शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
दातारं संविभक्तारं मार्दवोपगतं शुचिम् |
२७ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
दातारं सर्वकामानां रक्षितारं प्रजाहितम् |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
राजो उवाच
दातारः क्षत्रिय़ाः प्रोक्ता गृह्णीय़ां भवतः कथम् ||
७३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
दातारः प्रार्थितानां च ते नराः स्वर्गगामिनः ||
९८ ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
दातारः संविभक्तारो दीनानुग्रहकारिणः |
८३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
दातारः सङ्गृहीतार आर्याः करुणवेदिनः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५२
भीष्म उवाच
दातारो न गृहीतारो दय़ावन्तस्तथैव च ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८
अश्मो उवाच
दातारो यज्ञशीलाश्च न तरन्ति जरान्तकौ ||
४७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
दातारो वाससां चैव ते नराः स्वर्गगामिनः ||
९६ ख
वन पर्व
अध्याय
१९४
मार्कण्डेय़ उवाच
दातारौ स्वो वरं तुभ्यं तद्व्रवीह्यविचारय़न् ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
भीष्म उवाच
दातुं निर्वपणं सम्यग्यथावदहमारभम् ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
दातुः प्रतिग्रहीतुश्च धर्माधर्माविमौ शृणु |
४१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
दातुः प्रतिग्रहीतुश्च शृणुष्वानुग्रहं पुनः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०६
मुनिरु उवाच
दातुमर्हति ते वृत्तिं वैदेहः सत्यसङ्गरः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४७
नागभार्यो उवाच
दातुमर्हसि वा तस्य दर्शनं दर्शनश्रवः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
दातुमिच्छति विप्राय़ द्रौपदीं योषितां वराम् ||
२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
दातुमिच्छति सर्वेषां सुहृदामौर्ध्वदेहिकम् ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६०
गन्धर्व उवाच
दातुमैच्छत्ततः कन्यां तस्मै संवरणाय़ ताम् |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
युधिष्ठिर उवाच
दातृप्रतिग्रहीत्रोर्वा को विशेषः पितामह ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
दानं गवां पशूनां वा पिण्डानां चाप्सु मज्जनम् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
दानं च विविधाकारं दीनान्धकृपणेष्वपि ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
दानं च सत्यं च तपश्च राज; ञ्श्रद्धा च शान्तिश्च धृतिः क्षमा च |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
८८
यय़ातिरु उवाच
दानं तपः सत्यमथापि धर्मो; ह्रीः श्रीः क्षमा सौम्य तथा तितिक्षा |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२९८
यक्ष उवाच
दानं तपो व्रह्मचर्यमित्येतास्तनवो मम ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८४
भृगुरु उवाच
दानं तु द्विविधं प्राहुः परत्रार्थमिहैव च |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८६
पराशर उवाच
दानं त्यागः शोभना मूर्तिरद्भ्यो; भूय़ः प्लाव्यं तपसा वै शरीरम् |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९३
भीष्म उवाच
दानं ददत्पवित्री स्यादस्वप्नश्च दिवास्वपन् ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३८
श्रीभगवानु उवाच
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्याय़स्तप आर्जवम् ||
१ ख
सभा पर्व
अध्याय
३५
भीष्म उवाच
दानं दाक्ष्यं श्रुतं शौर्यं ह्रीः कीर्तिर्वुद्धिरुत्तमा |
१९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२६
व्राह्मण उवाच
दानं देवा व्यवसिता दममेव महर्षय़ः ||
१० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४५
व्रह्मो उवाच
दानं प्रतिग्रहं चैव षड्गुणां वृत्तिमाचरेत् ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
दानं प्रशस्यते चास्य यथाशक्ति यथाविधि ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
दानं भूताभय़स्याहुः सर्वदानेभ्य उत्तमम् |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
दानं यज्ञः सतां पूजा वेदधारणमार्जवम् |
४५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६०
युधिष्ठिर उवाच
दानं यज्ञक्रिय़ा चेह किं स्वित्प्रेत्य महाफलम् |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०६
युधिष्ठिर उवाच
दानं वहुविधाकारं शान्तिः सत्यमहिंसता |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
दानं वादानसक्तेषु सर्वमेव प्रकल्पय़ेत् |
६९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
दानं वाप्यथ वा ज्ञानं नाम्नोऽस्याः परमं प्रिय़म् |
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
दानं वाप्युपवासो वा सहस्रगुणितं भवेत् ||
१३८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
दानं विभवतो दत्त्वा नराः स्वर्यान्ति धर्मिणः ||
३० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१८
व्राह्मण उवाच
दानं व्रतं व्रह्मचर्यं यथोक्तव्रतधारणम् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३७
व्यास उवाच
दानं हि भूताभय़दक्षिणाय़ाः; सर्वाणि दानान्यधितिष्ठतीह |
२६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१३
वासुदेव उवाच
दानं हि वेदाध्ययनं तपश्च; कामेन कर्माणि च वैदिकानि ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११३
वृहस्पतिरु उवाच
दानकृद्भिः कृतः पन्था येन यान्ति मनीषिणः |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२१
व्यास उवाच
दानकृद्भिः कृतः पन्था येन यान्ति मनीषिणः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
१०२
वैशम्पाय़न उवाच
दानक्रिय़ाधर्मशीला यज्ञव्रतपराय़णाः |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३९
श्रीभगवानु उवाच
दानक्रिय़ाश्च विविधाः क्रिय़न्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
दानदण्डः स्मृतो वैश्यो निर्दण्डः शूद्र उच्यते ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१५६
वैशम्पाय़न उवाच
दानधर्मतपःशौचैरार्जवेन तितिक्षय़ा ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
दानधर्मतपोय़ुक्तः शीलशौचदय़ात्मकः |
१६ क