द्रोण पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
द्रोणेन सहपुत्रेण वीरेण यदि मन्यसे ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
द्रोणेन सहपुत्रेण सहसेना महावलाः ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५६
वासुदेव उवाच
द्रोणेनाचार्यकं कृत्वा छद्मना सत्यविक्रमः ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
द्रोणेनानुगृहीतश्च दिव्यैरस्त्रैरुदारधीः ||
६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२५
गान्धार्यु उवाच
द्रोणेनाभिमुखाः सर्वे भ्रातरः पञ्च केकय़ाः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
द्रोणेनावद्धकवचो राजा दुर्योधनस्तदा |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
द्रोणेनैव सह क्रुद्धाः सात्यकिं पर्यवारय़न् ||
५३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७८
अर्जुन उवाच
द्रोणेनैषा मतिः कृष्ण धार्तराष्ट्रे निवेशिता |
११ क
विराट पर्व
अध्याय
४४
कृप उवाच
द्रोणो दुर्योधनो भीष्मो भवान्द्रौणिस्तथा वय़म् |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
७२
सञ्जय़ उवाच
द्रोणो द्रुपदपुत्रस्य खड्गं च दशभिः शरैः ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
द्रोणो द्रुपदपुत्रस्य पुनश्चिच्छेद कार्मुकम् ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
द्रोणो द्रुपदपुत्रस्य मध्ये चिच्छेद कार्मुकम् ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
द्रोणो द्रुपदपुत्राय़ प्राहिणोत्पञ्च साय़कान् ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
द्रोणो द्रौणिः कृपः कर्णः कृतवर्मा च सौवलः |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
द्रोणो द्रौणिः कृपः शल्यः कृतवर्मा च सात्वतः |
४९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
द्रोणो भीष्मः कृपः शल्यः सौमदत्तिश्च संय़ुगे |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
द्रोणो भूरिश्रवाः शल्यो भगदत्तश्च मारिष |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
द्रोणो यस्याद्य मुच्येत यो वा द्रोणात्पराङ्मुखः ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
द्रोणो यौधिष्ठिरं सैन्यं वहुधा व्यधमच्छरैः ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सूत उवाच
द्रोणो वा रथिनां श्रेष्ठः कृपो मद्रेश्वरोऽपि वा |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
द्रोणो विकर्णोऽथ जय़द्रथश्च; भूरिश्रवाः कृतवर्मा कृपश्च |
७३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
द्रोणो व्यमोहय़च्छत्रून्सर्वसैन्यानि चाभिभो ||
४२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
कृप उवाच
द्रोणो व्रह्मास्त्रनिर्दग्धं प्रेषय़ामास मृत्यवे ||
१०२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
४
कृप उवाच
द्रोणो हतेति यद्वाचः पाञ्चालानां शृणोम्यहम् ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
युधिष्ठिर उवाच
द्रोणो हि वलवाञ्शूरः कृतास्त्रश्च जितश्रमः |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८९
धृतराष्ट्र उवाच
द्रोणो हि वलवाञ्शूरः कृतास्त्रो दृढविक्रमः |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३९
सञ्जय़ उवाच
द्रोणो हि वलवान्युद्धे क्षिप्रहस्तः पराक्रमी |
२१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
द्रोणोपदिष्टं तस्याय़ं कालः सम्प्रति पाण्डव ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
द्रोणोपदेशान्विविधान्दर्शय़ानो महामनाः ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
द्रोणोऽचिरेणाकरोच्च महीं शोणितकर्दमाम् ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
द्रोणोऽजय़न्महावाहुः शतशोऽथ सहस्रशः ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३७
सञ्जय़ उवाच
द्रोणोऽपि पाण्डुपाञ्चालान्व्यधमद्रजनीमुखे ||
५१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
द्रोणोऽपि युधि विक्रान्तो युय़ुधानं समाहितः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
द्रोणोऽपि रथिनां श्रेष्ठः पाञ्चालान्पाण्डवांस्तथा |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
द्रोणोऽपि रभसो युद्धे मम पीडय़ते वलम् |
८३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५४
व्राह्मण उवाच
द्रोणोऽपि रामं शुश्राव दित्सन्तं वसु सर्वशः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
द्रोणोऽपि शस्त्राण्युत्सृज्य परमं साम्यमास्थितः ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
द्रोणोऽपि समरे राजन्माधवस्य महद्धनुः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
द्रोहाद्देवैरवाप्तानि दिवि स्थानानि सर्वशः |
२८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
द्रौणाय़निं चाभ्यहनत्पृषत्कै; र्वज्राग्निवैवस्वतदण्डकल्पैः ||
५२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३९
सञ्जय़ उवाच
द्रौणाय़निं त्रिभिर्विद्ध्वा विव्याधान्यैः शितैः शरैः ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
द्रौणाय़निर्द्रौपदेय़ं शरवर्षैरवाकिरत् ||
३१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३९
सञ्जय़ उवाच
द्रौणाय़निशरच्छन्नं न प्राज्ञाय़त किञ्चन |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
द्रौणाय़निश्च सङ्क्रुद्धौ भीमसेनमभिद्रुतौ ||
१९ ख
विराट पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
द्रौणिं कृपं चैव गुरूंश्च सर्वा; ञ्शरैर्विचित्रैरभिवाद्य चैव ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
द्रौणिं च सोमदत्तं च शकुनिं चापि सौवलम् |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
द्रौणिं च सोमदत्तं च सर्वांश्च भरतान्पृथक् ||
४७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
द्रौणिं च सौमदत्तिं च कृतवर्माणमेव च |
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
द्रौणिं त्यक्त्वा ततो युद्धे कौन्तेय़ः शत्रुतापनः |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
द्रौणिं पराजित्य ततोग्रधन्वा; कृत्वा महद्दुष्करमार्यकर्म |
५५ क