chevron_left  द्रुपदश्चेकितानश्चarrow_drop_down
भीष्म पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
द्रुपदश्चेकितानश्च सात्यकिश्च महारथः |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
द्रुपदसुतवरिष्ठाः पञ्च शैनेय़षष्ठा; द्रुपददुहितृपुत्राः पञ्च चामित्रसाहाः |
३३ क
कर्ण पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
द्रुपदसुतसखस्तदाकरो; त्पुरुषरथाश्वगजक्षय़ं महत् ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
द्रुपदस्तस्य तच्छ्रुत्वा हर्षमाहारय़त्परम् |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
द्रुपदस्तु ततो राजा सैन्धवं वै जय़द्रथम् |
५२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
द्रुपदस्तु स्वय़ं राजा भगदत्तेन सङ्गतः |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
द्रुपदस्य कुले कन्या वेदिमध्यादनिन्दिता ||
९५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६१
सञ्जय़ उवाच
द्रुपदस्य कुले जातः सर्वास्त्रेष्वस्त्रवित्तमः |
४२ क
आदि पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
द्रुपदस्य कुले जाता कन्या सा देवरूपिणी |
१४ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
द्रुपदस्य कुले जाता भवद्भिश्चोपजीविता |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय १८८
भीष्म उवाच
द्रुपदस्य कुले जाता भविष्यसि महारथः |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
द्रुपदस्य कुले जाता शिखण्डी भरतर्षभ ||
६० ख
वन पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
द्रुपदस्य कुले जातां स्नुषां पाण्डोर्महात्मनः |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९९
सञ्जय़ उवाच
द्रुपदस्य च नाराचं प्रेषय़ामास भारत ||
५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
द्रुपदस्य च पुत्राणां पौत्राणां सुहृदामपि |
६२ क
आदि पर्व
अध्याय १९८
वैशम्पाय़न उवाच
द्रुपदस्य च पुत्राणां यथा दत्तानि कौरवैः ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९९
सञ्जय़ उवाच
द्रुपदस्य च भल्लेन धनुश्चिच्छेद मारिष ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६१
सञ्जय़ उवाच
द्रुपदस्य ततः पौत्रास्त्रय़ एव विशां पते |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
कृप उवाच
द्रुपदस्य तथा पुत्रा द्रुपदश्च महास्त्रवित् |
३८ क
वन पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
द्रुपदस्य तथा पुत्रा धृष्टद्युम्नपुरोगमाः |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
द्रुपदस्य सपुत्रस्य विराटस्य च संनिधौ |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९३
यक्षा ऊचुः
द्रुपदस्य सुता राजन्राज्ञो जाता शिखण्डिनी |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय १९२
वैशम्पाय़न उवाच
द्रुपदस्यात्मजांश्चान्यान्सर्वय़ुद्धविशारदान् ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३२
सञ्जय़ उवाच
द्रुपदस्यात्मजान्दृष्ट्वा कुन्तिभोजसुतांस्तथा |
१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १७
वैशम्पाय़न उवाच
द्रुपदस्यात्मजाश्चैव द्रोणपुत्रेण पातिताः ||
३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १०
वैशम्पाय़न उवाच
द्रुपदस्यात्मजाश्चैव द्रौपदेय़ाश्च पातिताः ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९
वैशम्पाय़न उवाच
द्रुपदस्याप्यभूत्सेना नानादेशसमागतैः |
११ क
सभा पर्व
अध्याय ३४
शिशुपाल उवाच
द्रुपदे तिष्ठति कथं माधवोऽर्हति पूजनम् ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
द्रुपदेनैवमुक्तस्तु भारद्वाजः प्रतापवान् |
१० क
आदि पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
द्रुपदेनैवमुक्तोऽहं मन्युनाभिपरिप्लुतः |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय १८९
व्यास उवाच
द्रुपदैषा हि सा जज्ञे सुता ते देवरूपिणी |
४७ क
भीष्म पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
द्रुपदो द्रौपदेय़ाश्च सर्वशः पृथिवीपते |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६२
विदुर उवाच
द्रुपदो मत्स्यराजश्च सङ्क्रुद्धश्च धनञ्जय़ः |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
द्रुपदो वर्धय़न्मानं शिखण्डिपरिपालितः |
५ क
आदि पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
द्रुपदो वीक्ष्य सन्त्रासाद्व्राह्मणाञ्शरणं गतः ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय १९७
विदुर उवाच
द्रुपदोऽपि महान्राजा कृतवैरश्च नः पुरा |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
द्रुम इत्यभिविख्यातः स आसीद्भुवि पार्थिवः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१२
भीष्म उवाच
द्रुमं यथा वाप्युदके पतन्त; मुत्सृज्य पक्षी प्रपतत्यसक्तः |
४९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
द्रुमशाखा इवाविध्य निष्पिष्टा रथिनो रणे ||
३८ ख
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
द्रुमसेन इति ख्यातः पृथिव्यां सोऽभवन्नृपः ||
३२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
द्रुमसेनं चतुःषष्ट्या निजघान महारथः ||
५२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४५
सञ्जय़ उवाच
द्रुमसेनस्तु सङ्क्रुद्धो राजन्विव्याध पत्रिणा |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय १२८
भीष्म उवाच
द्रुमाः केचन सामन्ता ध्रुवं छिन्दन्ति तानपि |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२०
भीष्म उवाच
द्रुमाः शाखाश्च मुमुचुः शिखराणि च पर्वताः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४४
भीष्म उवाच
द्रुमाग्रेषु च रम्येषु रमिताहं त्वय़ा प्रिय़ ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
द्रुमाचलाग्राम्वुधरैः समरूपाः सुकल्पिताः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय १४३
वैशम्पाय़न उवाच
द्रुमाणां वातभग्नानां पततां भूतले भृशम् |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
सञ्जय़ उवाच
द्रुमाणां शिखराणीव दावदग्धानि मारिष |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
द्रुमाद्रुक्मी महातेजा विजय़ं प्रत्यपद्यत ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
द्रुमै रत्नमय़ैश्चैत्रैर्भास्वरैश्च पतत्रिभिः |
२ क