chevron_left  दुःशासनश्चापिarrow_drop_down
सभा पर्व
अध्याय ६०
दुर्योधन उवाच
दुःशासनश्चापि समीक्ष्य कृष्णा; मवेक्षमाणां कृपणान्पतींस्तान् |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
दुःशासनश्चित्रसेनः शकुनिश्चापि सौवलः |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०६
सञ्जय़ उवाच
दुःशासनस्ततः क्रुद्धः पार्थं विव्याध पञ्चभिः |
३२ क
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
दुःशासनस्तदा राजंश्छित्त्वा चापं महाहवे |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४३
सञ्जय़ उवाच
दुःशासनस्तव सुतः प्रत्युद्गच्छन्महारथः ||
२९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
दुःशासनस्तु तं दृष्ट्वा विरथं व्याय़ुधं कृतम् |
६६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३८
सञ्जय़ उवाच
दुःशासनस्तु तच्छ्रुत्वा दुर्योधनवचस्तदा |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
दुःशासनस्तु नकुलं प्रत्युद्याय़ महारथम् |
२० क
विराट पर्व
अध्याय ५६
वैशम्पाय़न उवाच
दुःशासनस्तु भल्लेन विद्ध्वा वैराटिमुत्तरम् |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
दुःशासनस्तु राजेन्द्र पाञ्चाल्यस्य महात्मनः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९९
सञ्जय़ उवाच
दुःशासनस्तु विंशत्या सात्यकिं प्रत्यविध्यत |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३८
सञ्जय़ उवाच
दुःशासनस्तु सङ्क्रुद्धः प्रभिन्न इव कुञ्जरः |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
दुःशासनस्तु समरे केकय़ान्पञ्च मारिष |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
हंस उवाच
दुःशासनस्तूपहन्ता न शास्ता; नावर्तते मन्युवशात्कृतघ्नः |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३१
युधिष्ठिर उवाच
दुःशासनस्तेऽनुमते तच्चास्माभिरुपेक्षितम् ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४३
सञ्जय़ उवाच
दुःशासनस्त्रिभिर्वाणैर्ललाटे समविध्यत ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९९
सञ्जय़ उवाच
दुःशासनस्त्रिभिर्विद्ध्वा पुनर्विव्याध पञ्चभिः ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७०
सञ्जय़ उवाच
दुःशासनस्त्ववस्थाप्य स्वमनीकममर्षणः |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय १२६
सञ्जय़ उवाच
दुःशासनस्य कौरव्य कुर्वाणं कर्म दुष्करम् |
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८४
धृतराष्ट्र उवाच
दुःशासनस्य च गृहं दुर्योधनगृहाद्वरम् |
१९ क
वन पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
दुःशासनस्य ता वाचः श्रुत्वा ते दारुणोदय़ाः |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
दुःशासनस्य तुतुषुः सर्वे लोका महात्मनः ||
९० ख
विराट पर्व
अध्याय २०
भीमसेन उवाच
दुःशासनस्य पापस्य यन्मय़ा न हृतं शिरः |
४ क
स्त्री पर्व
अध्याय १८
गान्धार्यु उवाच
दुःशासनस्य यत्क्रुद्धोऽपिवच्छोणितमाहवे ||
२८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
दुःशासनस्य रुधिरं दिष्ट्या पीतं त्वय़ानघ ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
दुःशासनस्य रुधिरं पातास्मि मृगराडिव ||
२९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
दुःशासनस्य रुधिरं पीतं विस्फुरतो मय़ा ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५९
सञ्जय़ उवाच
दुःशासनस्य रुधिरं पीतमित्यवधार्यताम् ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४०
सञ्जय़ उवाच
दुःशासनस्य रुधिरं पीत्वा नृत्यन्तमाहवे ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५७
सञ्जय़ उवाच
दुःशासनस्य रुधिरं पीय़तां यदि शक्यते ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
दुःशासनस्य रुधिरं पीय़तां यदि शक्यते ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३९
कर्ण उवाच
दुःशासनस्य रुधिरं यदा पास्यति पाण्डवः |
४७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
दुःशासनस्य रुधिरे पीय़माने महात्मना |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
दुःशासनस्यापि जघान वाहा; नुद्यम्य वाणासनमाजमीढ ||
२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
दुःशासनस्येषुवरं छित्त्वा राधेय़मभ्ययात् ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
दुःशासनादवरजैस्तव पुत्रैर्धनञ्जय़ः ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
दुःशासनादीन्भ्रातॄंश्च स सर्वानेव भारत |
३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३९
व्यास उवाच
दुःशासनादीन्विद्धि त्वं राक्षसाञ्शुभदर्शने ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
दुःशासनादय़ः शक्तास्त्रातुमप्यन्तकाद्रितम् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय २४०
वैशम्पाय़न उवाच
दुःशासनादय़श्चास्य भ्रातरः सर्व एव ते |
४६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
दुःशासनादय़श्चैव धार्तराष्ट्रा महारथाः ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
दुःशासनाय़ चिक्षेप वाणमन्तकरं ततः ||
३७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
दुःशासनाय़ सङ्क्रुद्धः प्रेषय़ामास भारत ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
दुःशासनाय़ समरे प्रेषय़ामास साय़कान् ||
११७ ख
शल्य पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
दुःशासने च निहते नैवाशाम्यत वैशसम् ||
२८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
दुःशासने तु निहते पुत्रास्तव महारथाः |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
दुःशासने दुर्विषहे कर्णे चापि ससौवले |
४४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६१
सञ्जय़ उवाच
दुःशासने यद्रणे संश्रुतं मे; तद्वै सर्वं कृतमद्येह वीरौ |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
दुःशासनेन कौन्तेय़ाः प्रव्रजन्तः परन्तपाः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय २२८
वैशम्पाय़न उवाच
दुःशासनेन च तथा सौवलेन च देविना |
२४ क