वन पर्व
अध्याय
१९८
मार्कण्डेय़ उवाच
द्वितीय़मिदमाश्चर्यमित्यचिन्तय़त द्विजः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
१०६
लोमश उवाच
द्वितीय़मुदकं वव्रे पितॄणां पावनेप्सय़ा ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
१६३
अर्जुन उवाच
द्वितीय़श्चापि मे मासो जलं भक्षय़तो गतः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
द्वितीय़सागरनिभं तद्वलं वहुलध्वजम् |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
द्वितीय़स्तु ततस्तेषां श्रीमान्हरिहय़ोपमः |
४७ क
वन पर्व
अध्याय
२३
वासुदेव उवाच
द्वितीय़स्येव सूर्यस्य युगान्ते परिविष्यतः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९८
मनुरु उवाच
द्वितीय़ा मिथुनव्यक्तिमविशेषान्निय़च्छति ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
द्वितीय़ा वा भवेच्छूद्रा न तु दृष्टान्ततः स्मृता ||
५१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
द्वितीय़ां पुरुषव्याघ्रः कक्ष्यां निष्क्रम्य पार्थिवः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
१७२
गन्धर्व उवाच
द्वितीय़ामस्य मा भाङ्क्षं प्रतिज्ञामिति निश्चय़ात् ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
द्वितीय़ामिव सम्प्राप्ताममन्यन्त निशां तदा ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
२१४
मार्कण्डेय़ उवाच
द्वितीय़ाय़ामभिव्यक्तस्तृतीय़ाय़ां शिशुर्वभौ |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
द्वितीय़े दिवसे यस्तु प्राश्नीय़ादेकभोजनम् |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
अष्टावक्र उवाच
द्वितीय़े शय़ने दिव्ये संविवेश महाप्रभे ||
४९ ख
वन पर्व
अध्याय
२९
प्रह्लाद उवाच
द्वितीय़े सति वध्यस्तु स्वल्पेऽप्यपकृते भवेत् ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
द्वितीय़ेन रथेनैनमन्वय़ातां परन्तपम् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
२७३
मार्कण्डेय़ उवाच
द्वितीय़ेन सनाराचं भुजं भूमौ न्यपातय़त् ||
२२ ख
विराट पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
द्वितीय़ेनार्जुनं वीरः प्रत्यविध्यत्स्तनान्तरे ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
७२
वाहुक उवाच
द्वितीय़ो दमय़न्त्या वै श्वोभूत इति भामिनि ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
द्वितीय़ो विक्षराद्यस्तु नराधिप महासुरः |
४० क
वन पर्व
अध्याय
२३
वासुदेव उवाच
द्विधा कृतं ततः सौभं सुदर्शनवलाद्धतम् |
३४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३८
कुन्त्यु उवाच
द्विधा कृत्वात्मनो देहं भूमौ च गगनेऽपि च |
९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३९
व्यास उवाच
द्विधा कृत्वात्मनो देहमादित्यं तपतां वरम् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२३
वासुदेव उवाच
द्विधा चकार सहसा प्रजज्वाल च तेजसा ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
द्विधा चिच्छेद तां भीमस्तदद्भुतमिवाभवत् ||
९३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
द्विधा चिच्छेद ते पुत्रः क्षुरप्रेण महारथः ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
द्विधा चिच्छेद भल्लेन प्रहसन्निव भारत ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
द्विधा चिच्छेद सङ्क्रुद्धो द्रौणिः परमकोपनः ||
४१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
द्विधा चिच्छेद समरे कृतहस्तः प्रतापवान् ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
द्विधा चिच्छेद समरे प्रतिविन्ध्यो हसन्निव ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३७
सञ्जय़ उवाच
द्विधा चिच्छेद समरे प्रहसन्निव कौरवः ||
२६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
द्विधा चिच्छेद समरे सौवलस्य हसन्निव ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
द्विधा चिच्छेद हार्दिक्यः कृतहस्तः स्मय़न्निव ||
३७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७४
वैशम्पाय़न उवाच
द्विधा त्रिधा च चिच्छेद ख एव खगमैस्तदा ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
द्विधा त्रिधा च चिच्छेद खगतानेव भारत ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
२२
वासुदेव उवाच
द्विधा त्रिधा चाच्छिनमाशु मुक्तै; स्ततोऽन्तरिक्षे निनदो वभूव ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९४
सञ्जय़ उवाच
द्विधा त्रिधा तानकरोत्सुदर्शनः; शरोत्तमैः स्यन्दनवर्यमास्थितः ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
द्विधा त्रिधाष्टधैकैकं छित्त्वा विव्याध तान्रणे ||
४५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
द्विधा रङ्गः समभवत्स्त्रीणां द्वैधमजाय़त |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
द्विधाभूत इवादित्य उदय़े प्रत्यदृश्यत |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२१८
शक्र उवाच
द्विधाभूतेषु लोकेषु निश्चितेष्वावय़ोस्तथा |
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
२८०
मार्कण्डेय़ उवाच
द्विधेव हृदय़ं कृत्वा तं च कालमवेक्षती ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
५९
वृहदश्व उवाच
द्विधेव हृदय़ं तस्य दुःखितस्याभवत्तदा |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
द्विनामा शन्तनोः पुत्रः शन्तनोरधिको गुणैः ||
४४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९९
वैशम्पाय़न उवाच
द्विपक्षगरुडप्रख्यैर्द्वारैर्घोरप्रदर्शनैः |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
द्विपञ्चरात्रं तिष्ठन्ति सततं सूतिकागृहे ||
३५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०१
नारद उवाच
द्विपञ्चशिरसः केचित्केचित्सप्तमुखास्तथा |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८६
पराशर उवाच
द्विपदानामपि तथा द्विजा वै परमाः स्मृताः ||
२० ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२२९
व्यास उवाच
द्विपदानि द्वय़ान्याहुः पार्थिवानीतराणि च |
१४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
द्विपशैलप्रतीकाशाः प्रादुरासन्महाननाः ||
१५ ख