भीष्म पर्व
अध्याय
३९
श्रीभगवानु उवाच
त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
त्रिविधा वेदना चैव सर्वसत्त्वेषु दृश्यते |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
त्रिविधा वेदना येषु प्रसूता सर्वसाधना ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
त्रिविधाः पुरुषा राजन्नुत्तमाधममध्यमाः |
५६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२१
व्यास उवाच
त्रिविधानीह वृत्तानि नरस्याहुर्मनीषिणः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
त्रिविधे मोक्षधर्मेऽस्मिन्गताध्वा छिन्नसंशय़ः ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३
व्यास उवाच
त्रिविषाणाश्चतुर्नेत्राः पञ्चपादा द्विमेहनाः |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७
अगस्त्य उवाच
त्रिविष्टपं प्रपद्यस्व पाहि लोकाञ्शचीपते |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१०
व्यास उवाच
त्रिविष्टपगता राजन्सुरभिः प्रारुदत्किल |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५०
भीष्म उवाच
त्रिविष्टपसमं मन्ये तवाय़तनमेव ह ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
९८
लोमश उवाच
त्रिविष्टपसमप्रख्यं दधीचाश्रममागमन् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
त्रिविष्टपे जातमतिर्यदा नर; स्तदास्य वुद्धिर्विषय़ेषु भिद्यते ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०६
मुनिरु उवाच
त्रिविष्टपे पुण्यतमं स्थानं प्राप्नोति पार्थिवः |
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
त्रिविष्टपे महत्स्थानमवापासुलभं नरैः ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिविष्टव्धं च वासश्च प्रतिगृह्णन्त्यवुद्धय़ः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०७
गुरुरु उवाच
त्रिवीजमिन्द्रदैवत्यं तस्मादिन्द्रिय़मुच्यते ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिव्यूहश्चापि सङ्ख्यातश्चतुर्व्यूहश्च दृश्यते ||
५३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३
युधिष्ठिर उवाच
त्रिशङ्कुर्वन्धुसन्त्यक्त इक्ष्वाकुः प्रीतिपूर्वकम् |
९ क
वन पर्व
अध्याय
११४
लोमश उवाच
त्रिशतं वै सहस्राणि योजनानां युधिष्ठिर |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिशिखा द्विशिखाश्चैव तथा सप्तशिखाः परे |
९० क
आदि पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिशिखां भृकुटिं कृत्वा सन्दश्य दशनच्छदम् ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
त्रिशिखां भ्रुकुटीं कृत्वा तर्जमानमिव स्थितम् ||
१३५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
त्रिशिखां भ्रुकुटीं कृत्वा धुन्वन्हस्तौ पुनः पुनः ||
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
त्रिशिखां भ्रुकुटीं कृत्वा सन्दष्टदशनच्छदः |
४३ क
शल्य पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
त्रिशिखां भ्रुकुटीं कृत्वा सृक्किणी परिलेलिहन् |
३८ क
सभा पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिशिखां भ्रुकुटीं चास्य ददृशुः सर्वपार्थिवाः |
११ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
त्रिशूलखातं तत्रैव तीर्थमासाद्य भारत |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
त्रिशूलपाणिं वरदं खड्गचर्मधरं प्रभुम् |
३३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८
संवर्त उवाच
त्रिशूलपाणिं वरदं त्र्यम्वकं भुवनेश्वरम् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
त्रिशूलपाणेः स्थानं च त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् |
१११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
त्रिशूलमाश्लिष्य सुतीक्ष्णधारं; सर्वाणि गात्राणि निघर्षसि त्वम् |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
त्रिशूलाङ्कानि पद्मानि दृश्यन्ते कुरुनन्दन |
८४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
त्रिषष्ट्या चतुरोऽस्याश्वान्सप्तभिः सारथिं शरैः |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
त्रिषिरोभिश्चतुर्दंष्ट्रैश्चतुरास्यैश्चतुर्भुजैः |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३११
भीष्म उवाच
त्रिषु गार्हस्थ्यमूलेषु मोक्षधर्मानुदर्शिनः ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
त्रिषु त्वेतेषु पूर्वेषु न कुर्वीत विचारणाम् ||
३७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
त्रिषु देशेषु ददतुः शिविरस्य हुताशनम् ||
१०३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३
व्यास उवाच
त्रिषु पूर्वेषु सर्वेषु नक्षत्रेषु विशां पते |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
त्रिषु लोकेषु कीर्तिश्च तवाक्षय़्या भविष्यति |
७६ ख
सभा पर्व
अध्याय
४४
शकुनिरु उवाच
त्रिषु लोकेषु कौन्तेय़ं तं त्वं द्यूते समाह्वय़ ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१६
अर्जुन उवाच
त्रिषु लोकेषु तन्नास्ति यन्न जीय़ाज्जनार्दनः ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
त्रिषु लोकेषु तावच्च वैशिष्ट्यं प्रतिपत्स्यसे |
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६२
नारद उवाच
त्रिषु लोकेषु धर्मार्थमन्नं देय़मतो वुधैः ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०२
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिषु लोकेषु न त्वासीत्कश्चिद्विदुरसंमितः |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
२०३
नारद उवाच
त्रिषु लोकेषु नारीणां रूपेणाप्रतिमाभवत् ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
त्रिषु लोकेषु पुण्यत्वाद्गङ्गाय़ाः प्रथितं यशः |
७९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
त्रिषु लोकेषु यच्चास्ति तदिहागच्छतां स्वय़म् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
युधिष्ठिर उवाच
त्रिषु लोकेषु यज्ज्ञानं सर्वं तद्विदितं हि ते ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०३
नारद उवाच
त्रिषु लोकेषु यत्किञ्चिद्भूतं स्थावरजङ्गमम् |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
२०१
सुन्दोपसुन्दावू ऊचतुः
त्रिषु लोकेषु यद्भूतं किञ्चित्स्थावरजङ्गमम् |
२३ क