शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
द्वे व्रह्मणी वेदितव्ये शव्दव्रह्म परं च यत् |
६० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
द्वे समाप्ते ततः पद्मे सोऽप्सरोभिर्वसेत्सह ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
१९९
मार्कण्डेय़ उवाच
द्वे सहस्रे तु वध्येते पशूनामन्वहं तदा ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५२
भीष्म उवाच
द्वेषक्रोधप्रसक्ताश्च शिष्टाचारवहिष्कृताः |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
द्वेषस्तम्भाभिमानांश्च तैक्ष्ण्यं च परिवर्जय़ेत् ||
६० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
द्वेषो धर्मविशेषाणामेते वै तामसा गुणाः ||
२७ ग
सभा पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
द्वेष्टा ह्यसुखमादत्ते यथैव निधनं तथा ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१५
भीष्म उवाच
द्वेष्टारं न च पश्यामि यो ममाद्य ममाय़ते ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
२३१
वैशम्पाय़न उवाच
द्वेष्टारमन्ये क्लीवस्य पातय़न्तीति नः श्रुतम् ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
४५
सूत उवाच
द्वेष्टारस्तस्य नैवासन्स च न द्वेष्टि कञ्चन |
८ ख
वन पर्व
अध्याय
२२९
वैशम्पाय़न उवाच
द्वेष्यं माद्यैव गच्छध्वं धर्मराजनिवेशनम् ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२४
मन्दपाल उवाच
द्वेष्यं हि हृदि सन्तापं जनय़त्यशिवं मम ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
द्वेष्यमुक्तः प्रिय़ं वक्ष्याम्यनादृत्य तदप्रिय़म् ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय
२२३
द्रौपद्यु उवाच
द्वेष्यैरपक्षैरहितैश्च तस्य; भिद्यस्व नित्यं कुहकोद्धतैश्च ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
द्वेष्यो न साधुर्भवति न मेधावी न पण्डितः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८५
वृहस्पतिरु उवाच
द्वेष्यो भवति भूतानां स सान्त्वमिह नाचरन् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
द्वेष्यो भवति भूतानामुग्रो राजा युधिष्ठिर |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
जमदग्निरु उवाच
द्वेष्यो भार्योपजीवी स्याद्दूरवन्धुश्च वैरवान् |
६४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
द्वेष्योऽत्यन्तमनागाः सन्निति चैनमुवाच ह ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
द्वैधीकृत्य ततः सेनां युद्धं समभवत्तदा ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३८
धृतराष्ट्र उवाच
द्वैधीभवति मे चित्तं ह्रिय़ा तुष्ट्या च सञ्जय़ |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
द्वैधीभावं तथा धर्मे पाण्डवेषु च मत्सरम् |
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
द्वैधीभावस्तथान्येषां संश्रय़ोऽथ परस्य च ||
६६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
द्वैधीभूतं मनो मेऽद्य कृतं संशप्तकैरिदम् ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
द्वैधीभूता महाराज गङ्गेवासाद्य पर्वतम् ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
द्वैधीभूतान्कुरून्दृष्ट्वा माधवोऽर्जुनमव्रवीत् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
द्वैधीभूतेषु लोकेषु विनश्यत्सु च भारत |
४१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४
युधिष्ठिर उवाच
द्वैपाय़न मरुत्तस्य कथां प्रव्रूहि मेऽनघ ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
द्वैपाय़नः केशवो द्रोणपुत्रं; परस्परेणाभिशापैः शशाप ||
१५६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
द्वैपाय़नः शुकश्चैव कृष्णश्च मधुसूदनः |
१९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
द्वैपाय़नः सशिष्यश्च सिद्धाश्चान्ये मनीषिणः |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
भीष्म उवाच
द्वैपाय़नप्रभृतय़स्तथैवेमे तपोधनाः |
४ क
वन पर्व
अध्याय
२५
अर्जुन उवाच
द्वैपाय़नप्रभृतय़ो नारदश्च महातपाः ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
द्वैपाय़नप्रसादाच्च जीवतो मोक्षमाहवे ||
४३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
द्वैपाय़नप्रसादाच्च त्वमपीदं तपोवनम् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४७
भीष्म उवाच
द्वैपाय़नमुखाद्भ्रष्टं श्लाघय़ा परय़ानघ ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८२
वैशम्पाय़न उवाच
द्वैपाय़नवचः कृत्स्नं संस्मरन्वै नरर्षभ ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
द्वैपाय़नवचः श्रुत्वा कुपिते च धनञ्जय़े |
१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
द्वैपाय़नवचः श्रुत्वा गर्भेषु प्रमुमोच ह ||
३३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
द्वैपाय़नवचः श्रुत्वा शिनेर्नप्ता कृताञ्जलिः |
३८ क
शल्य पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
द्वैपाय़नश्च धर्मात्मा तत्रैवाप्लुत्य भारत |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
द्वैपाय़नस्तथोक्तस्तु पुनरेव युधिष्ठिरम् |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
द्वैपाय़नस्य राजेन्द्र ततः कौरवमव्रवीत् ||
६७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
द्वैपाय़नस्य वदतो नारदस्य च धीमतः ||
१६३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११८
भीष्म उवाच
द्वैपाय़नस्य संवादं कीटस्य च युधिष्ठिर ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
द्वैपाय़नह्रदं ख्यातं यत्र दुर्योधनोऽभवत् ||
५३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
द्वैपाय़नादीन्विप्रांश्च तैश्च प्रत्यभिनन्दितः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
द्वैपाय़नादृषिश्रेष्ठात्सञ्जय़ं वाक्यमव्रवीत् ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
द्वैपाय़नाभ्यनुज्ञातः पुरस्कृत्य पुरोहितम् |
१९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
द्वैपाय़नाभ्यनुज्ञाता निषेदुर्विपुलौजसः ||
२६ ख