आदि पर्व
अध्याय
९२
स्त्र्यु उवाच
तेषां जनय़िता नान्यस्त्वदृते भुवि विद्यते |
५१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२९
श्रीभगवानु उवाच
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
तेषां ज्यातलनिर्घोषो रथनेमिस्वनश्च ह |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६०
कपिल उवाच
तेषां ज्याय़ःकनीय़स्त्वं फलेषूक्तं वलावलम् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां ज्याय़स्तु कौन्तेय़ दण्डधारणमुच्यते |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४
व्यास उवाच
तेषां ज्येष्ठः खनीनेत्रः स तान्सर्वानपीडय़त् ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां ज्येष्ठः सुहोत्रस्तु राज्यमाप महीक्षिताम् |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४
व्यास उवाच
तेषां ज्येष्ठस्तु विंशोऽभूत्प्रतिमानं धनुष्मताम् |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां ज्येष्ठोऽभवद्राजा दुःषन्तो जनमेजय़ ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
तेषां तं प्रणय़ं श्रुत्वा मेने स कृतकृत्यताम् |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां तंसुर्महावीर्यः पौरवं वंशमुद्वहन् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
९७
लोमश उवाच
तेषां ततोऽसुरश्रेष्ठ आतिथ्यमकरोत्तदा |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
तेषां तत्तादृशं कर्म त्वामासाद्य सुनिष्फलम् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७५
समङ्ग उवाच
तेषां तत्त्वानि जानामि ततो न विमना ह्यहम् ||
५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां तत्र कथा दिव्या धर्मिष्ठाश्चाभवन्नृप |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां तत्र प्रवालेषु पुष्पभारावनामिषु |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
तेषां तथा कर्षतां च गजानां रूपमावभौ |
४० क
विराट पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां तथा विधेय़ानां निभृतानां महात्मनाम् |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२४७
देवदूत उवाच
तेषां तथाविधानां तु लोकानां मुनिपुङ्गव |
१७ क
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
तेषां तथैव तां लक्ष्मीं सर्वक्षत्रमुपासते |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५९
वासुदेव उवाच
तेषां तदभवद्युद्धं दशाहानि महात्मनाम् |
१० क
वन पर्व
अध्याय
९६
लोमश उवाच
तेषां तदासीद्रुचितमिल्वलस्योपभिक्षणम् |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
११९
नारद उवाच
तेषां तद्भाषितं श्रुत्वा माधवी परय़ा मुदा |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा क्षत्रधर्मा व्यवस्थितः |
५९ क
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा चाराणां भरतर्षभ |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३
शल्य उवाच
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा देवानां विष्णुरव्रवीत् |
१२ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा दय़ावान्दीनभाषिणाम् |
३७ क
विराट पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा विराटो वाहिनीपतिः |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
४९
सिद्धा ऊचुः
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा सिद्धानां देवलः पुनः |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
कपिल उवाच
तेषां तमःशरीराणां तम एव पराय़णम् ||
५० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
तेषां तस्य च तद्युद्धमभवल्लोमहर्षणम् |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
तेषां तस्य च संमर्दो दारुणः समपद्यत |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
१८
सूत उवाच
तेषां तीक्ष्णविषत्वाद्धि प्रजानां च हिताय़ वै |
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४३
धृतराष्ट्र उवाच
तेषां तु कतमः स स्याद्यमहं वेद व्राह्मणम् ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां तु कर्मणा राजंस्तथैवाध्ययनेन च |
१२ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
धृतराष्ट्र उवाच
तेषां तु कर्मणा लोका भविष्यन्ति युधिष्ठिर ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
१२०
सात्यकिरु उवाच
तेषां तु कार्येषु भवन्ति नाथाः; शैव्यादय़ो राम यथा यय़ातेः ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
तेषां तु क्रोशतां श्रुत्वा भीतानां रणमूर्धनि |
४२ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां तु गच्छतां शीघ्रं सर्वेषां योगधर्मिणाम् |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२५३
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां तु गोमाय़ुरनल्पघोषो; निवर्ततां वाममुपेत्य पार्श्वम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय
९९
लोमश उवाच
तेषां तु तत्र क्रमकालय़ोगा; द्घोरा मतिश्चिन्तय़तां वभूव |
१९ क
शल्य पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां तु तपसा प्रीतो निय़मेन दमेन च |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां तु तरसा पार्थस्तत्रैव परिधावताम् |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
६९
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां तु ते यथामुख्यं कीर्तय़िष्यामि भारत |
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
तेषां तु द्वारपालानामेकः शोकसमन्वितः |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
तेषां तु निनदं श्रुत्वा त्रस्तानां सर्वय़ोधिनाम् |
५८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
तेषां तु निनदं श्रुत्वा प्रहृष्टानां प्रहृष्टवत् |
३२ क
शल्य पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
तेषां तु निनदं श्रुत्वा सृञ्जय़ानां नरर्षभः |
५५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
तेषां तु पुरुषेन्द्राणां रुदतां रुदितस्वनः |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
३२
सूत उवाच
तेषां तु भगवाञ्शेषस्त्यक्त्वा कद्रूं महाय़शाः |
२ क