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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा युधिष्ठिरो राजा भीमसेनमथाव्रवीत् ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा रथं मेघनिभं ममेम; मम्वष्ठसेना मरणे व्यतिष्ठत् |
३ क
वन पर्व
अध्याय २३३
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा रथगतान्वीरान्पाण्डवांश्चतुरो रणे ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा रथस्थांस्ताञ्शूरान्सूर्याग्निसमतेजसः |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा रथान्स्वान्व्यपनीय़माना; न्प्रत्युद्ययौ सात्यकिं योद्धुमिच्छन् ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा रुक्मरथं क्रुद्धं समकम्पन्त सृञ्जय़ाः ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा रुक्मरथं युद्धे समकम्पन्त सृञ्जय़ाः ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा रुक्मरथं रुग्णं पुत्रं शल्यस्य मानिनम् |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा लाङ्गलिनं राजा प्रत्युत्थाय़ च भारत |
४ क
वन पर्व
अध्याय १८७
देव उवाच
दृष्ट्वा लोकं समस्तं च विस्मितो नाववुध्यसे ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा वनगतं पार्थमदुःखार्हं सुखोचितम् |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
दृष्ट्वा वलिनमत्युग्रं द्रुतं सम्प्राद्रवद्भय़ात् ||
३५ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा वलौघांश्च निपात्यमाना; न्महद्भय़ं तव पुत्रान्विवेश ||
३३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २०
गान्धार्यु उवाच
दृष्ट्वा वहुभिराक्रन्दे निहतं त्वामनाथवत् |
१९ क
वन पर्व
अध्याय २५५
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा विक्रमकर्माणि कुर्वाणं च धनञ्जय़म् |
५६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९५
सूत उवाच
दृष्ट्वा विक्रमसम्पन्नं विद्रविष्यन्ति संय़ुगे |
१९ ख
वन पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा विचित्राणि गिरौ वनानि; किरीटिनं चिन्तय़तामभीक्ष्णम् |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
दृष्ट्वा विनिहतं भीष्मं मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ||
७१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १११
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा विनिहतान्पुत्रांस्तव राजन्महारथान् |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा विनिहतान्भ्रातॄन्भीमसेनेन संय़ुगे |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३५
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा विनिहतान्सङ्ख्ये पाञ्चालान्सोमकैः सह ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा विनिहतौ सङ्ख्ये मातुलावपलाय़िनौ |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा विनिहितं वाणं शरैः कर्णो विशां पते |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा विप्रद्रुतं सैन्यं मदीय़ं मार्गणाहतम् ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा विमूढं हैडिम्वं सारथिस्तं रणाजिरात् |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा विराटनगरे भ्रातरं निहतं प्रिय़म् |
३७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
दृष्ट्वा विविक्त आसीनं भार्या भर्तारमव्रवीत् ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा विशोकं समरे भीमसेनस्य सारथिम् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
दृष्ट्वा विषादमगमत्परां चार्तिं नरर्षभः ||
२२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा वृकोदरं भीष्मः सहसैव समभ्ययात् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७२
भीष्म उवाच
दृष्ट्वा वृत्रस्य विक्रान्तमुपगम्य महेश्वरम् |
२९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३०
अलर्क उवाच
दृष्ट्वा वै विविधान्भावांस्तानेव प्रतिगृध्यति |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा व्यवस्थितं भीमं तव पुत्रो महावलः |
३५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा व्यूढां तव चमूं सूतपुत्रेण संय़ुगे |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा शक्तिं कर्णवाह्वन्तरस्थां; नेदुर्भूतान्यन्तरिक्षे नरेन्द्र |
५६ क
वन पर्व
अध्याय २१
वासुदेव उवाच
दृष्ट्वा शङ्कोपपन्नोऽहमपृच्छं हृदिकात्मजम् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
दृष्ट्वा शरं ज्यामभिनीय़मानं; वभूव हाहाकृतमन्तरिक्षम् ||
२० ख
सभा पर्व
अध्याय १६
कृष्ण उवाच
दृष्ट्वा शरीरशकले प्रवेपाते उभे भृशम् ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा शारद्वतं पार्थो मूर्छितं शरपीडितम् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय १७
वासुदेव उवाच
दृष्ट्वा शाल्वं महावाहो सौभस्थं पृथिवीगतम् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२०
भीष्म उवाच
दृष्ट्वा शुकमतिक्रान्तं पर्वतं च द्विधाकृतम् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा श्रेय़ः परं वुद्ध्या ततो राजन्प्रशाधि माम् ||
३८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा शय़ानं भुवि मद्रराज; श्छिन्नध्वजेनापय़यौ रथेन ||
३५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा शय़ानं भुवि मद्रराजो; भीतोऽपसर्पत्सरथः सुशीघ्रम् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय ६६
शकुन्तलो उवाच
दृष्ट्वा शय़ानं शकुनाः समन्तात्पर्यवारय़न् ||
१० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ११
वासुदेव उवाच
दृष्ट्वा स पृथिवीं व्याप्तां गन्धस्य विषय़े हृते |
७ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
दृष्ट्वा संनिदधुस्तत्र पाण्डवा आय़ुधान्युत ||
१३० ग
शान्ति पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा सभागतां कृष्णामेकवस्त्रां रजस्वलाम् |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १२
वासुदेव उवाच
दृष्ट्वा सभागतां कृष्णामेकवस्त्रां रजस्वलाम् |
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३५
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा सम्पूजय़ामासुः सिद्धचारणवातिकाः ||
३९ ख