chevron_left  दृष्टापदानाarrow_drop_down
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
दृष्टापदाना विक्रान्तास्त्वय़ा सत्कृत्य मानिताः ||
३७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १६
व्राह्मण उवाच
दृष्टापदानाश्चास्माभिः पाण्डवाः पुरुषर्षभाः |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४९
युधिष्ठिर उवाच
दृष्टार्थो विद्ययाप्येवमविद्यां प्रजहेन्नरः ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
दृष्टाश्च वहवो देशा नानाधर्मसमाकुलाः ||
५० ख
वन पर्व
अध्याय १८९
मार्कण्डेय़ उवाच
दृष्टाश्चैवानुभूताश्च तांस्ते कथितवानहम् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्टिं ते वितरामोऽद्य भवानर्हो हि दर्शनम् ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
दृष्टिं भ्रूसङ्कटां कृत्वा वासुदेवे न्यपातय़त् ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२७
भीष्म उवाच
दृष्टिकान्तमनिर्देश्यं दिव्यमद्भुतदर्शनम् ||
९ ख
विराट पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्टिप्रणाशो भूतानां दिवस्पृङ्नरसत्तम ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय ४८
सूत उवाच
दृष्टिर्भ्रमति मेऽतीव हृदय़ं दीर्यतीव च |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
दृष्टिश्च मे न व्यथते पुराणी; युध्यमाना धार्तराष्ट्रा न सन्ति ||
९५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
दृष्टिश्चातीन्द्रिय़ा राजन्दूराच्छ्रवणमेव च |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १००
सञ्जय़ उवाच
दृष्टीः सङ्ख्ये सैनिकानां प्रतिजघ्नुः समन्ततः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय २१४
मार्कण्डेय़ उवाच
दृष्टीविषैः सप्तशीर्षैर्गुप्तं भोगिभिरद्भुतैः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
दृष्टो भवति देवेश एभिर्दृष्टैर्द्विजोत्तमाः ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१९
भीष्म उवाच
दृष्टो मार्गः प्रवृत्तोऽस्मि स्वस्ति तेऽस्तु तपोधन |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
नारद उवाच
दृष्टो मे पुरुषः श्रीमान्विश्वरूपधरोऽव्ययः |
३६ क
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
दृष्टो मय़ा स भूतात्मा देवः कमललोचनः ||
१२१ ख
सभा पर्व
अध्याय ३४
शिशुपाल उवाच
दृष्टो युधिष्ठिरो राजा दृष्टो भीष्मश्च यादृशः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४३
भीष्म उवाच
दृष्टो हि धर्मो धर्मिष्ठैर्यादृशो विहगोत्तमे ||
८ ग
वन पर्व
अध्याय १५८
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्टो हि मम सङ्क्लेशः पुरा पाण्डवनन्दन |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
नारद उवाच
दृष्टौ मय़ा युवां तत्र तस्य देवस्य पार्श्वतः |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५९
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्व भीमेन महतीं वार्यमाणां चमूं तव |
२ क
वन पर्व
अध्याय २१२
मार्कण्डेय़ उवाच
दृष्ट्वा ऋषीन्भय़ाच्चापि प्रविवेश महार्णवम् ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा कचं चापि तथाभिरूपं; पीतं तदा सुरय़ा मोहितेन ||
५२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११०
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा कर्णं तु पुत्रास्ते भीमसेनपराजितम् |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३४
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा कर्णं महावाहुमुच्चैः शव्दमथानदन् ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा कर्णं महेष्वासं मुखे व्यूहस्य दंशितम् ||
३८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा कर्णं महेष्वासं युय़ुत्सुं समवस्थितम् |
३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा कर्णं महेष्वासं रथस्थं रथिनां वरम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय २९४
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा कर्णं शस्त्रसङ्कृत्तगात्रं; मुहुश्चापि स्मय़मानं नृवीरम् ||
३७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३४
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा कर्णं समाय़ान्तं भीमः क्रोधसमन्वितः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा कर्णो महावाहुः पाञ्चालान्समुपाद्रवत् ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा कर्णो महेष्वासो योधय़ामास राक्षसम् ||
७६ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १०९
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा कर्णोऽश्रुपूर्णाक्षो मुहूर्तं नाभ्यवर्तत ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९४
मनुरु उवाच
दृष्ट्वा कर्म शाश्वतं चान्तवच्च; मनस्त्यागः कारणं नान्यदस्ति ||
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय १७
द्रौपद्यु उवाच
दृष्ट्वा कस्य न दुःखं स्याद्धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८९
धृतराष्ट्र उवाच
दृष्ट्वा कां वै धृतिं युद्धे प्रत्यपद्यन्त मामकाः ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा काव्यमुवाचेदं सम्भ्रमाविष्टचेतना ||
२५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा काश्चिन्न जानन्ति भर्तॄन्भरतय़ोषितः ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७३
भीष्म उवाच
दृष्ट्वा कुणीन्पक्षहतान्मनुष्यानामय़ाविनः |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४२
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा कुन्तीमुपातिष्ठदभिवाद्य कृताञ्जलिः |
३० ख
सभा पर्व
अध्याय ४३
दुर्योधन उवाच
दृष्ट्वा कुन्तीसुते शुभ्रां श्रिय़ं तामाहृतां तथा ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७५
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा कुरुवलश्रेष्ठाः पुनर्विमनसोऽभवन् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा कुशवृसीं चेमां शोको मां रुन्धय़त्ययम् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय १०३
लोमश उवाच
दृष्ट्वा कृतं निःसलिलं महार्णवं; सुराः समस्ताः परमप्रहृष्टाः |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा कृतं मूर्धनि नाभ्यनन्द; न्धर्मात्मानः सोमकानां प्रवर्हाः ||
१३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा कृशं विवर्णं च राजानमतथोचितम् |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८९
धृतराष्ट्र उवाच
दृष्ट्वा कृष्णं तु दाशार्हमर्जुनार्थे व्यवस्थितम् |
३० क
वन पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा कृष्णां सभां नीतां धर्मपत्नीं यशस्विनीम् ||
२० ख