chevron_left  तेऽभ्यधावन्तarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय ४
नारद उवाच
तेऽभ्यधावन्त सङ्क्रुद्धाः कर्णदुर्योधनावुभौ |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
तेऽभ्ययुः समरे राजन्वासुदेवधनञ्जय़ौ |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
तेऽभ्यर्चिता राजगणा द्रुपदेन महात्मना ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४६
सञ्जय़ उवाच
तेऽभ्यवर्षञ्शरैस्तीक्ष्णैः सात्यकिं सत्यविक्रमम् |
४ क
आदि पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
तेऽमरारिविनाशाय़ सर्वलोकहिताय़ च |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६२
विदुर उवाच
तेऽमित्रवशमाय़ान्ति शकुनाविव विग्रहात् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
नारद उवाच
तेऽर्चय़न्ति सदा देवं तैः सार्धं रमते च सः |
४२ क
शल्य पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
तेऽर्जुनं रथवंशेन द्रोणपुत्रपुरोगमाः |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
तेऽर्जुनं सर्वतः क्रुद्धा नानाशस्त्रैरवीवृषन् |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
तेऽर्जुनं सहिता भूत्वा रथवंशैः प्रहारिणः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
तेऽर्जुनेन शरा मुक्ताः कङ्कपत्रास्तनुच्छिदः |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय १७८
वैशम्पाय़न उवाच
तेऽलङ्कृताः कुण्डलिनो युवानः; परस्परं स्पर्धमानाः समेताः |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
तेऽवकाशं न ददृशुः कुरुक्षेत्रे महाव्रताः ||
४८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
तेऽवगाह्य कुरुक्षेत्रं शङ्खान्दध्मुररिन्दमाः |
६४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७६
वैशम्पाय़न उवाच
तेऽवतीर्णमुपश्रुत्य विषय़ं श्वेतवाहनम् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
तेऽवतीर्य कुरुक्षेत्रं केशमज्जास्थिसङ्कुलम् |
३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
तेऽवतीर्य रथेभ्यस्तु विप्रमुच्य च वाजिनः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३७
सञ्जय़ उवाच
तेऽवहन्युय़ुधानं तु मनोमारुतरंहसः |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७६
वैशम्पाय़न उवाच
तेऽविदूराद्धनुष्पाणिं यज्ञिय़स्य हय़स्य च |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९४
वसिष्ठ उवाच
तेऽव्यक्तं प्रतिपद्यन्ते पुनः पुनररिन्दम ||
४७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
तेऽव्रुवञ्ज्ञातुमिच्छामः कतमोऽत्र युधिष्ठिरः |
३ क
वन पर्व
अध्याय २१५
मार्कण्डेय़ उवाच
तेऽव्रुवन्नेष नोऽनर्थः पावकेनाहृतो महान् |
२ ख
आदि पर्व
अध्याय १०७
वैशम्पाय़न उवाच
तेऽव्रुवन्व्राह्मणा राजन्विदुरश्च महामतिः ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय १२३
लोमश उवाच
तेऽव्रुवन्सहिताः सर्वे वृणीष्वान्यतमं शुभे |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय ५
सञ्जय़ उवाच
तेऽव्रुवन्सहितास्तत्र राजानं सैन्यसंनिधौ |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९२
भीष्म उवाच
तेऽव्रुवन्सोममासाद्य पितरोऽजीर्णपीडिताः |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७६
वैशम्पाय़न उवाच
तेऽसमीक्ष्यैव तं वीरमुग्रकर्माणमाहवे |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४५
वासुदेव उवाच
तेऽसुराः सपुरास्तत्र दग्धा रुद्रेण भारत ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५६
वासुदेव उवाच
तेऽस्माभिर्नित्यसन्दुष्टाः संश्रय़ेय़ुश्च कौरवान् ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
तेऽस्मिँल्लोके प्रमोदन्ते जाय़मानाः पुनः पुनः ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४३
व्रह्मो उवाच
तेऽस्मिँल्लोके प्रमोदन्ते प्रेत्य चानन्त्यमेव च |
१८ ख
वन पर्व
अध्याय २९१
सूर्य उवाच
तेऽस्य दास्यामि वै भीरु वर्म चैवेदमुत्तमम् ||
२१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय २
कृप उवाच
तेऽस्य योगे परं मूलं तन्मूला सिद्धिरुच्यते ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय ५३
सूत उवाच
तेऽऽस्तीके वै प्रीतिमन्तो वभूवु; रूचुश्चैनं वरमिष्टं वृणीष्व ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
तै रथैश्च सुसंय़ुक्तैर्दन्तिभिश्च महारथाः |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
तैः कर्णोऽभ्राजत शरैरुरोमध्यगतैस्तदा |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय १६५
गन्धर्व उवाच
तैः कामैः सर्वसम्पूर्णैः पूजितः स महीपतिः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
तैः काय़मस्याग्न्यनिलप्रभावै; र्विदार्य वाणैरपरैर्ज्वलद्भिः |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
तैः किरीटी किरीटस्थैर्हेमपुङ्खैरजिह्मगैः |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७६
वैशम्पाय़न उवाच
तैः कीर्णः शुशुभे पार्थो रविर्मेघान्तरे यथा ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३२
विदुरो उवाच
तैः कृत्वा सह सङ्घातं गिरिदुर्गालय़ांश्चर |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
तैः क्रुद्धैर्भगवान्रुद्रस्तपसा तोषितो ह्यभूत् ||
६२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
तैः पतद्भिर्महाराज द्रौणिमुक्तैः समन्ततः |
११२ क
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
तैः पीड्यमानो वहुभिः कृतास्त्रैः कुशलैर्युधि |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
तैः प्रविष्टैर्महावेगैर्गरुत्मद्भिरिवाहवे |
१२ क
वन पर्व
अध्याय २१
वासुदेव उवाच
तैः प्रहृष्टात्मभिर्वीरैराशीर्भिरभिनन्दितः |
११ क
वन पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
तैः प्रय़ुक्तान्महाकाय़ैः शक्तिशूलपरश्वधान् |
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
सञ्जय़ उवाच
तैः शरैर्द्रोणपुत्रस्य वज्रवेगसमाहितैः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८३
सञ्जय़ उवाच
तैः शरैस्तव सैन्यस्य विद्रावः सुमहानभूत् ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय २६
सूत उवाच
तैः शस्त्रैर्भानुमद्भिस्ते दिव्याभरणभूषिताः |
४५ क