शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
न चात्र परिहारोऽस्ति कालस्पृष्टस्य कस्यचित् |
९३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
घटोत्कच उवाच
न चात्र शूरान्मोक्ष्यामि न भीतान्न कृताञ्जलीन् |
५९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
न चाददानो न च सन्दधानो; न चेषुधी स्पृशमानः कराग्रैः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
न चाददीत वित्तानि सतां हस्तात्कदाचन |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
१९०
वैशम्पाय़न उवाच
न चादाद्राजा ||
५९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
न चादिं न मध्यं तथा नैव चान्तं; कदाचिद्विदन्ते सुराश्चासुराश्च |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६८
सञ्जय़ उवाच
न चाद्भुतमिदं मन्ये यद्द्रौणिः शुद्धगर्जय़ा |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
न चाधर्मेण केषाञ्चित्प्राणिनामभवद्वधः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१८१
मार्कण्डेय़ उवाच
न चाधिगच्छन्ति सुखान्यभाग्या; स्तेषामय़ं चैव परश्च नास्ति ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
न चानार्य शुभं साधुं पुरुषं क्षेप्तुमर्हसि ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
२२८
शकुनिरु उवाच
न चानार्यसमाचारः कश्चित्तत्र भविष्यति |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
न चानुजानाति भृशं च तप्यते; शोचत्यन्तः स्थविरोऽजातशत्रो |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
न चानुलिम्पेदस्नात्वा स्नात्वा वासो न निर्धुनेत् |
७५ क
विराट पर्व
अध्याय
४
धौम्य उवाच
न चानुशिष्येद्राजानमपृच्छन्तं कदाचन |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२२
भीष्म उवाच
न चानृतं ते वक्तव्यं व्रूहि व्राह्मणकाम्यया ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९५
मनुरु उवाच
न चान्तरं रूपगुणं विभर्ति; तथैव तद्दृश्यते रूपमस्य ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
न चान्तरिक्षं न दिशो न भूमि; र्न भास्करोऽदृश्यत रश्मिमाली |
७२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७६
अर्जुन उवाच
न चान्तरेण कर्माणि पौरुषेण फलोदय़ः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६९
भीष्म उवाच
न चान्नदोषान्निन्देत न गुणानभिपूजय़ेत् |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
न चान्यं पुरुषं कञ्चिन्मन्यते मोघदर्शनः ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
७२
वाहुक उवाच
न चान्यः पुरुषः कश्चिन्नलं वेत्ति यशस्विनि |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
२४७
देवदूत उवाच
न चान्यत्क्रिय़ते कर्म मूलच्छेदेन भुज्यते ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
९५
लोपामुद्रो उवाच
न चान्यथाहमिच्छामि त्वामुपैतुं कथञ्चन ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०९
भीष्म उवाच
न चान्यदपि कल्याणं पारत्रं समुदाहृतम् ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
न चान्यदारसेवीनां तां गतिं व्रज पुत्रक ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
न चान्यपूर्वा राजेन्द्र त्वामहं समुपस्थिता |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
न चान्यमनुभिक्षेत भिक्षमाणः कथञ्चन ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
२०४
वृद्धावू ऊचतुः
न चान्या वितथा वुद्धिर्दृश्यते साम्प्रतं तव ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४८
भीष्म उवाच
न चान्यां गच्छते यस्तु व्रह्मचर्यं हि तत्स्मृतम् ||
१५ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
न चान्यां देवतां काङ्क्षे सर्वकामफलान्यपि ||
१०४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
न चान्यान्नैव चात्मानं न क्षितिं न दिशस्तथा |
२६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
न चान्येष्वस्ति देशेषु राज्ञामिति मतिर्मम ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८५
भृगुरु उवाच
न चान्योन्यवधस्तत्र द्रव्येषु न च विस्मय़ः |
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
न चान्ववुध्यत तदा स मुनिर्गुरुवत्सलः ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७१
भगवानु उवाच
न चापत्रपते पापो नृशंसस्तेन कर्मणा ||
१२ ग
आदि पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
न चापश्यत गां तत्र सवत्सां काननोत्तमे ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
न चापश्यन्त तेऽन्योन्यं तमसा हतचक्षुषः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
३७
कृश उवाच
न चापश्यन्मृगं राजा चरंस्तस्मिन्महावने |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८६
दुर्योधन उवाच
न चापाय़ो भवेत्कश्चित्तद्भवान्प्रव्रवीतु मे ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
न चापि कञ्चिदमरमय़ुद्धेनापि शुश्रुमः ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
न चापि कर्णं गुरुपुत्र संस्तवा; दुपारमेत्यर्हसि वक्तुमच्युत |
३१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
२
कृप उवाच
न चापि कर्मणैकेन द्वाभ्यां सिद्धिस्तु योगतः ||
३ ख
सभा पर्व
अध्याय
६०
दुर्योधन उवाच
न चापि कश्चित्कुरुतेऽत्र पूजां; ध्रुवं तवेदं मतमन्वपद्यन् ||
३२ ख
सभा पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
न चापि किञ्चिज्जेतव्यमर्जुनात्र प्रदृश्यते |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११०
नारद उवाच
न चापि कृत्रिमः कालः कालो हि परमेश्वरः ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
१९४
कर्ण उवाच
न चापि कृष्णा शक्येत तेभ्यो भेदय़ितुं परैः |
७ क
विराट पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
न चापि केवलं राज्यमिच्छेय़ुस्तेऽनुपाय़तः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७०
भीष्म उवाच
न चापि गम्यते राजन्नैष दोषः प्रसङ्गतः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
न चापि गूढं कार्यं ते ग्राह्यं कार्योपघातकम् |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
१८५
वैशम्पाय़न उवाच
न चापि तत्पातनमन्यथेह; कर्तुं विषह्यं भुवि मानवेन ||
२७ ख