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भीष्म पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
ते यत्ता जातसंरम्भाः सर्वेऽन्योन्यं जिघांसवः |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
ते यत्ता भीमसेनेन सहिताः काञ्चनध्वजाः |
६२ क
वन पर्व
अध्याय १४३
वैशम्पाय़न उवाच
ते यथानन्तरान्वृक्षान्वल्मीकान्विषमाणि च |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १००
पृथिव्यु उवाच
ते यद्वदेय़ुस्तत्कुर्यादिति धर्मो विधीय़ते |
२० क
वन पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
ते यात्वा पाण्डवास्तत्र वहुभिर्व्राह्मणैः सह |
१६ क
विराट पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
ते यात्वा सहसा तत्र विराटनगरं प्रति |
२५ क
वन पर्व
अध्याय २४४
वैशम्पाय़न उवाच
ते यात्वानुसृतैर्मार्गैः स्वन्नैः शुचिजलान्वितैः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
ते यान्ति नरशार्दूल व्रह्मलोकं न संशय़ः ||
१२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१०
गुरुरु उवाच
ते यान्ति परमाँल्लोकान्विशुध्यन्तो यथावलम् ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५७
धृतराष्ट्र उवाच
ते युद्धं नाभिनन्दन्ति तत्तुभ्यं तात रोचताम् ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
ते युद्धसक्तमनसो नान्या वुवुधिरे क्रिय़ाः ||
५० ख
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
ते युद्धे संन्यवर्तन्त समुद्रस्य यथोर्मय़ः ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
ते युधिष्ठिरमासीनमजिनैः प्रतिवासितम् |
५ क
वन पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
ते युष्मासु समस्ताश्च व्यस्ताश्चैवेह सद्गुणाः |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
कृप उवाच
ते यूय़ं धर्ममुत्सृज्य जय़ं रक्षत पाण्डवाः |
११० क
सभा पर्व
अध्याय १९
वैशम्पाय़न उवाच
ते यूय़ं पुष्पवन्तश्च भुजैर्ज्याघातलक्षणैः |
३९ क
वन पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
ते यूय़ं मानसैः शुद्धाः शरीरनिय़मव्रतैः |
२२ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
ते यूय़ं मे रथं चैव धनुर्वाणं तथैव च |
६५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५९
सञ्जय़ उवाच
ते यूय़ं यदि मन्यध्वमुपारमत सैनिकाः |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
ते यूय़ं सहिता भूत्वा कुम्भय़ोनिं परीप्सत ||
७ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १००
सञ्जय़ उवाच
ते यूय़ं सहिता भूत्वा तूर्णमेव वलार्णवम् |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३९
सञ्जय़ उवाच
ते यूय़ं सहिताः सर्वे भृशं यत्ता महारथाः |
२२ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
ते यूय़ं सहिताः सर्वे मदीय़ेनास्त्रतेजसा |
५८ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
ते यूय़ं स्थाणुमीशानं जिष्णुमक्लिष्टकारिणम् |
३५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४२
व्रह्मो उवाच
ते यय़ुः शरणं विप्रांस्त ऊचुः काञ्जय़ामहे |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
ते यय़ुर्भीमसेनस्य समीपममितौजसः |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
ते रणाद्भरतश्रेष्ठ तावकाः प्राद्रवन्दिशः |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
ते रथा रथिभिर्युक्ता मनोमारुतरंहसः |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय १६३
भीष्म उवाच
ते रथाः पञ्च राजेन्द्र येषां सत्यरथो मुखम् |
११ क
सभा पर्व
अध्याय ६५
वैशम्पाय़न उवाच
ते रथान्मेघसङ्काशानास्थाय़ सह कृष्णय़ा |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५०
वैशम्पाय़न उवाच
ते रथान्रथिनः श्रेष्ठा हय़ांश्च हय़कोविदाः |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६२
सञ्जय़ उवाच
ते रथान्सूर्यसङ्काशानास्थिताः पुरुषर्षभाः |
३७ क
कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
ते रथास्तत्र विध्वस्ताः परार्ध्या भान्त्यनेकशः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
ते रथेभ्यो हताः पेतुः क्षितौ राजन्सुवर्चसः |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४६
सञ्जय़ उवाच
ते रथैः कल्पितै राजन्हेमरूप्यविभूषितैः |
२ क
वन पर्व
अध्याय १७
वासुदेव उवाच
ते रथैर्दंशिताः सर्वे विचित्राभरणध्वजाः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
ते रथैर्नगराकारैः प्रय़ाताः पुरुषर्षभाः |
७१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७०
भीष्म उवाच
ते रथैर्मेघसङ्काशैर्गजैश्च गजय़ोधिनः |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
ते रथैर्वहुसाहस्रैः कल्पितैः कुञ्जरैर्हय़ैः |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २०
भीष्म उवाच
ते राक्षसास्तदा राजन्भगवन्तमथाव्रुवन् |
१० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
ते राजकार्याणि तदा नाकार्षुः सर्वतः पुरे ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
ते राजसिंहाः सहिता ह्यशृण्व; न्वाक्यं महार्थं च महोदय़ं च ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
ते राज्ञा चोदिता वीरा योत्स्यमाना महारथाः |
५३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
ते राज्ञो धृतराष्ट्रस्य सामात्यस्य महारथाः |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६२
सञ्जय़ उवाच
ते रात्रौ कृतकर्माणः श्रान्ताः सूर्यस्य तेजसा |
५ क
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
ते रात्रौ प्रस्थिताः सर्वे मात्रा सह यशस्विनः |
८५ क
आदि पर्व
अध्याय १०१
वैशम्पाय़न उवाच
ते रात्रौ शकुना भूत्वा संन्यवर्तन्त सर्वतः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय १००
लोमश उवाच
ते रात्रौ समभिक्रुद्धा भक्षय़न्ति सदा मुनीन् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
ते रुद्राः प्रकृतिश्चैव सर्वे चैव सुरर्षय़ः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय १७४
वैशम्पाय़न उवाच
ते रेमिरे नन्दनवासमेत्य; द्विजर्षय़ो वीतभय़ा यथैव ||
१० ख