भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु तौ पितापुत्रौ भारद्वाजं रथे स्थितौ |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२९
भीष्म उवाच
ततस्तु त्रिशते काले लभते द्विजतामपि |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु त्वरितो भीमः क्राथं निन्ये यमक्षय़म् |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु त्वरय़न्योधाञ्शङ्खशव्देन मारिष |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३०
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु दुर्मदश्चैव दुष्कर्णश्च तवात्मजौ |
३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु दुर्योधनभोजसौवलाः; कृपश्च शारद्वतसूनुना सह |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु दृष्ट्वार्जुनवासुदेवौ; पदातिनागाश्वरथैः समन्तात् |
७६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
भीष्म उवाच
ततस्तु देववचनान्मणिभद्रो महाय़शाः |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु द्रुपदः क्रोधाच्छरवर्षमवाकिरत् |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु द्रुपदानीकं शरैश्छिन्नतनुच्छदम् |
२१ क
विराट पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तु द्रौपदी गत्वा तदा भीमं महानसे |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु द्रौपदीपुत्राः सौभद्रश्च महारथः |
३६ क
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु द्रौपदेय़ाश्च ते च मत्ता महाद्विपाः |
६० क
शान्ति पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
ततस्तु द्वापरं नाम स कालः सम्प्रवर्तते ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२९
भीष्म उवाच
ततस्तु द्विशते काले लभते काण्डपृष्ठताम् |
११ क
सभा पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तु धर्मराजस्य शासनाद्भरतर्षभः |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु नकुलः शूरो धर्मराजे प्रपीडिते |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
११८
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तु नगरात्तूर्णमाज्यहोमपुरस्कृताः |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
ततस्तु निधनं प्राप्तः कालपर्याय़चोदितः |
९० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
ततस्तु निधनं प्राप्य व्रह्मय़ोनौ प्रजाय़ते ||
४९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु निशितैर्वाणैस्तदनीकं वृकोदरः |
५० क
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु नृपतिः क्रुद्धो भीमसेनं स्तनान्तरे |
४५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तु पाण्डवाः सर्वे द्रौपदी च यशस्विनी |
४४ क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु पाण्डवानीकान्निःसृत्य वहवो जनाः |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु पाण्डवो ज्येष्ठः खड्गचर्म समाददे |
३५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३८
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु पार्षतः क्रुद्धः शस्त्रवृष्टिं सुदारुणाम् |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय
१५४
व्राह्मण उवाच
ततस्तु पृषतेऽतीते स राजा द्रुपदोऽभवत् |
८ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तु प्रकृतीः सर्वाः समानाय़्य युधिष्ठिरः |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु प्रत्वरन्पार्थो दीर्घकालं सुसम्भृतम् |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तु पय़सो धारां पुष्टिहेतोर्महात्मनः |
७८ क
शल्य पर्व
अध्याय
४९
सिद्धा ऊचुः
ततस्तु फलमूलानि पवित्राणि च भारत |
५७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८
शल्य उवाच
ततस्तु भगवानिन्द्रः प्रहृष्टः समपद्यत |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तु भगवान्विप्रो वसिष्ठोऽऽश्रममभ्ययात् |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तु भीमोऽद्भुतवीर्यकर्मा; महावलो वज्रसमानवीर्यः |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु मद्राधिपतिः प्रहृष्टो; धनुर्विकृष्य व्यसृजत्पृषत्कान् |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु मद्राधिपतिर्महात्मा; युधिष्ठिरं भीमवलं प्रसह्य |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२५
व्यास उवाच
ततस्तु मूलमासाद्य वाय़ुः सम्भवमात्मनः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६४
भीष्म उवाच
ततस्तु यज्ञे सावित्री साक्षात्तं संन्यमन्त्रय़त् |
१० क
वन पर्व
अध्याय
५८
वृहदश्व उवाच
ततस्तु याते वार्ष्णेय़े पुण्यश्लोकस्य दीव्यतः |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तु यादवश्रेष्ठो धृतराष्ट्रमधोक्षजः |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
ततस्तु ये निवर्तन्ते जाय़न्ते वा पुनः पुनः |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु रथिनां श्रेष्ठो गदां गृह्य महाहवे |
२९ क
शल्य पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु रभसो भीमो गदय़ा तनय़ं तव |
५१ क
वन पर्व
अध्याय
२६८
मार्कण्डेय़ उवाच
ततस्तु राजवचनाद्राक्षसाः कामरूपिणः |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु राजा सिन्धूनां रथश्रेष्ठो जय़द्रथः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
२४८
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तु राजा सिन्धूनां वार्द्धक्षत्रिर्महाय़शाः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
४०
सूत उवाच
ततस्तु राजानममित्रतापनं; समीक्ष्य ते तस्य नृपस्य मन्त्रिणः |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८१
भीष्म उवाच
ततस्तु लव्धसञ्ज्ञोऽहं ज्ञात्वा सूतमथाव्रुवम् |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
१०६
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तु वरय़ित्वा तामानाय़्य पुरुषर्षभः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
ततस्तु वामनं गत्वा सर्वपापप्रमोचनम् |
११२ क