आदि पर्व
अध्याय
१३८
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिषु लोकेषु यद्राज्यं धर्मविद्योऽर्हते नृपः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
त्रिषु लोकेषु यद्वृत्तं सर्वं तव मते स्थितम् |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
त्रिषु लोकेषु ये केचित्प्राणिनः सर्व एव ते |
३६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५६
सौदास उवाच
त्रिषु लोकेषु विख्याते तदभिज्ञानमानय़ ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९९
भीष्म उवाच
त्रिषु लोकेषु सर्वत्र पूजितो यस्तडागवान् ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
त्रिषु वर्णेषु जातो हि व्राह्मणाद्व्राह्मणो भवेत् ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४९
भीष्म उवाच
त्रिषु वर्णेषु ये पुत्रा व्राह्मणस्य युधिष्ठिर |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिषु वर्षेषु पूर्णेषु दिप्तानलसमद्युतिम् |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिषु वर्षेषु पूर्णेषु प्रजाताहमरिन्दम |
५८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०९
भीष्म उवाच
त्रिष्वप्रमाद्यन्नेतेषु त्रीँल्लोकानवजेष्यसि |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
जनक उवाच
त्रिष्वाश्रमेषु को न्वर्थो भवेत्परमभीप्सतः ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक् |
७५ क
वन पर्व
अध्याय
२१
वासुदेव उवाच
त्रिसामा हन्यतामेषा दुन्दुभिः शत्रुभीषणी ||
९ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
त्रिसाहस्रपरो दाय़ः स्त्रिय़ो देय़ो धनस्य वै |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
त्रिसाहस्रा यय़ुर्भीमं शक्त्यृष्टिप्रासपाणय़ः ||
३५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
त्रिसाहस्रा रथा राजंस्तव पुत्रेण चोदिताः |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
त्रिस्तनीमेकपादां च त्रिजटामेकलोचनाम् ||
४४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
त्रिय़ामा रजनी चैषा घोररूपा भय़ानका |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
८४
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिय़ुगौ पुण्डरीकाक्षौ वासुदेवधनञ्जय़ौ ||
४ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
त्रिय़ोजनगतस्यापि तस्य यास्याम्यहं पदम् |
१३ क
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
त्रिय़ोजनाय़तं सद्म त्रिस्कन्धं योजनादधि |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५५
भीष्म उवाच
त्रीँल्लोकांस्तपसा सिद्धाः पश्यन्ति सुसमाहिताः ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
त्रीँल्लोकानद्य सङ्क्रुद्धो नृपोऽय़ं धक्ष्यतीति वै ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
भीष्म उवाच
त्रीँल्लोकाननुशासत्सु विष्णौ गर्भत्वमागते ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
त्रीँल्लोकानपरान्विप्रमुत्पतन्तं स्वतेजसा |
४१ क
वन पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
त्रीँल्लोकान्गुह्यकांश्चैव गन्धर्वांश्च सपन्नगान् |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
त्रीँल्लोकान्व्याप्य भूतात्मा भुङ्क्ते विश्वभुगव्ययः ||
१४० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
त्रीँल्लोकान्सममुद्युक्तान्किं पुनः कौरवं वलम् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
त्रींश्च शूद्रान्विनीतांश्च शुचीन्कर्मणि पूर्वके ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३६
व्यास उवाच
त्रींश्चैवाग्नीन्यजेत्सम्यगात्मन्येवात्ममोक्षणात् |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
त्रींश्चैवेमान्गुणान्पश्य मत्स्थान्मूर्तिविवर्जितान् ||
५४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
त्रींस्त्रिरात्रान्स सन्धाय़ गन्धर्वनगरे वसेत् ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
११२
वैशम्पाय़न उवाच
त्रीञ्शाल्वांश्चतुरो मद्रान्सुतान्भरतसत्तम ||
३३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४५
व्रह्मो उवाच
त्रीणि कर्माणि यानीह व्राह्मणानां तु जीविका |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९९
याज्ञवल्क्य उवाच
त्रीणि कल्पसहस्राणि एतेषामहरुच्यते |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
त्रीणि काञ्चनमेकं तु रौप्यं कार्ष्णाय़सं तथा ||
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
त्रीणि ज्योतींषि पुरुष इति वै देवलोऽव्रवीत् |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
त्रीणि तेजांसि नोच्छिष्ट आलभेत कदाचन |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
त्रीणि तेजांसि नोच्छिष्ट उदीक्षेत कदाचन |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
त्रीणि देवाः पवित्राणि व्राह्मणानामकल्पय़न् |
६४ क
विराट पर्व
अध्याय
३८
वृहन्नडो उवाच
त्रीणि पञ्चशतं चैव शक्रोऽशीति च पञ्च च ||
४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३
भीष्म उवाच
त्रीणि पापानि काय़ेन सर्वतः परिवर्जय़ेत् ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
वसिष्ठ उवाच
त्रीणि पूर्वाण्यपत्यानि मम तानि न संशय़ः |
२६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
त्रीणि वर्षसहस्राणि चरिष्यसि महीमिमाम् |
१० ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
त्रीणि वर्षसहस्राणि त्रेताय़ुगमिहोच्यते |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
त्रीणि वर्षाणि यः प्राशेत्सततं त्वेकभोजनम् |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
त्रीणि वर्षाण्युदीक्षेत कन्या ऋतुमती सती |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४८
शौनक उवाच
त्रीणि वर्षाण्युपास्याग्निं भ्रूणहा विप्रमुच्यते ||
२४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
त्रीणि श्रोत्रिय़भार्याय़ां परदारे तु द्वे स्मृते ||
५५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
त्रीणि श्लोकसहस्राणि तावन्त्येव शतानि च |
२११ क