भीष्म पर्व
अध्याय
११७
कर्ण उवाच
दुरुक्तं विप्रतीपं वा संरम्भाच्चापलात्तथा |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
भीष्म उवाच
दुरुक्तवचने राजन्यथा पूर्वं युधिष्ठिर |
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
भीष्म उवाच
दुरुक्तवाचाभिहताः प्राप्नुवन्तीह दुष्कृतम् ||
६६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
भीष्म उवाच
दुरुक्तस्य भय़ाद्राजन्नानुभाषन्ति किञ्चन ||
६५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
दुरुत्सहो वभौ युद्धे यथा रुद्रः प्रतापवान् ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
दुरोदरं च गाण्डीवं मण्डलं च रथं मम ||
१३ ख
सभा पर्व
अध्याय
५२
विदुर उवाच
दुरोदरा विहिता ये तु तत्र; महात्मना धृतराष्ट्रेण राज्ञा |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२
वलदेव उवाच
दुरोदरास्तत्र सहस्रशोऽन्ये; युधिष्ठिरो यान्विषहेत जेतुम् |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१०९
लोमश उवाच
दुर्गं चक्रुरिमं देशं गिरिप्रत्यूहरूपकम् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
भीष्म उवाच
दुर्गं जन्म निधनं चापि राज; न्न भूतिकं ज्ञानविदो वदन्ति |
१०६ क
वन पर्व
अध्याय
९९
लोमश उवाच
दुर्गं समाश्रित्य महोर्मिमन्तं; रत्नाकरं वरुणस्यालय़ं स्म ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
मुनिरु उवाच
दुर्गतीर्था वृहत्कूला करीरीवेत्रसंय़ुता |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
दुर्गमं स्थानमाप्नोति हित्वा देहमिमं नृप ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७५
भृगुरु उवाच
दुर्गमत्वादनन्तत्वादिति मे विद्धि मानद ||
२५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
दुर्गमां पदवीं कृत्वा पितुरासीद्गतज्वरः ||
१३८ ख
वन पर्व
अध्याय
१४०
लोमश उवाच
दुर्गमाः पर्वताः पार्थ समाधिं परमं कुरु ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
दुर्गस्त्वेष मतः पन्था व्राह्मणानां विपश्चिताम् |
५० क
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
दुर्गाणां चाभितो राजा मूलच्छेदं प्रकारय़ेत् |
३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
दुर्गाण्यतितरत्याशु पुरुषः पुरुषोत्तमम् |
१२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१११
युधिष्ठिर उवाच
दुर्गाण्यतितरेद्येन तन्मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
दुर्गातितरणं ये च पठन्ति श्रावय़न्ति च |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
दुर्गात्स तारितो धेन्वा क्षीरनद्यां प्रमोदते ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
दुर्गामन्तःशिलां चैव व्रह्ममेध्यां वृहद्वतीम् |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८२
नारद उवाच
दुर्गे प्रतीकः सुगवो भारं वहति दुर्वहम् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
१४१
भीम उवाच
दुर्गे सन्तारय़िष्यामि यद्यशक्तौ भविष्यतः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
दुर्गेषु च महाराज षट्सु ये शास्त्रनिश्चिताः |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
दुर्ग्रहः पाणिना वाय़ुर्दुःस्पर्शः पाणिना शशी |
३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३३
भीष्म उवाच
दुर्ग्रहो मुष्टिना वाय़ुर्दुःस्पर्शः पाणिना शशी |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
दुर्जातेः सूतपुत्रस्य शकुनेः सौवलस्य च |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
दुर्ज्ञेय़ः परमो धर्मस्तथाधर्मः सुदुर्विदः |
३९ क
वन पर्व
अध्याय
२०५
व्राह्मण उवाच
दुर्ज्ञेय़ः शाश्वतो धर्मः शूद्रय़ोनौ हि वर्तता |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
१९७
स्त्र्यु उवाच
दुर्ज्ञेय़ः शाश्वतो धर्मः स तु सत्ये प्रतिष्ठितः |
३९ क
विराट पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
दुर्ज्ञेय़ाः खलु शूरास्ते अपापास्तपसा वृताः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
दुर्जय़ं भिन्नमर्माणमनय़द्यमसादनम् ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
दुर्जय़स्येन्द्रवपुषः पुत्रोऽग्निसदृशद्युतिः |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
दुर्जय़ानामनीकानि नाजय़ंस्तरसा युधि ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
दुर्जय़ेत्यभिविख्यातः सर्वशास्त्रविशारदः ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४
द्रुपद उवाच
दुर्जय़ो दन्तवक्त्रश्च रुक्मी च जनमेजय़ः |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
दुर्जय़ोऽथ विकर्णश्च कार्ष्णिं पञ्चभिराय़सैः |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
दुर्दर्शं भरतश्रेष्ठ प्रेतराजपुरं यथा ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
उमो उवाच
दुर्दर्शाः केचिदाभान्ति नराः काष्ठमय़ा इव |
४४ क
वन पर्व
अध्याय
२१
वासुदेव उवाच
दुर्दिनं सुदिनं चैव शीतमुष्णं च भारत ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
२०३
व्याध उवाच
दुर्दृशीकस्तमोध्वस्तः सक्रोधस्तामसोऽलसः ||
५ ख
विराट पर्व
अध्याय
४५
अश्वत्थामो उवाच
दुर्द्यूतदेवी गान्धारः शकुनिर्युध्यतामिह ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७३
भीष्म उवाच
दुर्धरं धारय़ामासू राजानश्चैव धार्मिकाः |
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
दुर्धरा पृथिवी मूर्ध्ना दुर्ग्रहः केशवो वलात् ||
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३३
भीष्म उवाच
दुर्धरा पृथिवी मूर्ध्ना दुर्जय़ा व्राह्मणा भुवि ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३९
सञ्जय़ उवाच
दुर्धर्षं दीर्घवाहुं च ये च तेषां पदानुगाः ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
दुर्धर्षमृषभस्कन्धं व्यात्ताननमिवोरगम् ||
६८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
दुर्धर्षस्त्वेष शत्रूणां रणेषु भविता सदा |
४८ क