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शल्य पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
ततः पञ्चशतान्हत्वा सवरूथान्महारथान् |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय १४
सूत उवाच
ततः पञ्चशते काले कद्रूपुत्रा विनिःसृताः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
ततः पञ्चाशतं कन्याः पुत्रिका अभिसन्दधे |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३७
श्रीभगवानु उवाच
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं; यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूय़ः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६
भीष्म उवाच
ततः पद्मोद्भवो राजन्देवदेवः पितामहः |
४ क
वन पर्व
अध्याय १०८
लोमश उवाच
ततः पपात गगनाद्गङ्गा हिमवतः सुता |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
ततः पपात द्विरदो वज्राहत इवाचलः ||
१६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
ततः पपात मेदिन्यां तथैव रुधिरोक्षितः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
भीष्म उवाच
ततः पपात शिरसा व्राह्मणस्तोय़धारिणे |
४९ क
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
ततः पपात संमूढस्ततः प्रीतोऽभवद्भवः ||
५१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
मनुरु उवाच
ततः पप्रच्छ दैत्येन्द्रः कवीन्द्रं प्रश्नमुत्तमम् |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
ततः पप्रच्छ पितरं त्वरमाण इवोत्तरः |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३५
धृतराष्ट्र उवाच
ततः परं किमकरोत्पुत्रो दुर्योधनो मम ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
ततः परं कौरवेन्द्र दुर्गशैलो महोदय़ः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८०
भृगुरु उवाच
ततः परं क्षेत्रविदं वदन्ति; प्रावर्तय़द्यो भुवनानि सप्त ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय २०३
व्याध उवाच
ततः परं क्षेत्रविदो वदन्ति; प्राकल्पय़द्यो भुवनानि सप्त ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३३
भीष्म उवाच
ततः परं क्षेत्रविदो वदन्ति; प्रावर्तय़द्यो भुवनानि सप्त ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
ततः परं तु नैषादिरङ्गुलीभिर्व्यकर्षत |
३८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३५
व्रह्मो उवाच
ततः परं तु विज्ञेय़मध्यात्मं परमं पदम् ||
३० ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५३
वासुदेव उवाच
ततः परं नास्ति चैव देवदेवात्सनातनात् ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
गौतम उवाच
ततः परं भान्ति लोकाः सनातना; विरजसो वितमस्का विशोकाः |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
गौतम उवाच
ततः परं भान्ति लोकाः सनातनाः; सुपुण्यगन्धा निर्मला वीतशोकाः |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
गौतम उवाच
ततः परं भान्ति लोकाः सनातनाः; सुपुण्यगन्धा विरजा वीतशोकाः |
४२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
ततः परं माल्यवतः पर्वतो गन्धमादनः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३६
व्यास उवाच
ततः परं श्रेष्ठमतीव सद्गुणै; रधिष्ठितं त्रीनधिवृत्तमुत्तमम् |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
ततः परं समा नाम दृश्यते लोकसंस्थितिः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय १४८
हनूमानु उवाच
ततः परमकं व्रह्म या गतिर्योगिनां परा |
१६ क
विराट पर्व
अध्याय १९
वैशम्पाय़न उवाच
ततः परमदुःखार्त इदं वचनमव्रवीत् ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय १७२
गन्धर्व उवाच
ततः परमदुष्प्रापमन्यैरृषिरुदारधीः |
८ क
वन पर्व
अध्याय १८३
मार्कण्डेय़ उवाच
ततः परमधर्मात्मा काश्यपः सर्वधर्मवित् |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५१
युधिष्ठिर उवाच
ततः परमधर्मात्मा दिष्टान्तमुपजग्मिवान् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१९
भीष्म उवाच
ततः परमधीरात्मा त्रिषु लोकेषु विश्रुतः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
ततः परमनाराचैर्युधामन्यूत्तमौजसौ |
५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
ततः परममस्त्रं तदश्वत्थामा भृशातुरः |
३३ क
सभा पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
ततः परमविक्रान्तो वाह्लीकान्कुरुनन्दनः |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय ४३
सूत उवाच
ततः परमसंविग्ना स्वसा नागपतेस्तु सा |
९ क
वन पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
ततः परमसंहृष्टः प्रद्युम्नः शरमुत्तमम् |
२५ क
वन पर्व
अध्याय १२४
लोमश उवाच
ततः परमसंहृष्टः शर्यातिः पृथिवीपतिः |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
ततः परमसङ्क्रुद्धः काण्डकोशानवासृजत् |
४६ क
मौसल पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
ततः परमसङ्क्रुद्धः कृतवर्मा तमव्रवीत् |
१९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
ततः परमसङ्क्रुद्धः पितुर्वधमनुस्मरन् |
४८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८५
भीष्म उवाच
ततः परमसङ्क्रुद्धः पुनरेव महातपाः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
वासुदेव उवाच
ततः परमसङ्क्रुद्धो रथात्प्रस्कन्द्य स द्विजः |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
ततः परमसङ्क्रुद्धो विस्फार्य सुमहद्धनुः |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
ततः परमसङ्क्रुद्धौ ज्वलन्ताविव पावकौ |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
वासुदेव उवाच
ततः परमहृष्टात्मा प्राविशं गृहमेव च ||
४६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २९
समुद्र उवाच
ततः परशुमादाय़ स तं वाहुसहस्रिणम् |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३४
सञ्जय़ उवाच
ततः पराजिते कर्णे धार्तराष्ट्रीं महाचमूम् |
४२ क
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
ततः परानाविशदुत्तमं भय़ं; समीक्ष्य भूमौ पतितं नरोत्तमम् |
६६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
ततः परानीकभिदं व्यूहमप्रतिमं परैः |
१ क