chevron_left  त्वगस्थिमांसंarrow_drop_down
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
त्वगस्थिमांसं शुक्रं च शोणितं च महामते |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
युधिष्ठिर उवाच
त्वगस्थिमांसमुत्सृज्य तैश्च भूतैर्विवर्जितः |
३१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४५
नारद उवाच
त्वगस्थिमात्रशेषः स षण्मासानभवन्नृपः ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
त्वग्घ्राणश्रोत्रचक्षूंषि रसनं वाक्च संय़ता |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
त्वङ्कारं नामधेय़ं च ज्येष्ठानां परिवर्जय़ेत् |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४८
भीष्म उवाच
त्वङ्कारो वा वधो वेति विद्वत्सु न विशिष्यते |
२७ ख
वन पर्व
अध्याय २१०
मार्कण्डेय़ उवाच
त्वङ्नेत्रे च सुवर्णाभे कृष्णे जङ्घे च भारत ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९३
वसिष्ठ उवाच
त्वङ्मांसं रुधिरं मेदः पित्तं मज्जास्थि स्नाय़ु च |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९३
वसिष्ठ उवाच
त्वङ्मांसं रुधिरं मेदः पित्तं मज्जास्थि स्नाय़ु च |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९३
करालजनक उवाच
त्वङ्मांसं शोणितं चैव मातृजान्यपि शुश्रुम |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय ११९
वैशम्पाय़न उवाच
त्वचं नैवास्य विभिदुः सारत्वात्पृथुवक्षसः ||
३७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २२
इन्द्रिय़ाण्यू ऊचुः
त्वचा च शव्दमादत्स्व वुद्ध्या स्पर्शमथापि च ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७९
वसिष्ठ उवाच
त्वचा लोम्नाथ शृङ्गैश्च वालैः क्षीरेण मेदसा |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
त्वचा स्पृशति च स्पर्शान्वुद्धिर्विक्रिय़तेऽसकृत् |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
त्वचो विनिर्भिद्य पिवन्वसामसृ; क्तथैव मज्जां पिशितानि चाश्नुवन् |
४८ क
वन पर्व
अध्याय २१४
शिवो उवाच
त्वच्चित्तमिङ्गितैर्ज्ञात्वा प्रेषितास्मि तवान्तिकम् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय ७४
वृहदश्व उवाच
त्वच्छापदग्धः सततं सोऽग्नाविव समाहितः ||
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३२
जनक उवाच
त्वज्जिज्ञासार्थमद्येह विद्धि मां धर्ममागतम् ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४४
कर्ण उवाच
त्वत्कृते किं नु पापीय़ः शत्रुः कुर्यान्ममाहितम् ||
६ ख
सभा पर्व
अध्याय ६१
भीम उवाच
त्वत्कृते क्लिश्यते क्षुद्रैर्नृशंसैर्निकृतिप्रिय़ैः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय २९०
सूर्य उवाच
त्वत्कृते तान्प्रधक्ष्यामि सर्वानपि न संशय़ः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय २०३
पितामह उवाच
त्वत्कृते दर्शनादेव रूपसम्पत्कृतेन वै |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
त्वत्कृते न च मे किञ्चिदकर्तव्यं कथञ्चन ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
त्वत्कृते न विनश्येय़ुः क्षत्रिय़ाः क्षत्रिय़र्षभ ||
४९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
त्वत्कृते न विनश्येय़ुरेते भरतसत्तम ||
५७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
त्वत्कृते निहतः शेते शरतल्पे महाय़शाः |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
त्वत्कृते पुरुषव्याघ्र तदाशु क्रिय़तां विभो ||
४९ ख
सभा पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
त्वत्कृते पृथिवी सर्वा मद्वशे कृष्ण वर्तते |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७९
वैशम्पाय़न उवाच
त्वत्कृते मम पुत्रेण वालेन समितिञ्जय़म् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय ७०
वृहदश्व उवाच
त्वत्कृते यातुमिच्छामि विदर्भान्हय़कोविद |
१७ क
वन पर्व
अध्याय ६५
वृहदश्व उवाच
त्वत्कृते वन्धुवर्गाश्च गतसत्त्वा इवासते ||
२८ ग
कर्ण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
त्वत्कृते वर्तते घोरः पार्थिवानां जनक्षय़ः ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
त्वत्कृते व्यचरत्सङ्ख्ये स तु षोडशवर्षवत् ||
४९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
त्वत्कृते सुकृताँल्लोकान्गच्छेय़ं द्विपदां वर ||
१९ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
त्वत्कृते सुकृताँल्लोकान्गच्छेय़ं भरतर्षभ ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय ५३
वृहदश्व उवाच
त्वत्कृते हि मय़ा वीर राजानः संनिपातिताः ||
३ ख
विराट पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
त्वत्कृते ह्यद्य पश्यामि राज्यमात्मानमेव च |
४५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
त्वत्कृते ह्यहमद्राक्षं दह्यमानां वरूथिनीम् |
४५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
त्वत्कृते ह्येष कर्णोऽपि न्यस्तशस्त्रो महारथः |
३६ क
शल्य पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
त्वत्कृतेऽसौ हतः शेते शरतल्पे प्रतापवान् |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय ११३
वैशम्पाय़न उवाच
त्वत्कृतेऽहं पृथुश्रोणि गच्छेय़ं पुत्रिणां गतिम् ||
३० ग
आदि पर्व
अध्याय ५३
शौनक उवाच
त्वत्त इच्छामहे श्रोतुं सौते त्वं वै विचक्षणः ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय २२३
द्रोण उवाच
त्वत्त एताः पुनः शुक्र वीरुधो हरितच्छदाः |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३३
अर्जुन उवाच
त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
त्वत्तः कमलपत्राक्ष विस्तरेण यथातथम् |
१२८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
त्वत्तः कीदृक्कदा वेति तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११६
युधिष्ठिर उवाच
त्वत्तः कुलहितं वाक्यं श्रुत्वा राज्यहितोदय़म् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय १२६
राजो उवाच
त्वत्तः कृशतरं किं नु व्रवीतु भगवानिदम् |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय ११२
वैशम्पाय़न उवाच
त्वत्तः प्रतिविशिष्टश्च कोऽन्योऽस्ति भुवि मानवः ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
त्वत्तः प्रवर्तते कालस्त्वय़ि कालश्च लीय़ते |
१७ क