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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८३
वैशम्पाय़न उवाच
ततो गाण्डीवभृच्छूरो मागधेन समाहतः |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
ततो गाण्डीवभृच्छूरो युद्धाय़ समवस्थितः |
१ क
वन पर्व
अध्याय ११५
अकृतव्रण उवाच
ततो गाधिः सुतां तस्मै जन्याश्चासन्सुरास्तदा |
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
ततो गान्धारकैर्गुप्तं पृष्ठैरश्वैर्जय़े धृतम् |
४३ क
आदि पर्व
अध्याय १०३
वैशम्पाय़न उवाच
ततो गान्धारराजस्य पुत्रः शकुनिरभ्ययात् |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
ततो गान्धारराजस्य पुत्रः शकुनिरव्रवीत् |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
ततो गान्धारराजस्य पुत्रः शकुनिरव्रवीत् |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय १०३
वैशम्पाय़न उवाच
ततो गान्धारराजस्य प्रेषय़ामास भारत ||
१० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८५
वैशम्पाय़न उवाच
ततो गान्धारराजस्य मन्त्रिवृद्धपुरःसरा |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
ततो गान्धारराजस्य सुतौ परपुरञ्जय़ौ |
२ क
सभा पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
ततो गान्धारी विदुरश्चैव विद्वां; स्तमुत्पातं घोरमालक्ष्य राज्ञे |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
ततो गावो निवृत्तास्ता अगोपाः स्वं निवेशनम् |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
ततो गिरः पुरुषवरस्तवान्विता; द्विजेरिताः पथि सुमनाः स शुश्रुवे |
७२ क
वन पर्व
अध्याय १६३
अर्जुन उवाच
ततो गिरिमिवात्यर्थमावृणोन्मां महाशरैः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
ततो गिरिवरश्रेष्ठे चित्रकूटे विशां पते |
५५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२७
भीष्म उवाच
ततो गिरिसुता दृष्ट्वा दीप्ताग्निसदृशेक्षणम् |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९४
राम उवाच
ततो गुणैः सुवहुभिः श्रेष्ठो नाराय़णोऽभवत् ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय २७२
मार्कण्डेय़ उवाच
ततो गुरुतरं यत्नमातिष्ठद्वलिनां वरः ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
ततो गुरुतरां दीप्तां गदां हेमपरिष्कृताम् |
४३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
ततो गुरुसुता तस्य पद्मपत्रनिभेक्षणा |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४२
सञ्जय़ उवाच
ततो गुर्वीं महाघोरां हेमचित्रां महागदाम् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
भीष्म उवाच
ततो गृध्रवचः श्रुत्वा विक्रोशन्तस्तदा नृप |
१२ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
ततो गृध्रवटं गच्छेत्स्थानं देवस्य धीमतः |
७९ क
शल्य पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
ततो गृहीत्वा तीक्ष्णाग्रमर्धचन्द्रं सुतेजनम् |
४६ क
वन पर्व
अध्याय ७६
वृहदश्व उवाच
ततो गृह्याश्वहृदय़ं तदा भाङ्गस्वरिर्नृपः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय ११९
वैशम्पाय़न उवाच
ततो गोक्षीरकुन्देन्दुमृणालरजतप्रभः |
४ क
वन पर्व
अध्याय २१
वासुदेव उवाच
ततो गोक्षीरकुन्देन्दुमृणालरजतप्रभम् |
३० क
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
ततो गोदावरीं प्राप्य नित्यं सिद्धनिषेविताम् |
३० क
वन पर्व
अध्याय २२९
वैशम्पाय़न उवाच
ततो गोपाः प्रगातारः कुशला नृत्तवादिते |
८ क
सभा पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
ततो गोपालकच्छं च सोत्तमानपि चोत्तरान् |
३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ७
धृतराष्ट्र उवाच
ततो ग्लानमनास्तात नष्टसञ्ज्ञ इवाभवम् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
ततो गय़ां समासाद्य व्रह्मचारी जितेन्द्रिय़ः |
७१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४९
सञ्जय़ उवाच
ततो घटोत्कचः खड्गमुद्गृह्याद्भुतदर्शनम् |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४९
सञ्जय़ उवाच
ततो घटोत्कचो राजन्नलम्वलवधेप्सय़ा |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
ततो घटोत्कचो राजन्प्रेक्ष्य भीमं तथागतम् |
४८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
ततो घटोत्कचो वाणैर्दशभिर्गौतमीसुतम् |
९१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
ततो घटोत्कचो वाणैर्दशभिर्द्रौणिमाहवे |
२९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
ततो घोरं महाराज अस्त्रय़ुद्धमवर्तत |
२३ क
वन पर्व
अध्याय २५५
वैशम्पाय़न उवाच
ततो घोरतरः शव्दो रणे समभवत्तदा |
२ क
वन पर्व
अध्याय २५४
वैशम्पाय़न उवाच
ततो घोरतरः शव्दो वने समभवत्तदा |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
ततो जगति राजेन्द्र सततं शव्दितं वुधैः |
१४० क
वन पर्व
अध्याय ९६
लोमश उवाच
ततो जगाम कौरव्य सोऽगस्त्यो भिक्षितुं वसु |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४२
भीष्म उवाच
ततो जगाम तूर्णं च चम्पां चम्पकमालिनीम् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय १९८
मार्कण्डेय़ उवाच
ततो जगाम मिथिलां जनकेन सुरक्षिताम् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८३
भीष्म उवाच
ततो जगाम वसुधां वाणवेगप्रपीडितः |
२० क
सभा पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
ततो जगाम विदुरो धृतराष्ट्रनिवेशनम् |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय १९८
वैशम्पाय़न उवाच
ततो जगाम विदुरो धृतराष्ट्रस्य शासनात् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५०
नारद उवाच
ततो जगाम सा कन्या कौशिकीं भरतर्षभ |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
ततो जगृहतुः प्रीतौ धनुर्वाणं च सुप्रभम् |
७३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
व्यास उवाच
ततो जगौ परं जप्यं साञ्जलिप्रग्रहः प्रभुः ||
३३ ग