शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
देहविक्लवतां चैव सम्यग्विज्ञाय़ भारत ||
५० ख
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
देहस्तस्य ततोऽतीव वर्धत्याय़ामविस्तरैः ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
देहांश्च भोगांश्च परिच्छदांश्च; त्यक्त्वा मनोज्ञानि सुखानि चापि |
३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
देहात्तु कर्णस्य निपातितस्य; तेजो दीप्तं खं विगाह्याचिरेण |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९३
वसिष्ठ उवाच
देहाद्देहमवाप्नोति वीजाद्वीजं तथैव च ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
देहाद्देहसहस्राणि तथा समभिपद्यते ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१०
गुरुरु उवाच
देहान्तं कश्चिदन्वास्ते भावितात्मा निराश्रय़ः |
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३
युधिष्ठिर उवाच
देहान्तरमनासाद्य कथं स व्राह्मणोऽभवत् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०९
गुरुरु उवाच
देहान्तरमिवापन्नश्चरत्यपगतस्मृतिः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
देहान्पुराणानुत्सृज्य नवान्सम्प्रतिपद्यते |
५८ क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
देहासून्निशितैर्भल्लै रिपूणां नाशय़न्क्षणात् ||
५७ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
कश्यप उवाच
देहि देहीति भिक्षन्ति तेन पीवाञ्शुनःसखः ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
देहि युद्धं नरपते ममाद्य रणमूर्धनि |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
महेश्वर उवाच
देहिभिर्धर्मपरमैः कर्तव्यो धर्मसञ्चय़ः ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
महेश्वर उवाच
देहिभिर्धर्मपरमैश्चर्तव्यो धर्मसम्भवः ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
१८१
वैशम्पाय़न उवाच
देही च देहं सन्त्यज्य मृग्यमाणः शुभाशुभैः |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
देही नित्यमवध्योऽय़ं देहे सर्वस्य भारत |
३० क
वन पर्व
अध्याय
१९७
मार्कण्डेय़ उवाच
देहीति याचमानो वै तिष्ठेत्युक्तः स्त्रिय़ा ततः |
८ क
सभा पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
देहे त्रितय़मेवैतत्पुरुषस्योपजाय़ते ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
देहेभ्यो राजपुत्राणां नागाश्वरथसादिनाम् ||
४८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२०३
गुरुरु उवाच
देहेषु ज्ञानकर्तारमुपासीनमुपासते ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३९
वैशम्पाय़न उवाच
देहेषु मज्जय़िष्यामि स्निग्धेषु पिशितेषु च ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४५
व्यास उवाच
देहैर्विमुक्ता विचरन्ति लोकां; स्तथैव सत्त्वान्यतिमानुषाणि ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८
अश्मो उवाच
देहो वा जीवतोऽभ्येति जीवो वाभ्येति देहतः |
५० क
शान्ति पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
देय़ः पिण्डोऽनपेताय़ भर्तव्यौ वृद्धदुर्वलौ ||
३४ ग
वन पर्व
अध्याय
२
युधिष्ठिर उवाच
देय़मार्तस्य शय़नं स्थितश्रान्तस्य चासनम् |
५३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२३
भीष्म उवाच
देय़माहुर्महाराज उभावेतौ तपस्विनौ ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४९
युधिष्ठिर उवाच
देय़ा कन्या कथं चेति तन्मे व्रूहि पितामह ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
११५
अकृतव्रण उवाच
देय़ा मे दुहिता चेय़ं त्वद्विधाय़ महात्मने ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६८
युधिष्ठिर उवाच
देय़ाः किंलक्षणा गावः काश्चापि परिवर्जय़ेत् |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
दैतेय़ः सोऽभवद्राजा हार्दिक्यो मनुजर्षभः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२३४
वैशम्पाय़न उवाच
दैतेय़ा इव शक्रेण विषादमगमन्परम् ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९७
नारद उवाच
दैतेय़ा निवसन्ति स्म वासवेन हृतश्रिय़ः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
दैतेय़ानां सहस्राणि संय़तानि महात्मनाम् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
दैतेय़ानुशनाः प्राह संशय़च्छेदने पुरा |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
९२
लोमश उवाच
दैतेय़ान्दानवांश्चैव कलिरप्याविशत्ततः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
दैतेय़ैर्वरदानेन धार्यते स्म यथासुखम् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
दैत्य न व्यथसे शौर्यादथ वा वृद्धसेवय़ा |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
दैत्यदानवगन्धर्वरक्षोगणसमाकुलाः |
२९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
दैत्यदानववीराणां जघान नवतीर्नव ||
३३ ग
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
दैत्यदानवसङ्घांश्च कालेय़ांश्च नराधिप |
१०८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
दैत्यदानवसङ्घानां चकार कदनं महत् ||
२६ ख
सभा पर्व
अध्याय
९
नारद उवाच
दैत्यदानवसङ्घाश्च सर्वे रुचिरकुण्डलाः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९९
नारद उवाच
दैत्यद्वीपः सरिद्द्वीपः सारसः पद्मकेसरः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
२४०
दानवा ऊचुः
दैत्यरक्षोगणाश्चापि सम्भूताः क्षत्रय़ोनिषु |
१७ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
४
कृप उवाच
दैत्यसेनामिव क्रुद्धः सर्वदानवसूदनः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
दैत्या हिंसानुरक्ताश्च अवध्याः सुरसत्तमैः |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय
१७८
वैशम्पाय़न उवाच
दैत्याः सुपर्णाश्च महोरगाश्च; देवर्षय़ो गुह्यकाश्चारणाश्च |
७ क
वन पर्व
अध्याय
२४०
वैशम्पाय़न उवाच
दैत्यानां तद्वचः श्रुत्वा हृदि कृत्वा स्थिरां मतिम् ||
४० ग