chevron_left  तेभ्योarrow_drop_down
कर्ण पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
तेभ्यो वर्णविशेषाश्च प्रतिलोमानुलोमजाः ||
३२ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ५८
युधिष्ठिर उवाच
तेभ्यो विशिष्टं किं दानं मतं ते कुरुपुङ्गव ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
जनमेजय़ उवाच
तेभ्यो विशिष्टां जानामि गतिमेकान्तिनां नृणाम् |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
तेभ्यो व्यसृजदाय़स्तः सूर्यरश्मिनिभान्प्रभुः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५०
नारद उवाच
तेभ्योऽहं वलवद्भीता शरणं त्वामुपागता ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
तेभ्योऽय़ं कुरुवंशश्च यदूनां भरतस्य च ||
४४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
तेरुर्वाहननौभिस्ते शूराः परिघवाहवः ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय १८४
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां कथास्ताः परिकीर्त्यमानाः; पाञ्चालराजस्य सुतस्तदानीम् |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय ३५
भीष्म उवाच
तेषां कथय़तां शौरेरहं गुणवतो गुणान् |
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय १८९
व्यास उवाच
तेषां कामं भगवानुग्रधन्वा; प्रादादिष्टं सन्निसर्गाद्यथोक्तम् |
२९ क
स्त्री पर्व
अध्याय २
विदुर उवाच
तेषां कामदुघाँल्लोकानिन्द्रः सङ्कल्पय़िष्यति |
१० क
विराट पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
तेषां कालातिरेकेण ज्योतिषां च व्यतिक्रमात् |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां किरीटी सङ्कल्पं मोघं चक्रे महामनाः |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
तेषां किलावलिप्तानां निवसन्कुरुजाङ्गले |
१९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां कुन्ती महाराज पूजां चक्रे यथाविधि |
३ क
आदि पर्व
अध्याय २०७
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां कुमाराः सर्वेषां पूर्वेषां मम जज्ञिरे |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां क्षुधापरीतानां नष्टा वेदा विधावताम् |
४० क
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
तेषां क्षय़ो महानासीद्युध्यतामितरेतरम् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६१
कपिल उवाच
तेषां गतिं परां प्राप्य गार्हस्थ्ये किं प्रय़ोजनम् ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
तेषां गतिमिय़ां क्षिप्रं न चेद्धन्यां जय़द्रथम् ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२५
दुर्योधन उवाच
तेषां गत्वाहमानृण्यमद्य शक्त्या परन्तप |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां गरीय़ान्कतमो मध्यमः को लघुश्च कः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां गुणानां साम्यं च तदाहुः स्वस्थलक्षणम् ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १२
वासुदेव उवाच
तेषां गुणानां साम्यं चेत्तदाहुः स्वस्थलक्षणम् |
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १२
वासुदेव उवाच
तेषां गुणानां साम्यं चेत्तदाहुः स्वस्थलक्षणम् |
४ ख
विराट पर्व
अध्याय ९
सहदेव उवाच
तेषां गोसङ्ख्य आसं वै तन्तिपालेति मां विदुः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय १८२
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां च तद्यथावृत्तं कथय़ामास वै तदा ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
तेषां च द्वारवद्गुप्तिः कार्या सर्वात्मना भवेत् ||
४२ ख
आदि पर्व
अध्याय १४३
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां च दय़ितो नित्यमात्मभूतो वभूव सः ||
३५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४२
सूत उवाच
तेषां च नित्यसंवासो न विनाशो विय़ुज्यताम् ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
तेषां च पञ्चार्जुनमभ्यविध्य; न्पञ्चाच्युतं निर्विभिदुः सुमुक्ताः ||
६५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
तेषां च पार्थस्य महत्तदासी; द्देहासुपाप्मक्षपणं सुय़ुद्धम् |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
तेषां च पृष्ठतो राज वलेन महता वृतः |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
तेषां च प्रमुखे शूरं सुशर्माणं महावलम् |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
तेषां च प्रिय़मन्विच्छन्सूतस्य च पराभवात् |
८० क
भीष्म पर्व
अध्याय ८९
सञ्जय़ उवाच
तेषां च रक्षणार्थाय़ युध्यते फल्गुनः परैः ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १
कृष्ण उवाच
तेषां च लोभं प्रसमीक्ष्य वृद्धं; धर्मात्मतां चापि युधिष्ठिरस्य |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय २०
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां च वृत्तमाज्ञाय़ वृत्तं दुर्योधनस्य च |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२
भीष्म उवाच
तेषां च वैरमुत्पन्नं कालय़ोगेन वै द्विज |
३४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
तेषां चतुःशतान्वीरान्यतमानान्महारथान् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
तेषां चरणपातेन रथनेमिस्वनेन च |
९ क
आदि पर्व
अध्याय ५४
सूत उवाच
तेषां चरितमिच्छामि कथ्यमानं त्वय़ा द्विज ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय ११७
अकृतव्रण उवाच
तेषां चानुगता ये च क्षत्रिय़ाः क्षत्रिय़र्षभ |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
तेषां चापभुजोत्सृष्टा शरवृष्टिर्विशां पते |
५ क
आदि पर्व
अध्याय २००
जनमेजय़ उवाच
तेषां चेष्टितमन्योन्यं युक्तानां कृष्णय़ा तय़ा ||
४ ख
विराट पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां चैव गतिस्तीर्थैर्वासश्चैषां प्रचिन्त्यताम् |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११०
गालव उवाच
तेषां चैवापवर्गाय़ मार्गं पश्यामि नाण्डज |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
तेषां छिन्ना महाराज भुजाः कनकभूषणाः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
तेषां छिन्नानि गात्राणि विसृजन्ति स्म शोणितम् |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
तेषां छेत्ता नास्ति लोके त्वदन्यः पुरुषर्षभ ||
३५ ख