमासन्नवाङ्मुखाः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
निवेद्य शिष्यमात्मानं तस्थौ प्राञ्जलिरग्रतः ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
निवेद्य सर्वमृषय़े सत्कारेण सुवर्चसे ||
३७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
निवेद्य स्वस्थवद्राजन्नास्ते राजा युधिष्ठिरः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
५६
वृहदश्व उवाच
निवेद्यतां नैषधाय़ सर्वाः प्रकृतय़ः स्थिताः |
१३ क
सभा पर्व
अध्याय
४४
दुर्योधन उवाच
निवेदय़ यथान्याय़ं नाहं शक्ष्ये निशंसितुम् ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
निवेदय़त मां क्षिप्रं धनदाय़ेति चाव्रवीत् ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३०
वैशम्पाय़न उवाच
निवेदय़ति नित्यं हि मम राज्यं धृतव्रतः ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
निवेदय़न्ति स्म च ते भैक्षं कुन्त्याः सदा निशि |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१३३
अष्टावक्र उवाच
निवेदय़स्व मां द्वाःस्थ राज्ञे पुष्करमालिने ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३४
वैशम्पाय़न उवाच
निवेदय़ामास गृहं शिवाख्यमशिवं तदा ||
११ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
निवेदय़ामास च तद्धर्मराजचिकीर्षितम् |
५४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
निवेदय़ामास तदा गृहान्राज्यं च कौरवः ||
९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
निवेदय़ामास तदा जनं तं नामगोत्रतः |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
निवेदय़ामास तदा तस्मै राज्ञे व्यथान्वितः ||
२६ ख
सभा पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
निवेदय़ामास तदा धर्मराजाय़ तद्धनम् ||
२८ ख