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भीष्म पर्व
अध्याय २८
श्रीभगवानु उवाच
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
निःस्पृहः सर्वतो मुक्तस्तत्रैव रमते सुखी ||
१२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
निःस्रावय़ामासुरथो निम्नेषु विविधैर्मुखैः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय १००
लोमश उवाच
निःस्वाध्याय़वषट्कारं नष्टय़ज्ञोत्सवक्रिय़म् |
११ क
वन पर्व
अध्याय २१
वासुदेव उवाच
निःस्वाध्याय़वषट्कारां निर्भूषणवरस्त्रिय़म् ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४५
सञ्जय़ उवाच
निकर्तनमिवात्युग्रो लाङ्गूलस्य यथा हरिः ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
निकर्तने देवने योऽद्वितीय़; श्छन्नोपधः साधुदेवी मताक्षः |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
निकामवर्षी देवेन्द्रो वभूव जनमेजय़ ||
३४ ख
सभा पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
निकामवर्षी पर्जन्यः स्फीतो जनपदोऽभवत् ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
निकामवर्षी पर्जन्यो राजन्विषय़वासिनाम् |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५६
सञ्जय़ उवाच
निकारा मनुजश्रेष्ठ पाण्डवैस्त्वत्प्रतीक्षय़ा |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
निकारानतदर्हा च पश्यन्ती दुःखमश्नुते ||
४२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
निकारो निकृतिप्रज्ञैः पाण्डवैस्त्वत्प्रतीक्षय़ा |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
निकाय़ा भूतसङ्घानां परमाद्भुतदर्शनाः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय ६१
वृहदश्व उवाच
निकुञ्जान्पक्षिसङ्घुष्टान्दरीश्चाद्भुतदर्शनाः |
६ ख
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
निकुम्भस्त्वजितः सङ्ख्ये महामतिरजाय़त |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय २०१
नारद उवाच
निकुम्भो नाम दैत्येन्द्रस्तेजस्वी वलवानभूत् ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
निकृतः पाण्डवैः शूरैरवध्यैर्दैवतैरपि |
६ क
वन पर्व
अध्याय १४७
हनूमानु उवाच
निकृतः स ततो भ्रात्रा कस्मिंश्चित्कारणान्तरे |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५०
वैशम्पाय़न उवाच
निकृतश्च मय़ा पूर्वं सह सर्वैः सहोदरैः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८१
भीष्म उवाच
निकृतस्य नरैरन्यैर्ज्ञातिरेव पराय़णम् |
३५ क
सभा पर्व
अध्याय ७१
विदुर उवाच
निकृतस्यापि ते पुत्रैर्हृते राज्ये धनेषु च |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६१
सञ्जय़ उवाच
निकृतानीह पाण्डूनां नीचैरिव यथा नरैः ||
१८ ख
सभा पर्व
अध्याय ५३
युधिष्ठिर उवाच
निकृतिर्देवनं पापं न क्षात्रोऽत्र पराक्रमः |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०८
भीष्म उवाच
निकृती हि नरो लोकान्पापान्गच्छत्यसंशय़म् |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३३
मातो उवाच
निकृतेनेह वहुशः शत्रून्प्रतिजिगीषय़ा ||
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
निकृतेस्तस्य पापस्य ते पारं गमनेप्सवः |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
निकृतो धननाशेन शय़े सर्वाङ्गविज्वरः ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २१
कर्ण उवाच
निकृतो हि महावाहुरमितौजा वृकोदरः |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
निकृत्तं तद्धनुःश्रेष्ठमपास्य शिनिपुङ्गवः |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
निकृत्तं विवभौ तत्र घोररूपं भय़ानकम् ||
५१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
निकृत्तचापः समरानपेक्षः; पराजितः शान्तनवेन राज्ञा |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११८
सञ्जय़ उवाच
निकृत्तभुजमासीनं छिन्नहस्तमिव द्विपम् |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
निकृत्तवर्मकवचाञ्शकृन्मूत्रासृगाप्लुतान् |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९७
सञ्जय़ उवाच
निकृत्तवाहवो राजन्निपेतुर्धरणीतले ||
३७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
निकृत्ता निशितैः शस्त्रैः समन्तात्क्षतविक्षताः ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय २१९
वैशम्पाय़न उवाच
निकृत्ताः शतशः सर्वा निपेतुरनलं क्षणात् ||
४ ग
वन पर्व
अध्याय २९४
कर्ण उवाच
निकृत्तेषु च गात्रेषु न मे वीभत्सता भवेत् ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९
शल्य उवाच
निकृत्तेषु ततस्तेषु निष्क्रामंस्त्रिशिरास्त्वथ |
३५ क
कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
निकृत्तैर्वृषभाक्षाणां विराजति वसुन्धरा ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३६
सञ्जय़ उवाच
निकृत्तैर्हस्तिहस्तैश्च लुठमानैस्ततस्ततः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
निकृत्तैर्हस्तिहस्तैश्च विचलद्भिरितस्ततः |
११७ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
निकृत्तोदरपादैश्च तत्र तत्र प्रवेरितैः ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
निकृत्तय़न्त्रा निहतेन्द्रकीला; ध्वजा महान्तो ध्वजिनीमुखेषु |
११९ क
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
निकृत्तय़ोधनागाश्वं कृत्ताय़ुधमहारथम् |
३६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
निकृत्य तु रणे भीमस्तोमरान्वै चतुर्दश |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
निकृत्य देहान्विविशुः परेषां; नरेन्द्रनागेन्द्रतुरङ्गमाणाम् ||
११२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
निकृत्य पुरुषव्याघ्रौ वाहुय़ुद्धं प्रचक्रतुः ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३६
सञ्जय़ उवाच
निकृत्य पृथिवीं चक्रे भीमः शोणितकर्दमाम् ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३२
सञ्जय़ उवाच
निकृत्य पृथिवीं राजा चक्रे शोणितकर्दमाम् ||
२४ ख