chevron_left  नानावाक्यसमाहारसमवाय़विशारदैःarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
नानावाक्यसमाहारसमवाय़विशारदैः |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५९
सञ्जय़ उवाच
नानावाचो विमुञ्चन्तो निद्रान्धास्ते महारणे |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
नानावादित्रघोषाश्च प्रादुरासन्विशां पते |
८३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
नानावादित्रघोषेण यथा वैरोचनिस्तथा ||
७४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
नानावादित्रनादश्च द्विपाश्वरथनिस्वनः |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
नानावादित्रनिनदैः क्ष्वेडितोत्क्रुष्टगर्जितैः |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
नानावादित्रशव्देन पाण्डुसेनामय़ोधय़न् ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
नानावादित्रसंह्रादैः क्ष्वेडितास्फोटिताकुलैः |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२९
वैशम्पाय़न उवाच
नानावाहुषु कृष्णस्य दीप्यमानानि सर्वशः ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
नानाविचित्रवेषाश्च नानाभाषास्तथैव च ||
३९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ७
द्रौणिरु उवाच
नानाविचित्रहसितक्ष्वेडितोत्क्रुष्टगर्जितैः |
४६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
नानाविधरवैर्हृष्टा नृत्यन्ति च हसन्ति च ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
नानाविधसुरूपाभिर्नानारागाभिरेव च |
१२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय २८
युधिष्ठिर उवाच
नानाविधांश्चैव महावलांश्च; राजन्यभोजाननुशास्ति कृष्णः ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
नानाविधानां दुःखानामावासोऽस्मि जनार्दन |
५७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
नानाविधानां भूतानां तत्कर्मातीव शंसताम् ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३३
श्रीभगवानु उवाच
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
नानाविधानि दुःखानि सर्वाण्येवान्वकीर्तय़त् ||
५४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
नानाविधानि शस्त्राणि प्रगृह्य जय़गृद्धिनः |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
नानाविधानि शस्त्राणि भीमस्योरस्यपातय़न् |
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
नानाविधानि शस्त्राणि विसृजन्तो जय़े रताः |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८९
सञ्जय़ उवाच
नानाविधानि शस्त्राणि विसृजन्तो महारथाः |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
नानाविधानि शस्त्राणि विसृज्य पतिता नराः |
५३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
नानाविधानि सैन्यानि तव हत्वा तु सात्वतः |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय २८
हंस उवाच
नानाविधानीह पुरा तच्चानृतमिहाद्य ते ||
४८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
नानाविधान्यनीकानि पुत्राणां तव भारत |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
नानाविधान्यनीकानि पुत्राणां ते जनाधिप |
६२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९४
मनुरु उवाच
नानाविधे कर्मपथे सुखार्थी; नरः प्रवृत्तो न परं प्रय़ाति |
११ ख
वन पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
नानाविधैर्मृगैर्जुष्टान्वानरैश्चोपशोभितान् ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २०
भीष्म उवाच
नानाविधैश्च भवनैर्विचित्रमणितोरणैः |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
भीष्म उवाच
नानाविधैश्च विहगैर्जलप्रकरसेविभिः |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६९
द्रोण उवाच
नानाविधैश्च शस्त्रौघैः पात्यमानैर्महारणे |
६४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
नानाविरागवसना गन्धचूर्णावचूर्णिताः ||
१६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ७
द्रौणिरु उवाच
नानाविरागवसनाश्चित्रमाल्यानुलेपनाः ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय १६
सूत उवाच
नानाविहगसङ्घुष्टं नानादंष्ट्रिसमाकुलम् |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
नानावुद्धिरुचीँल्लोके मनुष्यान्नूनमिच्छसि |
२७ क
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
नानावृक्षभुजाः केचित्कटिशीर्षास्तथापरे |
८७ क
आदि पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
नानावृक्षसमाकीर्णं सम्प्रज्वलितपावकम् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५०
नारद उवाच
नानावृत्तिर्देहिनां देहभेदे; तस्माद्वाय़ुर्देवदेवो विशिष्टः ||
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४८
भीष्म उवाच
नानावृत्तेषु भूतेषु नानाकर्मरतेषु च |
४५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
नानावेषधरा राजन्नानाशस्त्रौघसंवृताः |
३८ क
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
नानावेषधराश्चैव चर्मवासस एव च ||
८८ ख
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
नानावेषधरैर्हृष्टैर्भूतैरनुगतस्तदा ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५९
वसुदेव उवाच
नानावेषाकृतिमतां नानादेशनिवासिनाम् ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
नानाव्यालमुखाश्चान्ये वहुवाहुशिरोधराः ||
८६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
नानाशकुनिसम्भोज्यैः फलैर्वृक्षैरलङ्कृतम् |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६१
कपिल उवाच
नानाशनः स्यान्न महाशनः स्या; दलोलुपः साधुभिरागतः स्यात् |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
नानाशस्त्रधरैर्घोरैर्नानाकवचभूषणैः |
७६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
नानाशस्त्रधरैर्वीरैर्नानाकवचभूषणैः |
७७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७०
सञ्जय़ उवाच
नानाशस्त्रपुरोवातो द्विपाश्वरथसंवृतः |
९ क