अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
धर्मेणार्थः समाहार्यो धर्मलव्धं त्रिधा धनम् |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
धर्मेणास्त्रं निय़तं तस्य मन्ये; यो योत्स्यते पाण्डवैर्धर्मचारी |
८५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
धर्मेणैव प्रजाः सर्वा रक्षन्ति च परस्परम् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मेणैवर्षय़स्तीर्णा धर्मे लोकाः प्रतिष्ठिताः |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मेपुः संनतेपुश्च दशमो देवविक्रमः |
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२८
युधिष्ठिर उवाच
धर्मेश्वरः कुशलो नीतिमांश्चा; प्युपासिता व्राह्मणानां मनीषी |
९ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२३
गान्धार्यु उवाच
धर्मेषु कुरवः कं नु परिप्रक्ष्यन्ति माधव |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
धर्मेषु निरतान्साधूनचलानचलानिव ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
धर्मेषु स्वेषु कौरव्य हृदि तौ कर्तुमर्हसि ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
१२०
युधिष्ठिर उवाच
धर्मेऽप्रमादं कुरुताप्रमेय़ा; द्रष्टास्मि भूय़ः सुखिनः समेतान् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
कुण्डधार उवाच
धर्मेऽस्य रमतां वुद्धिर्धर्मं चैवोपजीवतु |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
महेश्वर उवाच
धर्मो नित्योपवासित्वं व्रह्मचर्यं तथैव च ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५१
युधिष्ठिर उवाच
धर्मो न्वय़मिहार्थः किममुत्रार्थोऽपि वा भवेत् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५२
युधिष्ठिर उवाच
धर्मो भवति स क्षिप्रं विलीनस्त्वेव साधुषु |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८१
भृगुरु उवाच
धर्मो यज्ञक्रिय़ा चैषां नित्यं न प्रतिषिध्यते ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
३२
युधिष्ठिर उवाच
धर्मो यस्यातिशङ्क्यः स्यादार्षं वा दुर्वलात्मनः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
धर्मो युद्धं क्षत्रिय़स्य व्राह्मणस्य परं तपः |
५६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६४
मान्धातो उवाच
धर्मो योऽसावादिदेवात्प्रवृत्तो; लोकज्येष्ठस्तं न जानामि कर्तुम् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मो राजन्गुणश्रेष्ठो मध्यमो ह्यर्थ उच्यते |
८ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मो विग्रहवान्साक्षादुवाच सुतमात्मनः ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१००
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मो विदुररूपेण शापात्तस्य महात्मनः |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय
१०१
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मो विदुररूपेण शूद्रय़ोनावजाय़त ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०८
युधिष्ठिर उवाच
धर्मो वृत्तं च वृत्तिश्च वृत्त्युपाय़फलानि च ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मो वै वेदितुं शक्यो वृहस्पतिसमैरपि ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
धर्मो व्रह्मन्नुदते पूरुषाणां; यत्कुर्वते पापमिह प्रमादात् ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४७
नागभार्यो उवाच
धर्मो हि धर्मसम्वन्धादिन्द्रिय़ाणां विशेषणम् ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
धर्मो हि युद्धाच्छ्रेय़ोऽन्यत्क्षत्रिय़स्य न विद्यते ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
धर्मो ह्यणीय़ान्वचनाद्वुद्धेश्च भरतर्षभ |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८०
राम उवाच
धर्मो ह्येष महावाहो विशिष्टैः सह युध्यताम् ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३९
वाय़ुरु उवाच
धर्मोत्तरा नष्टभय़ा भूमिरासीत्ततो नृप ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६६
भीष्म उवाच
धर्मोत्थिता सत्त्ववीर्या धर्मसेतुवटाकरा |
३१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मोपघातकस्त्वेष समारम्भस्तव प्रभो |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२८
व्यास उवाच
धर्मोपस्थो ह्रीवरूथ उपाय़ापाय़कूवरः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
धर्मोऽहमस्मि भद्रं ते जिज्ञासार्थं तवानघ |
७८ क
वन पर्व
अध्याय
२९८
यक्ष उवाच
धर्मोऽहमस्मि भद्रं ते जिज्ञासुस्त्वामिहागतः |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१९
युधिष्ठिर उवाच
धर्मोऽय़ं पौर्विकी सञ्ज्ञा उपचारः क्रिय़ाविधिः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११
अर्जुन उवाच
धर्मोऽय़मिति मन्वाना व्रह्मचर्ये व्यवस्थिताः |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
धर्म्यं देशय़ पन्थानं समर्थो ह्यसि वारणे |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०९
भीष्म उवाच
धर्म्यं धर्मविरुद्धं वा तत्कर्तव्यं युधिष्ठिर ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
धर्म्यं धर्मसुतः प्रश्नं पर्यपृच्छद्युधिष्ठिरः ||
१७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
धर्म्यं धर्मेण धर्मज्ञे प्राप्तास्ते निधनं शुभे |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
१९६
द्रोण उवाच
धर्म्यं पथ्यं यशस्यं च वाच्यमित्यनुशुश्रुमः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०५
गुरुरु उवाच
धर्म्यं पन्थानमाक्रम्य सानुवन्धो विनश्यति ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
धर्म्यं पन्थानमारूढाः सत्यधर्मपराय़णाः ||
६४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
धर्म्यं पन्थानमारूढास्तानुपास्स्व च पृच्छ च ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
८७
यय़ातिरु उवाच
धर्म्यं मार्गं चेतय़ानो यशस्यं; कुर्यान्नृपो धर्ममवेक्षमाणः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५५
भीष्म उवाच
धर्म्यं स्वर्ग्यं च लोक्यं च युद्धं हि मनुरव्रवीत् ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
धर्म्यमर्थं च काले च देशे चाभिहितं वचः |
३३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
धर्म्यमर्थं महावाहुराह त्वां तात केशवः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
९९
वैशम्पाय़न उवाच
धर्म्यमर्थसमाय़ुक्तमुवाच वचनं हितम् ||
४४ ग