उद्योग पर्व
अध्याय
१८२
भीष्म उवाच
द्वादशेषून्प्राहिणवं रणेऽहं; ततः शक्तीर्व्यधमं घोररूपाः ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६८
गन्धर्व उवाच
द्वादशेऽथ ततो वर्षे स जज्ञे मनुजर्षभ |
२५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
द्वादशेऽहनि तेभ्यः स कृतशौचो नराधिपः |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
द्वादशैते जनपदाः शरार्ता व्रणपीडिताः |
७७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
द्वादशैते जनपदाः सर्वे शूरास्तनुत्यजः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
द्वादशैव तथादित्यान्वामं पार्श्वं समास्थितान् ||
४८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
द्वादशैव तु वर्षाणि वने धिष्ण्याद्विवासिताः |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
द्वादशैवादितेः पुत्राः शक्रमुख्या नराधिप |
३५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
द्वादश्यामीहमानस्य नित्यमेव प्रदृश्यते |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
द्वापरं विद्धि तं राजन्सम्भूतमरिमर्दनम् ||
७२ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
द्वापरं शकुनिः प्राप धृष्टद्युम्नस्तु पावकम् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
द्वापरस्य कलेश्चैव सन्धौ पर्यवसानिके |
८२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
द्वापरस्य युगस्यान्ते आदौ कलिय़ुगस्य च |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५९
द्युमत्सेन उवाच
द्वापरे तु द्विपादेन पादेन त्वपरे युगे ||
३२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
भीष्म उवाच
द्वापरे मैथुनो धर्मः प्रजानामभवन्नृप |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
द्वापरे यज्ञमेवाहुर्दानमेव कलौ युगे ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
द्वापरे विप्लवं यान्ति यज्ञाः कलिय़ुगे तथा ||
६२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३०
व्यास उवाच
द्वापरे विप्लवं यान्ति वेदाः कलिय़ुगे तथा |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
५५
वृहदश्व उवाच
द्वापरेण सहाय़ेन कले व्रूहि क्व यास्यसि ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
१४८
हनूमानु उवाच
द्वापरेऽपि युगे धर्मो द्विभागोनः प्रवर्तते |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय
७६
देवय़ान्यु उवाच
द्वाभ्यां कन्यासहस्राभ्यां दास्या शर्मिष्ठय़ा सह |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
७६
यय़ातिरु उवाच
द्वाभ्यां कन्यासहस्राभ्यां द्वे कन्ये परिवारिते |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
द्वाभ्यां क्षुराभ्यां च तथैव राज्ञ; श्चिच्छेद चापं कुरुपुङ्गवस्य ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
२१४
मार्कण्डेय़ उवाच
द्वाभ्यां गृहीत्वा पाणिभ्यां शक्तिं चान्येन पाणिना |
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
द्वाभ्यां च सुविकृष्टाभ्यां क्षुराभ्यां ध्वजकार्मुके |
४२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
द्वाभ्यां च सुविकृष्टाभ्यां शराभ्यामरिमर्दनः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५६
वासुदेव उवाच
द्वाभ्यां जातो हि मातृभ्यामर्धदेहः पृथक्पृथक् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
द्वाभ्यां तु रथय़न्तारं त्रिभिश्चास्य त्रिवेणुकम् |
४७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७७
सञ्जय़ उवाच
द्वाभ्यां त्रिभिः शरैश्चान्यान्पार्थो विव्याध मारिष ||
४२ ख
सभा पर्व
अध्याय
२०
जरासन्ध उवाच
द्वाभ्यां त्रिभिर्वा योत्स्येऽहं युगपत्पृथगेव वा ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
द्वाभ्यां द्वाभ्यां च विव्याध गौतमप्रभृतीन्रथान् |
३१ क
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
द्वाभ्यां द्वाभ्यां महाराज शराभ्यां रणमूर्धनि ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
द्वाभ्यां द्वाभ्यां यमौ सार्धं रथाभ्यां रथपुङ्गवौ |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
द्वाभ्यां द्वाभ्यां सुपुङ्खाभ्यां चिच्छेद परमास्त्रवित् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८२
वासुदेव उवाच
द्वाभ्यां निवारितो नित्यं वृणोम्येकतरं न च ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
२१४
मार्कण्डेय़ उवाच
द्वाभ्यां भुजाभ्यां वलवान्गृहीत्वा शङ्खमुत्तमम् |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
२१४
मार्कण्डेय़ उवाच
द्वाभ्यां भुजाभ्यामाकाशं वहुशो निजघान सः |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
द्वाभ्यां मद्रेश्वरं विद्ध्वा सारथिं च त्रिभिः शरैः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९१
भीष्म उवाच
द्वाभ्यां मुक्तं त्रिभिर्मुक्तमष्टाभिस्त्रिभिरेव च ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
द्वाभ्यां विद्ध्वानदद्धृष्टः शराभ्यां शत्रुतापनः ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
द्वाभ्यां शतसहस्राभ्यां पदातीनां च धन्विनाम् |
९४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
द्वाभ्यां शराभ्यां शकुनिस्त्रिभिर्दुर्योधनो नृपः ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
द्वाभ्यां शराभ्यां हार्दिक्यश्चकर्त सशरं धनुः |
५० क
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
द्वाभ्यां शराभ्यां हार्दिक्यो निचकर्त द्विधा तदा ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
द्वाभ्यामथ शिताग्राभ्यामुभौ च पार्ष्णिसारथी ||
६३ ख
सभा पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
द्वाभ्यामेकं फलं प्रादात्पत्नीभ्यां भरतर्षभ ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३५
व्यास उवाच
द्वाभ्यामेकश्चतुर्थस्तु व्रह्मसत्रे व्यवस्थितः |
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९४
सञ्जय़ उवाच
द्वाभ्यामेव तु मासाभ्यां कृपः शारद्वतोऽव्रवीत् |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४०
विदुर उवाच
द्वाभ्यामय़ं सह गच्छत्यमुत्र; पुण्येन पापेन च वेष्ट्यमानः ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
द्वारं च विवृताकारं ललाटेन समाहनत् |
१० क