chevron_left  त्वत्प्रसादाद्धृषीकेशarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय १२४
सञ्जय़ उवाच
त्वत्प्रसादाद्धृषीकेश जगत्स्थावरजङ्गमम् |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२४
सञ्जय़ उवाच
त्वत्प्रसादाद्धृषीकेश शक्रः सुरगणेश्वरः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
त्वत्प्रसादाद्भय़ं न स्यात्तस्मान्मम महामुने ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय ४१
अर्जुन उवाच
त्वत्प्रसादाद्विनिर्वृत्तः समर्थः स्यामहं यथा ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
त्वत्प्रसादाद्वय़ं चैव कृतार्थाः पुरुषर्षभ |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
त्वत्प्रसादान्न मां व्रूय़ुरकृतास्त्रं विचक्षणाः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय १०१
देवा ऊचुः
त्वत्प्रसादान्निरुद्विग्नास्त्वय़ैव परिरक्षिताः ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
ऋषिरु उवाच
त्वत्प्रसादान्महादेव तपो मे न क्षरेत वै |
११२ क
वन पर्व
अध्याय १०३
लोमश उवाच
त्वत्प्रसादान्महाभाग लोकैः प्राप्तं महत्सुखम् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय १०१
देवा ऊचुः
त्वत्प्रसादान्महावाहो लोकाः सर्वे जगत्पते |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२३
सञ्जय़ उवाच
त्वत्प्रसादान्महीं कृत्स्नां सम्प्राप्स्यति युधिष्ठिरः ||
२८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
त्वत्प्रसादान्महीपाल शोको नास्मान्प्रवाधते ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
त्वत्प्रसादेन देवेश सुखिनो विवुधाः सदा ||
६१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३८
रुद्र उवाच
त्वत्प्रसादेन भगवन्स्वाध्याय़तपसोर्मम |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय १४६
व्राह्मण्यु उवाच
त्वत्प्रसूतिः प्रिय़ा प्राप्ता न मां तप्स्यत्यजीवितम् ||
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२७
महेश्वर उवाच
त्वत्प्रिय़ार्थं च मे देवि प्रकृतिस्थः क्षणात्कृतः ||
४५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५
शल्य उवाच
त्वत्प्रिय़ार्थं हि मे सर्वं प्राणा राज्यं धनानि च ||
२५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५५
गौतम उवाच
त्वत्प्रीतिय़ुक्तेन मय़ा गुरुशुश्रूषय़ा तव |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८२
अर्जुन उवाच
त्वत्प्रीत्यर्थं हि कौरव्य कृतमेतन्मय़ानघ |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५०
वासुदेव उवाच
त्वत्प्रीत्या गुह्यमेतच्च कथितं मे धनञ्जय़ ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय १८७
देव उवाच
त्वत्प्रीत्या तु प्रवक्ष्यामि यथेदं विसृजाम्यहम् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
त्वत्प्रय़ुक्तः पुनरहं किं न कुर्यां महाहवे ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
त्वत्प्रय़ुक्तो नरेन्द्रेह किमुतैतत्सुदुर्वलम् ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
त्वत्प्रय़ुक्तो ह्यहं राजन्किं न कुर्यां महाहवे ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
त्वत्संनिधौ च सीदेत वाचस्पतिरपि व्रुवन् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय २२३
द्रौपद्यु उवाच
त्वत्संनिधौ यत्कथय़ेत्पतिस्ते; यद्यप्यगुह्यं परिरक्षितव्यम् |
८ क
वन पर्व
अध्याय ६८
वृहदश्व उवाच
त्वत्संनिधौ समादेक्ष्ये सुदेवं द्विजसत्तमम् ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
इन्द्र उवाच
त्वत्संस्पर्शात्सर्वलोको विभे; त्यश्रद्धेय़ं वदसे हव्यवाह ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
त्वत्संय़ोगाच्च दुष्येत कन्याभावो ममानघ ||
६१ ख
वन पर्व
अध्याय १८४
सरस्वत्यु उवाच
त्वत्संय़ोगादहमेतदव्रुवं; भावे स्थिता तथ्यमर्थं यथावत् ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
त्वत्समं समरे योधं नान्यं पश्यामि चिन्तय़न् ||
२६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
त्वत्समा नास्ति लोकेऽस्मिन्नद्य सीमन्तिनी शुभे ||
५६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
त्वत्समो नास्ति लोकेऽस्मिन्क्षत्रिय़ः पृथिवीचरः |
३५ क
वन पर्व
अध्याय २४६
व्यास उवाच
त्वत्समो नास्ति लोकेऽस्मिन्दाता मात्सर्यवर्जितः ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
त्वत्समो भविता लोके सत्यमेतद्व्रवीमि ते ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
व्यास उवाच
त्वत्सम्भूता भूतकृतो वरेण्य; गोप्तारोऽद्य भुवनं पूर्वदेवाः |
६६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५६
वासुदेव उवाच
त्वत्सहाय़ो नरव्याघ्र लोकानां हितकाम्यया |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
त्वत्सहाय़ो ह्यहं कृष्ण त्रीँल्लोकान्वै समागतान् |
४ क
आदि पर्व
अध्याय २७
सूत उवाच
त्वत्सहाय़ौ खगावेतौ भ्रातरौ ते भविष्यतः ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
त्वत्सुताः कर्णमस्मार्षुस्तर्तुकामा इव प्लवम् ||
४१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
त्वत्स्नेहपाशवद्धा च हीय़ेय़ं तपसः परात् |
४१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
त्वत्स्वर्गहीना हीनार्थाः स्मरन्तः सुकृतस्य ते |
४० क
आदि पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
त्वदङ्गेभ्यः प्रसूतोऽय़ं पुरुषात्पुरुषोऽपरः |
६४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५६
उत्तङ्क उवाच
त्वदधीनः स राजेन्द्र तं त्वा भिक्षे नरेश्वर ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
त्वदधीना वय़ं सर्वे कृष्णस्य च महात्मनः ||
१४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ६
युधिष्ठिर उवाच
त्वदधीनाः स्म राजेन्द्र व्येतु ते मानसो ज्वरः ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय ७६
देवय़ान्यु उवाच
त्वदधीनास्मि भद्रं ते सखा भर्ता च मे भव ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय २०५
व्याध उवाच
त्वदनुग्रहवुद्ध्या तु विप्रैतद्दर्शितं मय़ा |
६ क
विराट पर्व
अध्याय ५५
अर्जुन उवाच
त्वदन्यः पुरुषः सत्सु व्रूय़ादेवं व्यवस्थितः ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
श्रीकृष्ण उवाच
त्वदन्यः शक्नुय़ाद्धन्तुमपि वज्रधरः स्वय़म् ||
९३ ख