सभा पर्व
अध्याय
१
अर्जुन उवाच
न चापि तव सङ्कल्पं मोघमिच्छामि दानव |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
न चापि तृप्तिः कामानां विद्यते चेह कस्यचित् ||
७२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४
धृतराष्ट्र उवाच
न चापि ते वशगा मे महर्षे; न कल्मषं कर्तुमिहार्हसे माम् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
११२
ऋश्यशृङ्ग उवाच
न चापि तेषां त्वगिय़ं यथैषां; साराणि नैषामिव सन्ति तेषाम् ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९५
भीष्म उवाच
न चापि तेषां वीराणां जीवतां कुरुनन्दन |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९५
मनुरु उवाच
न चापि तैः साधय़तेऽथ कार्यं; ते तं न पश्यन्ति स पश्यते तान् ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
न चापि त्वां धृष्णुमः प्रष्टुमग्रे; न च त्वमस्मान्पृच्छसि ये वय़ं स्मः |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
न चापि दर्शनं तस्य चकार स भृगुस्तदा |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
१९५
भीष्म उवाच
न चापि दोषेण तथा लोको वैति पुरोचनम् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
९५
लोपामुद्रो उवाच
न चापि धर्ममिच्छामि विलोप्तुं ते तपोधन |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२१
कर्ण उवाच
न चापि पाण्डवा युद्धे भज्येरन्निति मे मतिः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२४१
वैशम्पाय़न उवाच
न चापि पादभाक्कर्णः पाण्डवानां नृपोत्तम |
८ क
वन पर्व
अध्याय
११२
ऋश्यशृङ्ग उवाच
न चापि पाद्यं वहु मन्यतेऽसौ; फलानि चेमानि मय़ाहृतानि |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१
कृष्ण उवाच
न चापि पार्थो विजितो रणे तैः; स्वतेजसा धृतराष्ट्रस्य पुत्रैः |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७७
भगवानु उवाच
न चापि प्रणिपातेन त्यक्तुमिच्छति धर्मराट् |
९ क
वन पर्व
अध्याय
११५
अकृतव्रण उवाच
न चापि भगवान्वाच्यो दीय़तामिति भार्गव |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
न चापि भीस्त्वय़ा कार्या भीष्मादद्य कथञ्चन |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
भगवानु उवाच
न चापि मम पर्याप्ताः सहिताः सर्वपार्थिवाः |
८६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९१
भगवानु उवाच
न चापि मम पर्याप्ताः सहिताः सर्वपार्थिवाः |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
न चापि युक्तं कौन्तेय़ निवर्तितुमय़ुध्यतः ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
२९०
सूर्य उवाच
न चापि युक्तं गन्तुं हि मय़ा मिथ्याकृतेन वै |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४४
सनत्सुजात उवाच
न चापि वाय़ौ न च देवतासु; न तच्चन्द्रे दृश्यते नोत सूर्ये ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
१६८
अर्जुन उवाच
न चापि विगतज्ञानो भूतपूर्वोऽस्मि पाण्डव ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
न चापि विजय़ो नित्यं मा युद्धे चेत आधिथाः ||
३९ ख
विराट पर्व
अध्याय
५
अर्जुन उवाच
न चापि विद्यते कश्चिन्मनुष्य इह पार्थिव |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
न चापि वैरं वैरेण केशव व्युपशाम्यति |
६३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
न चापि वय़मत्यर्थं परित्यागेन कर्हिचित् |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
न चापि वय़मुग्रेण कर्मणा वचनेन वा |
१२ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
न चापि शत्रवस्तेषामृध्यन्ते राज्ञि पाण्डवाः |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२८
व्राह्मण उवाच
न चापि शव्दान्विविधाञ्शृणोमि; न चापि सङ्कल्पमुपैमि किञ्चित् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८५
पराशर उवाच
न चापि शूद्रः पततीति निश्चय़ो; न चापि संस्कारमिहार्हतीति वा |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
न चापि शेकुस्ते कर्तुमन्योन्यस्याभिभाषणम् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
न चापि स महाप्राज्ञस्तस्माद्धैर्याच्चचाल ह |
४४ क
आदि पर्व
अध्याय
१९२
वैशम्पाय़न उवाच
न चापि सम्भ्रमः कश्चिदासीत्तत्र महात्मनः |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
न चापि सहिता वीरा देवदानवराक्षसाः |
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७५
समङ्ग उवाच
न चापि हृष्येद्विपुलेऽर्थलाभे; तथार्थनाशे च न वै विषीदेत् ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
न चापिवत्स सक्रोधः क्षुभितेनान्तरात्मना ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
वैशम्पाय़न उवाच
न चापीह समः कश्चिदाय़ुषा तव विद्यते |
२ ख
वन पर्व
अध्याय
१५६
वैशम्पाय़न उवाच
न चाप्यतः परं शक्यं गन्तुं भरतसत्तमाः |
२१ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
न चाप्यतीतां गान्धारि वाचं ते वितथामहम् |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
१४६
व्राह्मण्यु उवाच
न चाप्यधर्मः कल्याण वहुपत्नीकता नृणाम् |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
२९८
वैशम्पाय़न उवाच
न चाप्यधर्मे न सुहृद्विभेदने; परस्वहारे परदारमर्शने |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय
१४९
कुन्त्यु उवाच
न चाप्यनिष्टः पुत्रो मे यदि पुत्रशतं भवेत् ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९७
विदुर उवाच
न चाप्यपकृतं किञ्चिदनय़ोर्लक्ष्यते त्वय़ि ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
न चाप्यभिय़युः केचिदपरे नैव विव्यधुः ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
न चाप्यभीक्ष्णं सेवेत भृशं वा प्रतिपूजय़ेत् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९५
वामदेव उवाच
न चाप्यलव्धं लिप्सेत मूले नातिदृढे सति |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
४३
सूत उवाच
न चाप्यवमतस्येह वस्तुं रोचेत कस्यचित् |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
११०
पाण्डुरु उवाच
न चाप्यवहसन्कञ्चिन्न कुर्वन्भ्रुकुटीं क्वचित् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
९
युधिष्ठिर उवाच
न चाप्यवहसन्कञ्चिन्न कुर्वन्भ्रुकुटीं क्वचित् |
१७ क