सभा पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तमजितं जेतुं जरासन्धं वृकोदरः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
२७०
मार्कण्डेय़ उवाच
ततस्तमतिकाय़ेन साश्वं सरथसारथिम् |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
ततस्तमपरं विप्रं याचे विनिमय़ेन वै |
१७ क
विराट पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तमपि कौन्तेय़ः शरेणानतपर्वणा |
२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८४
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तमपि कौन्तेय़ः समरेष्वपराजितः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६५
भीष्म उवाच
ततस्तमभ्यगाद्राजन्राजधर्मा खगोत्तमः |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय
५२
कुरुरु उवाच
ततस्तमभ्यनुज्ञाप्य प्रहृष्टेनान्तरात्मना |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
ततस्तमभ्ययात्तूर्णं रुचिपर्वाकृतीसुतः |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४
व्यास उवाच
ततस्तमव्रवीच्छङ्खस्तपसेदं कृतं मय़ा |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
१८७
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तमव्रवीद्राजा धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
ततस्तमश्विनावूचतुः |
७३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७
अगस्त्य उवाच
ततस्तमहमाविग्नमवोचं भय़पीडितम् ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३५
सञ्जय़ उवाच
ततस्तमाचार्यसुतं धृष्टद्युम्नः प्रतापवान् |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तमाश्रमं पुण्यं नरनाराय़णाश्रितम् |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
ततस्तमिषुजालेन याज्ञसेनिः समावृणोत् |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तमीश्वरादिष्टा वुद्धिः क्षिप्रं विवेश सा ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०९
गुरुरु उवाच
ततस्तमुपवर्तन्ते गुणा राजसतामसाः |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तमृषिसङ्घातं निराशं चिन्तय़ान्वितम् |
५० क
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
ततस्तमेकं वहवः परिवार्य समन्ततः |
७८ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
ततस्तमेव शरणं गतोऽस्मि विधिवत्तदा |
११२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
ततस्तमेवाधिरथिः स्यन्दनं दुर्मुखे हते |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११४
गालव उवाच
ततस्तव भवित्रीय़ं पुत्राणां जननी शुभा |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
ततस्तव महत्सैन्यं गोविन्दप्रेरिता हय़ाः |
८६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
ततस्तव सुता राजञ्श्रुत्वा भ्रातुर्वचो द्रुतम् |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३०
सञ्जय़ उवाच
ततस्तव सुता राजन्भीमस्य रथमाव्रजन् |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
ततस्तव सुता राजन्सैनिकाश्च विशां पते |
४२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
ततस्तव सुतादिष्टा नानाजनपदेश्वराः |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
ततस्तव सुतो राजंश्चिन्तय़ाभिपरिप्लुतः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
ततस्तव सुतो राजन्दृष्ट्वा सैन्यं तथागतम् |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
ततस्तव सुतो राजन्वर्म जग्राह काञ्चनम् |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९१
उतथ्य उवाच
ततस्तस्मादपक्रम्य सागच्छत्पाकशासनम् |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
ततस्तस्मादवप्लुत्य गजाद्भारत भारतः |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
ततस्तस्माद्भय़ान्मुक्तो दुर्लभं प्राप्य जीवितम् |
११८ क
वन पर्व
अध्याय
१७८
सर्प उवाच
ततस्तस्माद्विमानाग्रात्प्रच्युतश्च्युतभूषणः |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय
४६
मन्त्रिण ऊचुः
ततस्तस्मिंस्तु दिवसे सप्तमे समुपस्थिते |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तस्मिन्क्षणे कर्णः सलाजकुसुमैर्घटैः |
३६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तस्मिन्क्षणे काल्ये रथेनादित्यवर्चसा |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
ततस्तस्मिन्क्षणे राजंश्चोदितो वानरध्वजः |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
१६२
गन्धर्व उवाच
ततस्तस्मिन्गिरिवरे शुचिर्भूत्वा कृताञ्जलिः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
१६३
गन्धर्व उवाच
ततस्तस्मिन्गिरिश्रेष्ठे देवगन्धर्वसेविते |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६९
व्राह्मण उवाच
ततस्तस्मिन्दिवं प्राप्ते नृगे भरतसत्तम |
३० क
आदि पर्व
अध्याय
२८
सूत उवाच
ततस्तस्मिन्द्विजश्रेष्ठ समुदीर्णे तथाविधे |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८३
भीष्म उवाच
ततस्तस्मिन्निपतिते रामे भूरिसहस्रदे |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२०
भीष्म उवाच
ततस्तस्मिन्पदे नित्ये निर्गुणे लिङ्गवर्जिते |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२६
सञ्जय़ उवाच
ततस्तस्मिन्परित्राणमलव्धवति फल्गुनात् |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
९९
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तस्मिन्प्रतिज्ञाते भीष्मेण कुरुनन्दन |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
ततस्तस्मिन्प्रनृत्ते वै स्थावरं जङ्गमं च यत् |
१०० क
शल्य पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तस्मिन्प्रनृत्ते वै स्थावरं जङ्गमं च यत् |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
ततस्तस्मिन्भय़े घोरे देवानां समुपस्थिते |
६२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
भीष्म उवाच
ततस्तस्मिन्महाघोरे सन्ध्याकाले युगान्तिके |
४३ क