कर्ण पर्व
अध्याय
२८
काक उवाच
देवासुरमनुष्येषु प्रख्यातौ यौ नरर्षभौ |
६५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५८
वासुदेव उवाच
देवासुरमनुष्येषु यक्षगन्धर्वभोगिषु |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
देवासुरमहामात्रो देवासुरगणाश्रय़ः |
१४२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
देवासुररणप्रख्यः प्रावर्तत जनक्षय़ः ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
देवासुररणप्रख्यमुभय़ोः प्रीय़माणय़ोः ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
देवासुरविनिर्माता देवासुरपराय़णः |
१४१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
भीष्म उवाच
देवासुरसमं घोरं दिवोदासो महाद्युतिः ||
२० ख
विराट पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
देवासुरसमो राजन्नासीत्सूर्ये विलम्वति ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
भीष्म उवाच
देवासुरसुपर्णाश्च प्रजानां पतय़स्तथा |
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
देवासुरस्य द्रष्टारः पुराणस्य महाद्युते |
६७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४२
धृतराष्ट्र उवाच
देवासुरा ह्याचरन्व्रह्मचर्य; ममृत्यवे तत्कतरन्नु सत्यम् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
२१३
मार्कण्डेय़ उवाच
देवासुराः पुरा यत्ता विनिघ्नन्तः परस्परम् |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
देवासुराणां च गृहं श्वेतः पर्वत उच्यते |
४९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
देवासुराणां भावानामहमेकः प्रवर्तिता ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७२
भीष्म उवाच
देवासुराणां सर्वेषां तस्मिन्युद्ध उपस्थिते ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
देवासुरे पुरा युद्धे यथा दैतेय़दानवाः ||
४१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
देवासुरेश्वरो देवो देवासुरमहेश्वरः ||
१४३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०२
नारद उवाच
देवासुरेषु युद्धेषु मनसैव निय़च्छति ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७२
भीष्म उवाच
देवासुरैस्ततः सैन्यैः सर्वमासीत्समाकुलम् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२१२
मार्कण्डेय़ उवाच
देवास्तं नाधिगच्छन्ति मार्गमाणा यथादिशम् ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
देवास्तस्य वचः श्रुत्वा गत्वा दक्षमथाव्रुवन् |
६३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९१
भीष्म उवाच
देवास्तु पितरो नाम निर्मिता वै स्वय़म्भुवा |
२७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
देवास्तु पितृभिः सार्धं सगणार्जुनतोऽभवन् |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२४
भीष्म उवाच
देवास्तु सहिताः सर्वे वसोः शापविमोक्षणम् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
९२
लोमश उवाच
देवास्तु सागरांश्चैव सरितश्च सरांसि च |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
देवास्तृणमय़ा यस्य वभूवुर्जय़तां वर |
७३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
शुक्र उवाच
देवास्तेजस्विनो यस्मात्प्रभावन्तः प्रकाशकाः |
४८ क
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
देवास्त्रिभुवणं याता ऋषय़श्च यथासुखम् ||
४९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
व्रह्मो उवाच
देवास्त्वनुग्रहं चक्रुर्मण्डूकानां भृगूद्वह |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
१८९
पूर्वेन्द्रा ऊचुः
देवास्त्वस्मानादधीरञ्जनन्यां; धर्मो वाय़ुर्मघवानश्विनौ च ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
५२
वृहदश्व उवाच
देवास्त्वां प्राप्तुमिच्छन्ति शक्रोऽग्निर्वरुणो यमः |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
देवाह्वय़ः सुप्रतिमः सुप्रतीको वृहद्रथः |
१७५ क
सभा पर्व
अध्याय
७१
विदुर उवाच
देवाय़तनचैत्येषु प्राकाराट्टालकेषु च ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
देवि धर्मार्थतत्त्वज्ञे सत्यनित्ये दमे रते |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
देविकामिन्द्रमार्गं च स्वर्णविन्दुं विगाह्य च |
९ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
देविकाय़ां नरः स्नात्वा समभ्यर्च्य महेश्वरम् ||
१११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
देविता निकृतिप्रज्ञो युधि जेष्यति पाण्डवान् ||
३१ ख
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
देवी जाम्ववती चैव विविशुर्जातवेदसम् ||
७१ ख
वन पर्व
अध्याय
२४९
कोटिकाश्य उवाच
देवी नु यक्षी यदि दानवी वा; वराप्सरा दैत्यवराङ्गना वा ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
२०८
मार्कण्डेय़ उवाच
देवी भानुमती नाम प्रथमाङ्गिरसः सुता ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
देवी वा दानवी वा त्वं गन्धर्वी यदि वाप्सराः ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३
शल्य उवाच
देवीं रात्रिं नमस्यामि सिध्यतां मे मनोरथः ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
महाभारत कथा
देवीं सरस्वतीं चैव ततो जय়मुदीरय়ेत् ||
० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८१
पराशर उवाच
देवीं स्तुत्वा तु गगने मोदते तेजसा वृतः ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८७
वैशम्पाय़न उवाच
देवेन्द्रस्येव विहितं भीमेन कुरुनन्दन ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
५४
वृहदश्व उवाच
देवेभ्यः प्राञ्जलिर्भूत्वा वेपमानेदमव्रवीत् ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०७
वैशम्पाय़न उवाच
देवेभ्यः समपद्यन्त सन्तानाय़ कुलस्य वै ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३२
जनक उवाच
देवेभ्यश्च पितृभ्यश्च भूतेभ्योऽतिथिभिः सह |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९३
भीष्म उवाच
देवेभ्यश्च पितृभ्यश्च भृत्येभ्योऽतिथिभिः सह |
१५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१५
द्रौणिरु उवाच
देवेभ्यो दानवेभ्यो वा नागेभ्यो वा कथञ्चन ||
२९ ख