वन पर्व
अध्याय
२२८
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रय़ाणे नृपतेः सुमहानभवत्स्वनः |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
१०९
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रय़ातः कौन्तेय़ः क्रमेण भरतर्षभ |
१ क
वन पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रय़ातः कौशिक्याः पाण्डवो जनमेजय़ |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रय़ातः सहसा भीष्मः शान्तनवोऽर्जुनम् |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रय़ातः सहसा सैन्यं तव स सात्यकिः |
७५ क
वन पर्व
अध्याय
१४४
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रय़ातमात्रेषु पाण्डवेषु महात्मसु |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रय़ाताः कुरवो जवेन; श्रुत्वैव शङ्खस्वनमीर्यमाणम् |
५९ क
आदि पर्व
अध्याय
१८६
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रय़ाताः कुरुपुङ्गवास्ते; पुरोहितं तं प्रथमं प्रय़ाप्य |
३ क
वन पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रय़ाते कौन्तेय़े वनं मानुषवर्जितम् |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३५
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रय़ाते दाशार्हे कुरवः सङ्गता मिथः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रय़ाते दाशार्हे धृष्टद्युम्नोऽपि पार्षतः |
४६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रय़ाते दाशार्हे प्रावाद्यन्तैकपुष्कराः |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रय़ाते राजेन्द्र कर्णे नरवरोत्तमे |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रय़ाते सहसा भारद्वाजे महारथे |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रय़ातो दाशार्हः श्रुत्वा पाण्डवभाषितम् |
५७ क
वन पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रय़ान्तं कौन्तेय़ं व्राह्मणा वनवासिनः |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
कर्ण उवाच
ततः प्रय़ान्तं त्वरितं धनञ्जय़ं; शतक्रतुं वृत्रनिजघ्नुषं यथा |
६५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५
भीष्म उवाच
ततः फलानि पत्राणि शाखाश्चापि मनोरमाः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८४
पराशर उवाच
ततः फलार्थं चरति भवन्ति ज्याय़सो गुणाः |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
ततः फल्गुं व्रजेद्राजंस्तीर्थसेवी नराधिप |
८६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
ततः शकुनिनिर्दिष्टाः सादिनः शूरसंमताः |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
१५९
वैशम्पाय़न उवाच
ततः शक्तिं गदां खड्गं धनुश्च भरतर्षभ |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
२९४
वैशम्पाय़न उवाच
ततः शक्तिं प्रज्वलितां प्रतिगृह्य विशां पते |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८२
भीष्म उवाच
ततः शक्तिं प्राहिणोद्घोररूपा; मस्त्रै रुद्धो जामदग्न्यो महात्मा |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
ततः शक्तिं महाघोरां कालरात्रिमिवोद्यताम् |
३७ क
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
ततः शक्तिं महाघोरां रुक्मदण्डामय़स्मय़ीम् |
६१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
ततः शक्तिं महाराज हेमदण्डां दुरासदाम् |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
ततः शक्तिं महावेगां स्वर्णवैडूर्यभूषिताम् |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
ततः शक्तिगदाखड्गतोमरर्ष्टिपरश्वधैः |
७२ क
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
ततः शक्त्यस्त्रमददद्भगवान्पाकशासनः |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
ततः शक्नोति शत्रूणां प्रहर्तुमविचारय़न् ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६
शल्य उवाच
ततः शक्रं ज्वलनोऽप्याह भागं; प्रय़च्छ मह्यं तव साह्यं करिष्ये |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०३
भृगुरु उवाच
ततः शक्रं समानाय़्य देवानाह पितामहः |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
२९४
वैशम्पाय़न उवाच
ततः शक्रः प्रहसन्वञ्चय़ित्वा; कर्णं लोके यशसा योजय़ित्वा |
३९ क
विराट पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
ततः शक्रः सुरगणैः समारुह्य सुदर्शनम् |
३ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
ततः शक्रः सुरपतिः श्रिय़ा परमय़ा युतः |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८
शल्य उवाच
ततः शक्रः स्तूय़मानो गन्धर्वाप्सरसां गणैः |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
१८९
व्यास उवाच
ततः शक्रः स्पृष्टमात्रस्तय़ा तु; स्रस्तैरङ्गैः पतितोऽभूद्धरण्याम् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१६४
अर्जुन उवाच
ततः शक्रस्य भवनमपश्यममरावतीम् |
४२ क
वन पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
ततः शक्राभ्यनुज्ञात आसने विष्टरोत्तरे |
११ क
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
ततः शक्राशनिसमैर्मुष्टिभिर्भृशदारुणैः |
४४ क
वन पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
ततः शक्रासने पुण्ये देवराजर्षिपूजिते |
२० क
वन पर्व
अध्याय
१६९
मातलिरु उवाच
ततः शक्रेण भगवान्स्वय़म्भूरभिचोदितः |
३० क
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
ततः शक्रो महातेजास्तं दिदृक्षुरुपागमत् |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
ततः शक्रोऽभिसङ्क्रुद्धस्त्रिदशानां महेश्वरः |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
ततः शक्रोऽव्रवीत्पार्थं कृतास्त्रं काल आगते |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
५२
कुरुरु उवाच
ततः शक्रोऽव्रवीद्देवान्राजर्षेर्यच्चिकीर्षितम् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
११०
लोमश उवाच
ततः शक्ष्ये लोभय़ितुमृश्यशृङ्गमृषेः सुतम् ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०१
वैशम्पाय़न उवाच
ततः शङ्का समभवद्रक्षिणां तं मुनिं प्रति |
१० क
विराट पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
ततः शङ्खं प्रदध्मौ स द्विषतां लोमहर्षणम् |
२१ क