कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
त्वां हि प्राप्य रणे क्षत्रमेकाहादिति भारत |
४६ क
विराट पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
त्वां हि मत्स्यो महीपालः शून्यपालमिहाकरोत् ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
त्वां हि माधव संश्रित्य निर्भय़ा मोहदर्पितम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
त्वां हि राज्ये स्थितं स्फीते समग्राङ्गमरोगिणम् |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
७७
वासुदेव उवाच
त्वां हि लोकास्त्रय़ः पार्थ ससुरासुरमानुषाः |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
त्वां हि व्रह्मर्षय़ो लोके देवाश्चामितविक्रम |
६९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०७
मुनिरु उवाच
त्वादृशं हि कुले जातमनृशंसं वहुश्रुतम् |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
उपमन्युरु उवाच
त्वादृशेन हि देवानां श्लाघनीय़ः समागमः |
२ क
सभा पर्व
अध्याय
३४
शिशुपाल उवाच
त्वादृशो धर्मय़ुक्तो हि कुर्वाणः प्रिय़काम्यया |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
२२०
मन्दपाल उवाच
त्वामग्ने जलदानाहुः खे विषक्तान्सविद्युतः |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६
वृहस्पतिरु उवाच
त्वामग्ने जलदानाहुर्विद्युतश्च त्वमेव हि |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
त्वामग्रतः पुरस्कृत्य भीष्मं पश्यामहे वय़म् ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
त्वामद्य निहनिष्यामि क्रौञ्चमग्निसुतो यथा ||
५६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
त्वामद्य निहनिष्यामि गदय़ा नात्र संशय़ः ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
त्वामद्य पुरुषव्याघ्रं लोके सन्तः प्रचक्षते ||
९२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
त्वामद्य सन्तो मन्यन्ते यय़ातिमिव नाहुषम् ||
२७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
त्वामद्य समरे हत्वा कृतकृत्योऽस्मि विज्वरः ||
५१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२९
वैशम्पाय़न उवाच
त्वामनादृत्य भीष्मं च पतिमिच्छन्ति पाण्डवम् ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय
५९
विदुर उवाच
त्वामन्वेतारो वहवः कुरूणां; द्यूतोदय़े सह दुःशासनेन ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
त्वामप्यतिवलं शक्रं देवराजं वलोत्कटम् |
५५ क
शल्य पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
त्वामप्यद्य हनिष्यामि गदय़ा नात्र संशय़ः ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
त्वामप्येवं सुदुर्धर्षं ज्वलन्तं परय़ा श्रिय़ा |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
त्वामप्येवङ्गतं त्यक्त्वा क्षिप्रमन्यं गमिष्यति ||
५९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
त्वामर्थय़न्ते गोविन्द दिवि शक्रमिवामराः |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
त्वामर्दय़ेत निशितैः पृषत्कै; स्तदा पश्चात्तप्स्यसे सूतपुत्र ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२०
मन्दपाल उवाच
त्वामष्टधा कल्पय़ित्वा यज्ञवाहमकल्पय़न् ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
९२
स्त्र्यु उवाच
त्वामहं कामय़े राजन्कुरुश्रेष्ठ भजस्व माम् |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
१४५
व्राह्मण उवाच
त्वामहं जीवितस्यार्थे साध्वीमनपकारिणीम् |
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
११२
वैशम्पाय़न उवाच
त्वामहं नरशार्दूल गच्छन्तमनिवर्तिनम् ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
त्वामहं पतिमासाद्य कां गमिष्यामि वै गतिम् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४०
वैशम्पाय़न उवाच
त्वामहं भ्रातृभिः सार्धं यद्व्रवीमि तथा कुरु ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
त्वामागतं च संश्रुत्य युद्धाय़ हय़सारिणम् |
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
त्वामाव्रजेद्यदि रहः सा पुत्र वरवर्णिनी |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
त्वामाश्रित्य महावाहो धर्मराजो युधिष्ठिरः |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
त्वामासाद्य महाय़ुद्धे निहताः पाण्डुनन्दन ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८२
नारद उवाच
त्वामासाद्य यदुश्रेष्ठमेधन्ते ज्ञातिनः सुखम् ||
३० ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१६
वृहस्पतिरु उवाच
त्वामाहुरेकं कवय़स्त्वामाहुस्त्रिविधं पुनः |
२ क
सभा पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
त्वामाह्वय़ामहे राजन्स्थिरो युध्यस्व मागध |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
त्वामिदानीं कथं युद्धे न हनिष्यामि विक्रमात् ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
त्वामिहैकाकिनीं दृष्ट्वा निर्जने गहने वने |
१० ख
वन पर्व
अध्याय
६४
ऋतुपर्ण उवाच
त्वामुपस्थास्यतश्चेमौ नित्यं वार्ष्णेय़जीवलौ |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
त्वामृते क्रोधदीप्तो हि पीड्यमाने वृकोदरे ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
७५
दमय़न्त्यु उवाच
त्वामृते न हि लोकेऽन्य एकाह्ना पृथिवीपते |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
त्वामृते पुरुषव्याघ्र तथा मूर्धानमालभे ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
१४१
भीम उवाच
त्वामृते पुरुषव्याघ्र नोत्सहेद्विनिवर्तितुम् ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
त्वामृते पुरुषव्याघ्र शार्दूलसमविक्रमम् ||
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
त्वामृते भूतभव्येश त्वं ह्येषां प्रत्यरिर्वधे ||
५५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
देवा ऊचुः
त्वामृते सारथिं तत्र नान्यं पश्यामहे वय़म् |
१०५ क
आदि पर्व
अध्याय
२२०
मन्दपाल उवाच
त्वामेकमाहुः कवय़स्त्वामाहुस्त्रिविधं पुनः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
त्वामेकमाहुः पुरुषं त्वामाहुः सात्वतां पतिम् |
४ क