आदि पर्व
अध्याय
१८५
वैशम्पाय़न उवाच
ते नर्दमाना इव कालमेघाः; कथा विचित्राः कथय़ां वभूवुः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
१०५
वैशम्पाय़न उवाच
ते नागपुरसिंहेन पाण्डुना करदाः कृताः ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
ते नातिभृशमभ्यघ्नन्विशिखा जय़चोदिताः |
८ क
वन पर्व
अध्याय
१२०
सात्यकिरु उवाच
ते नाथवन्तः पुरुषप्रवीरा; नानाथवत्कृच्छ्रमवाप्नुवन्ति ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७६
वैशम्पाय़न उवाच
ते नामान्यथ गोत्राणि कर्माणि विविधानि च |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२१
वासुदेव उवाच
ते निकृत्तभुजस्कन्धाः कवन्धाकृतिदर्शनाः |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
२७२
मार्कण्डेय़ उवाच
ते निकृत्ताः शरैस्तीक्ष्णैर्न्यपतन्वसुधातले ||
१३ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
ते निकृत्ताय़ुधाः शूरा निर्विषा भुजगा इव |
५५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
ते नित्यमुदिता जेतुं युद्धे शत्रूनरिन्दमाः |
९८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
ते निपेतुर्महाराज नागेषु च रथेषु च ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
ते निपेतुर्महाराज निहता दृढधन्विभिः |
१९ क
सभा पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
ते निर्जिता हृतधना वनमेष्यन्ति पाण्डवाः ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
ते निर्हरन्ति हि मृतान्दरीषु प्रक्षिपन्ति च ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७०
भीष्म उवाच
ते निवृत्ताश्च भग्नाश्च दृष्ट्वा तल्लाघवं मम |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
ते निवृत्य पुनः पार्थं सर्वतः पर्यवारय़न् |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
भीष्म उवाच
ते निश्चितास्तत्र महर्षय़स्तु; संमन्यन्तो धर्ममेवं नरेन्द्र |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
ते नूनं निनदं श्रुत्वा श्वापदानां महावने |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
ते नेह शक्याः सहसा विजेतुं; वीर्योन्नद्धाः कृतवैरास्त्वय़ा च |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
ते नो हताः सगणाः सानुवन्धाः; कामं स्वर्गं नरकं वा व्रजामः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
ते पक्षिण इवोत्पत्य गिरेः शृङ्गं महाजवाः |
३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
ते पञ्च पाञ्चालरथाः सुरूपै; र्वैकर्तनं कर्णमभिद्रवन्तः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
ते पञ्च रथमास्थाय़ भ्रातरः समलङ्कृताः |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय
११७
वैशम्पाय़न उवाच
ते परस्परमामन्त्र्य सर्वभूतहिते रताः |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
ते पराक्रान्तमालोक्य राजन्युधि पितामहम् |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
ते पाण्डवाः सोमकाः सृञ्जय़ाश्च; तमेव नागं ददृशुः समन्तात् |
६ क
सभा पर्व
अध्याय
६०
दुर्योधन उवाच
ते पाण्डवानां परिभूय़ वीर्यं; वलात्प्रमृष्टा धृतराष्ट्रजेन ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
ते पाण्डवेय़ाः संरव्धा महेष्वासेन पीडिताः |
३५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
ते पाण्डवेय़ाः समरे कर्णेन स्म पुनः पुनः |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
ते पाण्डवैरर्द्यमानास्तावका जितकाशिभिः |
३५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
ते पाण्डुय़ोधाम्वुधरैः शत्रुद्विरदपर्वताः |
२७ क
स्त्री पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
ते पार्थिवं पुरस्कृत्य निर्ययुर्नगराद्वहिः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
ते पिवन्त इवाकाशं त्रासय़न्तश्चराचरान् |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३५
वैशम्पाय़न उवाच
ते पिवन्त इवाकाशं दारुकेण प्रचोदिताः |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
ते पिवन्त इवाकाशं युय़ुधानं हय़ोत्तमाः |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
ते पिवन्त इवाकाशमश्वैरष्टौ महारथाः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
नारद उवाच
ते पिवन्तः कषाय़ांश्च सर्पींषि विविधानि च |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८
अश्मो उवाच
ते पिवन्तः कषाय़ांश्च सर्पींषि विविधानि च |
४५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
ते पीडिता भृशं तेन रौद्रेण सहसा विभो |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५१
युधिष्ठिर उवाच
ते पीड्यमाना द्रोणेन द्रोणानीकं न शक्नुमः |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३१
श्रीभगवानु उवाच
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक; मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
१३८
लोमश उवाच
ते पुत्रशोकमप्राप्य विचरन्ति यथासुखम् ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
ते पुत्रास्तव कौरव्य दुर्योधनपुरोगमाः |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
ते पुनः संन्यवर्तन्त कृत्वा संशप्तकान्मिथः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
१३०
वैशम्पाय़न उवाच
ते पुरा सत्कृतास्तात पाण्डुना पौरवा जनाः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
ते पुराणं महेष्वासा मार्गमैन्द्रं समास्थिताः |
४८ क
वन पर्व
अध्याय
६७
वृहदश्व उवाच
ते पुराणि सराष्ट्राणि ग्रामान्घोषांस्तथाश्रमान् |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
ते पूजिताः सुखासीनाः कथाश्चक्रुर्महर्षय़ः |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
ते पूज्यास्ते नमस्कार्या वर्तेथास्तेषु पुत्रवत् |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३३
भीष्म उवाच
ते पूज्यास्ते नमस्कार्यास्ते रक्ष्याः पितरो यथा |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८२
वैशम्पाय़न उवाच
ते पूजय़ित्वा दाशार्हं सर्वलोकेषु पूजितम् |
२७ क