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अनुशासन पर्व
अध्याय ९२
भीष्म उवाच
निवापान्नेन पीड्यामः श्रेय़ो नोऽत्र विधीय़ताम् ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९२
पितर ऊचुः
निवापान्नेन भगवन्भृशं पीड्यामहे वय़म् |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९२
अग्निरु उवाच
निवापे नोपतिष्ठेत सङ्ग्राह्या नान्यवंशजाः ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९१
भीष्म उवाच
निवापे हव्यकव्ये वा गर्हितं च श्वदर्शनम् |
४२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९२
भीष्म उवाच
निवापैर्दीय़मानैश्च चातुर्वर्ण्येन भारत |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
निवापो दानसदृशस्तादृशेषु युधिष्ठिर |
२१ क
वन पर्व
अध्याय ५६
वृहदश्व उवाच
निवारणेऽभवच्छक्तो दीव्यमानमचेतसम् ||
१० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७५
वैशम्पाय़न उवाच
निवारितं गजं दृष्ट्वा भगदत्तात्मजो नृपः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
निवारितास्तु ते वीरास्तय़ोः पुरुषसिंहय़ोः |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७५
सञ्जय़ उवाच
निवारिते द्विषत्सैन्ये कृते च शरवेश्मनि ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
निवार्य कृतवर्माणं सात्यकिः प्रय़यौ ततः ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
निवार्य च रणे विप्रो धृष्टकेतुमय़ोधय़त् ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३४
सञ्जय़ उवाच
निवार्य च शरौघांस्तान्पार्थिवानां महारथः |
२४ क
सभा पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
निवार्य तं महावाहुं कोपसंरक्तलोचनम् |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
निवार्य तांस्तूर्णममित्रघाती; नप्ता शिनेः पत्रिभिरग्निकल्पैः |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
निवार्य तु रणे द्रोणो युय़ुधानं महारथम् |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
सञ्जय़ उवाच
निवार्य परमेष्वासौ क्रोधसंरक्तलोचनौ |
६२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
निवार्य पाण्डुपाञ्चालान्द्रोणाग्निः प्रदहन्निव |
३५ क
वन पर्व
अध्याय १२
विदुर उवाच
निवार्य भीमो जिष्णुं तु तद्रक्षो घोरदर्शनम् |
४१ क
आदि पर्व
अध्याय १२५
वैशम्पाय़न उवाच
निवार्य वादित्रगणं महामेघनिभस्वनम् ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
निवार्य समरे चापि शरांस्तान्निशितैः शरैः |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
निवार्य सेनां महतीं हत्वा शूरांश्च पार्थिवान् |
४४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७०
सञ्जय़ उवाच
निवार्य सैन्यं वाहुभ्यामिदं वचनमव्रवीत् ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २
वलदेव उवाच
निवार्यमाणश्च कुरुप्रवीरैः; सर्वैः सुहृद्भिर्ह्ययमप्यतज्ज्ञः |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
निवार्यमाणा भीमेन पश्यतोः कृष्णपार्थय़ोः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७०
सञ्जय़ उवाच
निवार्यमाणेनास्माभिरनुगन्तुं तदेषिताः ||
३५ ख
शल्य पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
निवार्यमाणो वहुभिर्द्रौपद्याः प्रिय़मास्थितः ||
४९ ग
वन पर्व
अध्याय १७२
वैशम्पाय़न उवाच
निवार्याथ ततः पार्थं सर्वे देवा यथागतम् |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
निवार्यार्जुनदाय़ादो जघान समरे हय़ान् ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५१
सञ्जय़ उवाच
निवारय़ वलं सर्वं वय़ं योत्स्याम पाण्डवान् ||
९ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
निवारय़ सुतान्द्यूतात्पाण्डवान्मा द्रुहेति च |
१० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
निवारय़न्तं कृच्छ्रात्ताञ्श्वापदान्सञ्चिखादिषून् |
५ क
वन पर्व
अध्याय १७
वासुदेव उवाच
निवारय़न्तं सङ्ग्रामे वलात्सौभं सराजकम् ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३५
सञ्जय़ उवाच
निवारय़न्तौ वाणौघैः परस्परममर्षिणौ |
३८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७५
वैशम्पाय़न उवाच
निवारय़ामास तदा वेलेव मकरालय़म् ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
निवारय़ामास तदा स्वान्यनीकानि मारिष ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय १८१
वैशम्पाय़न उवाच
निवारय़ामास महीपतींस्ता; न्धर्मेण लव्धेत्यनुनीय़ सर्वान् ||
३२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
निवारय़ामास वलादनुपत्य विशां पते |
३८ ख
वन पर्व
अध्याय १०२
लोमश उवाच
निवारय़ामासुरुपाय़तस्तं; न च स्म तेषां वचनं चकार ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
निवारय़ितुमप्याजौ त्वदीय़ाः कुरुपुङ्गवाः ||
२ ग
भीष्म पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
निवारय़िष्यामि रणे साधय़स्व पितामहम् ||
५८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
निवारय़िष्यामि हि कर्णमप्यहं; यदा भवान्सप्रणय़ो भविष्यति ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय २१५
वैशम्पाय़न उवाच
निवारय़ेय़ं येनेन्द्रं वर्षमाणं महावने ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय १९९
वैशम्पाय़न उवाच
निवासं रोचय़न्ति स्म सर्वभाषाविदस्तथा ||
३७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
निवासमकरोत्सर्वो यथाप्रीति यथासुखम् ||
२१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
निवासमकरोद्धीमान्सस्त्रीवृद्धपुरःसरः ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय २६४
मार्कण्डेय़ उवाच
निवासमकरोद्धीमान्सुग्रीवेणाभ्युपस्थितः ||
४० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
निवासमकरोद्राजा विदुरस्य मते स्थितः ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
उमो उवाच
निवासा वहुरूपास्ते विश्वरूपगुणान्विताः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
निवासार्थाय़ यद्युक्तं भवेद्वः पृथिवीपते ||
३१ ख