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शान्ति पर्व
अध्याय १०६
मुनिरु उवाच
निन्द्यास्य मानुषं कर्म दैवमस्योपवर्णय़ |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय १४०
भीष्म उवाच
निन्दय़ा परविद्यानां स्वां विद्यां ख्यापय़न्ति ये |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४६
सञ्जय़ उवाच
निन्ये च चतुरो वाहान्यमस्य सदनं प्रति ||
३४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
निन्ये हय़ांश्चैव तथा ससादी; न्पदातिसङ्घांश्च तथैव पार्थः ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
निपतद्भिर्गजै राजन्नरैश्चापि सहस्रशः |
३८ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
निपतद्भिर्महावेगैर्हंसैरिव महत्सरः |
१५ ख
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
निपतद्भिश्च तैर्घोरैर्देवानीकं महाय़ुधैः |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
निपतद्भिस्तथा तैश्च हय़सङ्घैः परस्परम् |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
निपतन्तमपश्याम गिरिशृङ्गमिवाहतम् ||
५७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
निपतन्ति तथा भूमौ स्फुरन्ति च सहस्रशः |
२५ क
कर्ण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
निपतन्ती महोल्केव व्यराजच्छिखिसंनिभा ||
२३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
निपतन्त्या महाराज पृथिवी समकम्पत ||
३८ ख
आदि पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
निपतन्प्रच्युतः स्वर्गादप्राप्तो मेदिनीतलम् |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
निपतेय़ं क्व नु श्रान्त इति तस्मिञ्जलार्णवे ||
४० ग
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
निपतेय़ुः सपत्नेषु विक्रमत्स्वपि भारत ||
५३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
निपत्य रथसङ्घानामन्तरेण विनिःसृतः |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
निपत्य शिरसा भूमौ प्राञ्जलिर्भरतर्षभ ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
वैशम्पाय़न उवाच
निपपात च खात्तूर्णं विशालां वदरीमनु ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
निपपात ततः साथ हेमदण्डा महाघना |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
निपपात ततो भूमौ किञ्चित्प्राणो नराधिप ||
६५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
निपपात ततो भूमौ च्युतः सर्प इवाम्वरात् ||
३६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
निपपात द्विधा छिन्नं शूलं हेमपरिष्कृतम् |
५९ क
शल्य पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
निपपात महाराज गतसत्त्वो महीतले ||
३७ ख
शल्य पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
निपपात महाराज राजव्यसनकर्शितः ||
३८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
निपपात महेष्वासो वज्रनुन्न इवाचलः ||
३२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
निपपात रथे तूर्णं सौवलस्य महात्मनः ||
५७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८३
भीष्म उवाच
निपपात रथोपस्थे मनो मम विषादय़न् ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४५
सञ्जय़ उवाच
निपपात शरस्तूर्णं निकृत्तः कर्णसाय़कैः ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०३
कण्व उवाच
निपपात स भारार्तो विह्वलो नष्टचेतनः ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
निपातात्तव शस्त्राणां शरीरे याभवद्रुजा ||
१५३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २
कर्ण उवाच
निपातितं चाहवशौण्डमाहवे; कथं नु कुर्यामहमाहवे भय़म् ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११३
सञ्जय़ उवाच
निपातितध्वजरथं हतवाजिनरद्विपम् ||
२५ ग
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
निपातितस्यन्दनवाजिनागं; दृष्ट्वा वलं तद्धतसूतपुत्रम् |
२ क
विराट पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
निपातिते दन्तिवरे पृथिव्यां; त्रासाद्विकर्णः सहसावतीर्य |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय २
कर्ण उवाच
निपातिते शान्तनवे महारथे; दिवाकरे भूतलमास्थिते यथा |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
निपात्य नकुलः सङ्ख्ये शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
भीष्म उवाच
निपात्यतेऽस्य पुत्रेषु न चेत्पौत्रेषु नप्तृषु ||
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
निपात्यमाने तु तदा गजेन्द्रे; हाहाकृते तव पुत्रस्य सैन्ये |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
निपातय़त गृह्णीत विध्यताथ च कर्षत |
७९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
निपातय़त्युग्रधन्वा तं प्रमथ्नीत पार्थिवाः ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
निपातय़न्नश्ववरांस्तावकान्सोऽभ्यरोचत ||
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
व्यास उवाच
निपातय़िष्यसे चैनानसुरान्भुवनेश्वर ||
५५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
निपानं सर्वभूतानां भूत्वा त्वं पावनं महत् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५२
युधिष्ठिर उवाच
निपानानीव गोभ्याशे क्षेत्रे कुल्येव भारत |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय ३
सहदेव उवाच
निपुणं च चरिष्यामि व्येतु ते मानसो ज्वरः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७२
भीष्म उवाच
निपुणमनुनिशाम्य तत्त्ववुद्ध्या; व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय १३२
वैशम्पाय़न उवाच
निपुणेनाभ्युपाय़ेन यद्व्रवीमि तथा कुरु ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
निपेततुर्महावीरौ स्वरथोपस्थय़ोस्तदा ||
३९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
निपेतुः समरे तस्मिन्पक्षवन्त इवाद्रय़ः ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०६
सञ्जय़ उवाच
निपेतुः सर्वतो भीमाः कूजन्त इव पक्षिणः ||
४० ख