chevron_left  दृढभक्तोऽसिarrow_drop_down
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
दृढभक्तोऽसि विप्रर्षे मय़ा जिज्ञासितो ह्यसि ||
१७५ ख
विराट पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
दृढमाय़सगर्भं तु श्वेतं वर्म शताक्षिमत् |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५६
वासुदेव उवाच
दृढमुष्टिः कृती नित्यमस्यमानो दिवानिशम् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९४
वामदेव उवाच
दृढमूलस्त्वदुष्टात्मा विदित्वा वलमात्मनः |
२१ क
सभा पर्व
अध्याय ६६
दुर्योधन उवाच
दृढमूला वय़ं राज्ये मित्राणि परिगृह्य च |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
दृढलक्ष्येण शूरेण भीमसेनेन धन्विना |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय १०८
वैशम्पाय़न उवाच
दृढवर्मा दृढक्षत्रः सोमकीर्तिरनूदरः ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय १०८
वैशम्पाय़न उवाच
दृढसन्धो जरासन्धः सत्यसन्धः सदःसुवाक् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय १०८
वैशम्पाय़न उवाच
दृढहस्तः सुहस्तश्च वातवेगसुवर्चसौ ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८
धृतराष्ट्र उवाच
दृढाः सङ्ग्राममध्येषु कच्चिदासन्न विह्वलाः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय १९५
मार्कण्डेय़ उवाच
दृढाश्वः कपिलाश्वश्च चन्द्राश्वश्चैव भारत |
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७७
वासुदेव उवाच
दृढास्त्रश्चित्रय़ोधी च धार्तराष्ट्रो महावलः ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६६
कृष्ण उवाच
दृढाहतः पत्रिभिरुग्रवेगैः; पार्थेन कर्णो विविधैः शिताग्रैः |
३६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७१
सञ्जय़ उवाच
दृढाहतस्ततो भीमो भारद्वाजस्य संय़ुगे |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
दृढाहताः पत्रिभिरुग्रवेगैः; पार्थेन भल्लैर्निशितैः शिताग्रैः ||
११८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
कर्ण उवाच
दृढाय़ुधः कृतिमान्क्षिप्रहस्तो; न पाण्डवेय़ेन समोऽस्ति योधः ||
३९ ख
विराट पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
दृढाय़ुधजनाकीर्णं गजाश्वरथसङ्कुलम् ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
दृढाय़ुधौ दूरपातौ युद्धे च कृतनिश्चय़ौ |
३ क
आदि पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
दृढाय़ुश्च वनाय़ुश्च श्रुताय़ुश्चोर्वशीसुताः ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
दृढाय़ुश्चोर्ध्ववाहुश्च विश्रुतावृषिसत्तमौ ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय १६५
वसिष्ठ उवाच
दृढेन दाम्ना वद्ध्वैष वत्सस्ते ह्रिय़ते वलात् ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६१
सञ्जय़ उवाच
दृढैः पूर्णाय़तोत्सृष्टैर्द्रावय़ंस्तव वाहिनीम् ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
दृढैः पूर्णाय़तोत्सृष्टैर्विभेद नतपर्वभिः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१२
भीष्म उवाच
दृढैश्च पाशैर्वहुभिर्विमुक्तः; प्रजानिमित्तैरपि दैवतैश्च |
४५ क
शल्य पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
दृप्तमैरावतप्रख्यममित्रगणमर्दनम् ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
दृप्तसिंहनिनादिन्या विनद्य प्रय़यौ गुहः ||
५८ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १७७
भीष्म उवाच
दृप्तात्मानमहं तं च हनिष्यामीति भार्गव ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८
धृतराष्ट्र उवाच
दृप्तानां प्रतिषेद्धासीद्धार्मिकानां च रक्षिता |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
दृप्तय़ोः समरे तूर्णं वृत्रवासवय़ोरिव ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
दृमी चात्र नरश्रेष्ठ सर्वदेवैरभिष्टुता |
९० क
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
दृमीति नाम्ना विख्यातं सर्वपापप्रमोचनम् ||
८८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १७
युधिष्ठिर उवाच
दृश्यं पश्यति यः पश्यन्स चक्षुष्मान्स वुद्धिमान् |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
दृश्यतां वा पुमान्कश्चित्समग्रे पार्थिवे वले |
५० क
विराट पर्व
अध्याय ४३
कर्ण उवाच
दृश्यतामद्य वै व्योम खद्योतैरिव संवृतम् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५२
युधिष्ठिर उवाच
दृश्यते चैव स पुनस्तुल्यरूपो यदृच्छय़ा ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२१
श्रीभगवानु उवाच
दृश्यते ज्ञानय़ोगेन आवां च प्रसृतौ ततः |
४० क
वन पर्व
अध्याय २०३
व्याध उवाच
दृश्यते त्वग्र्यया वुद्ध्या सूक्ष्मय़ा ज्ञानवेदिभिः ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८०
भृगुरु उवाच
दृश्यते त्वग्र्यया वुद्ध्या सूक्ष्मय़ा तत्त्वदर्शिभिः ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३८
व्यास उवाच
दृश्यते त्वग्र्यया वुद्ध्या सूक्ष्मय़ा तत्त्वदर्शिभिः ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
दृश्यते दिक्षु सर्वासु विद्युदभ्रघनेष्विव ||
२१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
दृश्यते देवदेवः स सिद्धैर्निर्दग्धकिल्विषैः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५२
युधिष्ठिर उवाच
दृश्यते धर्मरूपेण अधर्मं प्राकृतश्चरन् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८
अश्मो उवाच
दृश्यते नाभ्यतिक्रामन्नतिक्रान्तो न वा पुनः ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
दृश्यते पृष्ठतश्चैव त्वन्मूलो हि पराजय़ः ||
४ ग
वन पर्व
अध्याय २०७
युधिष्ठिर उवाच
दृश्यते भगवन्सर्वमेतदिच्छामि वेदितुम् ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
दृश्यते राजसैन्यस्य मध्ये विचरतो मुहुः ||
८१ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
युधिष्ठिर उवाच
दृश्यते लोकमासक्तं ससुरासुरमानुषम् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
दृश्यते शङ्खलिखितः स धर्मफलभाग्भवेत् ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
दृश्यते स्म नरेन्द्राणां पुनर्मध्यगतश्चरन् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१७
वलिरु उवाच
दृश्यते हि कुले जातो दर्शनीय़ः प्रतापवान् |
३२ क