chevron_left  तेarrow_drop_down
विराट पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
ते वीरा वद्धनिस्त्रिंशास्तताय़ुधकलापिनः |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
ते वृताः समरे पञ्च गजानीकेन भारत |
२४ क
वन पर्व
अध्याय १०१
विष्णुरु उवाच
ते वृत्रं निहतं दृष्ट्वा सहस्राक्षेण धीमता |
८ क
वन पर्व
अध्याय ११८
वैशम्पाय़न उवाच
ते वृष्णय़ः पाण्डुसुतान्समीक्ष्य; भूमौ शय़ानान्मलदिग्धगात्रान् |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
ते वेश्मस्वपि कौरव्य पृथ्वीशा नाप्नुवन्सुखम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७९
भीष्म उवाच
ते वै तस्य फलप्राप्तौ कर्म चापि चतुर्विधम् ||
१३ ख
मौसल पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
ते वै देवाः प्रत्यनन्दन्त राज; न्मुनिश्रेष्ठा वाग्भिरानर्चुरीशम् |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
ते वै धन्या यैः कृतं ज्ञातिकार्यं; ये वः पुत्राः सुहृदो वान्धवाश्च |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
ते वै निपेतुस्तपनीय़पुङ्खा; द्विधा त्रिधा भीमशरैर्निकृत्ताः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९९
याज्ञवल्क्य उवाच
ते वै पितृभ्यः पितरः श्रूय़न्ते राजसत्तम ||
७ ग
सभा पर्व
अध्याय ४८
दुर्योधन उवाच
ते वै पिपीलिकं नाम वरदत्तं पिपीलिकैः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
ते वै भग्नाः सहसा व्यद्रवन्त; प्राक्रोशन्तः कौरवाः सर्व एव ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय १६६
अर्जुन उवाच
ते वै मामनुरूपाभिर्मधुराभिर्जय़ैषिणः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय १७९
वैशम्पाय़न उवाच
ते वै मुमुदिरे वीराः प्रसन्नसलिलां शिवाम् |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
महेश्वर उवाच
ते वै यदि नरास्तस्मान्निरय़ादुत्तरन्ति वै |
२२ क
सभा पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
ते वै रत्नभुजं कृष्णं रत्नार्हं पृथिवीश्वराः |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३७
सञ्जय़ उवाच
ते वै विदुद्रुवुर्नागा दृष्ट्वा तान्खचरान्नृप ||
२६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ६
विदुर उवाच
ते वै संसारचक्रस्य पाशांश्छिन्दन्ति वै वुधाः ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६
शल्य उवाच
ते वै समागम्य महेन्द्रमूचु; र्दिष्ट्या त्वाष्ट्रो निहतश्चैव वृत्रः |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
ते वै समीय़ुः सङ्ग्रामे राजन्दुर्मन्त्रिते तव ||
१९ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ९४
भीष्म उवाच
ते वै सर्वे तपस्यन्तः पुरा चेरुर्महीमिमाम् |
६ क
मौसल पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
ते वै साम्वं पुरस्कृत्य भूषय़ित्वा स्त्रिय़ं यथा |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८०
व्यास उवाच
ते वै सुकृतिनः प्रोक्ताः सर्वदानप्रदाश्च ते |
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय ४७
दुर्योधन उवाच
ते वैरामाः पारदाश्च वङ्गाश्च कितवैः सह |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०३
याज्ञवल्क्य उवाच
ते व्यक्तं निरय़ं घोरं प्रविशन्ति पुनः पुनः ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३५
वैशम्पाय़न उवाच
ते व्यतीत्य तमध्वानं क्षिप्रं श्येना इवाशुगाः |
३० क
वन पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
ते व्यतीत्य वहून्देशानुत्तरांश्च कुरूनपि |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
ते व्यमुञ्चञ्शरव्रातान्नानालिङ्गान्समन्ततः ||
९ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
ते व्यराजन्त राजर्षे वासोभिरुपशोभिताः |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०९
सञ्जय़ उवाच
ते व्यरोचन्त नाराचाः प्रविशन्तो वसुन्धराम् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय २५०
नारद उवाच
ते व्याधय़ो मानवान्घोररूपाः; प्राप्ते काले पीडय़िष्यन्ति मृत्यो ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
ते व्योम्नि रत्नविकृता व्यकाशन्त सहस्रशः |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय २९
श्रीभगवानु उवाच
ते व्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय ५६
वैशम्पाय़न उवाच
ते व्रह्मणः स्थानमेत्य प्राप्नुय़ुर्देवतुल्यताम् ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
धृतराष्ट्र उवाच
ते व्रह्मभवनं पुण्यं प्राप्नुवन्तीह सात्त्विकाः |
५३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४२
सनत्सुजात उवाच
ते व्राह्मणा इतः प्रेत्य स्वर्गलोके प्रकाशते ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय २१४
मार्कण्डेय़ उवाच
ते व्राह्मणीनामनृतं दोषं वक्ष्यन्ति पावके ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय १३०
धृतराष्ट्र उवाच
ते वय़ं कौरवेय़ाणामेतेषां च महात्मनाम् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३५०
नाग उवाच
ते वय़ं जातसन्देहाः पर्यपृच्छामहे रविम् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय १४२
युधिष्ठिर उवाच
ते वय़ं तं नरव्याघ्रं सर्वे वीर दिदृक्षवः |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
ते वय़ं तत्र गच्छामः प्रष्टुं कुरुपितामहम् |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
ते वय़ं त्वधमाँल्लोकान्प्रपद्येम स्वकर्मभिः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय ६६
सुदेव उवाच
ते वय़ं दमय़न्त्यर्थे चरामः पृथिवीमिमाम् |
४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय २
कृप उवाच
ते वय़ं धृतराष्ट्रं च गान्धारीं च समेत्य ह |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३
सात्यकिरु उवाच
ते वय़ं धृतराष्ट्रस्य पुत्रं शकुनिना सह |
२० क
आदि पर्व
अध्याय १३७
वैशम्पाय़न उवाच
ते वय़ं धृतराष्ट्रस्य प्रेषय़ामो दुरात्मनः |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
ते वय़ं न श्रिय़ं हातुमलं न्याय़ेन केनचित् |
४१ क
वन पर्व
अध्याय १४२
युधिष्ठिर उवाच
ते वय़ं निय़तात्मानः पर्वतं गन्धमादनम् |
२८ क
सभा पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
ते वय़ं नय़मास्थाय़ शत्रुदेहसमीपगाः |
५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
कृप उवाच
ते वय़ं परिविश्रान्ता विनिद्रा विगतज्वराः |
९ क