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वन पर्व
अध्याय १०६
लोमश उवाच
ते तं दृष्ट्वा हय़ं राजन्सम्प्रहृष्टतनूरुहाः |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
नकुल उवाच
ते तं दृष्ट्वातिथिं तत्र प्रहृष्टमनसोऽभवन् ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय ४९
सूत उवाच
ते तं प्रसादय़ामासुर्देवाः सर्वे पितामहम् |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३१
श्रीभगवानु उवाच
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं; क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
ते तं शूरं विनिर्भिद्य प्राविशन्धरणीतलम् ||
६० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
ते तं शय़ानं सम्प्रेक्ष्य राजानमतथोचितम् |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
ते तं ह्रदं समासाद्य यत्र शेते जनाधिपः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय ३९
सूत उवाच
ते तक्षकसमादिष्टास्तथा चक्रुर्भुजङ्गमाः |
२५ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
ते तत्त्वं सर्वमाख्याय़ शिरसाभिप्रणम्य च |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२१
श्रीभगवानु उवाच
ते तत्प्रसादाद्गच्छन्ति तेनादिष्टफलां गतिम् ||
३७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
ते तत्र गत्वा विवुधास्तं कूपं यत्र स त्रितः |
४० क
आदि पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
ते तत्र द्रौपदीं लव्ध्वा परिसंवत्सरोषिताः |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४५
सनत्सुजात उवाच
ते तत्र पक्षिणो भूत्वा प्रपतन्ति यथादिशम् |
९ ख
आदि पर्व
अध्याय १८६
वैशम्पाय़न उवाच
ते तत्र भुक्त्वा पुरुषप्रवीरा; यथानुकामं सुभृशं प्रतीताः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय १७५
व्राह्मणा ऊचुः
ते तत्र विविधान्दाय़ान्विजय़ार्थं नरेश्वराः |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
ते तत्र विष्ठितास्तेषां सर्वं तद्वचनं रहः |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय १८६
वैशम्पाय़न उवाच
ते तत्र वीराः परमासनेषु; सपादपीठेष्वविशङ्कमानाः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय १८४
वैशम्पाय़न उवाच
ते तत्र शूराः कथय़ां वभूवुः; कथा विचित्राः पृतनाधिकाराः |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
ते तत्र सादिनः शूराः सौवलस्य महद्वलम् |
४० क
आदि पर्व
अध्याय १५६
वैशम्पाय़न उवाच
ते तत्र साधु गच्छामो यदि त्वं पुत्र मन्यसे ||
८ ख
सभा पर्व
अध्याय ११
नारद उवाच
ते तत्सदः समासाद्य मोदन्ते भरतर्षभ ||
६३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५९
सञ्जय़ उवाच
ते तथा पारय़न्तश्च ह्रीमन्तश्च विशेषतः |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय १५३
जनमेजय़ उवाच
ते तथा पुरुषव्याघ्रा निहत्य वकराक्षसम् |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६
द्रुपद उवाच
ते तथा वञ्चय़ित्वा तु धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
ते तथा सहिता वीरा वसन्तस्तत्र तत्र ह |
१ क
आदि पर्व
अध्याय १३३
वैशम्पाय़न उवाच
ते तथेति प्रतिज्ञाय़ कृत्वा चैतान्प्रदक्षिणम् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
ते तथेति प्रतिज्ञाय़ कृष्णय़ा सह पाण्डवाः |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५०
वैशम्पाय़न उवाच
ते तथेति प्रतिज्ञाय़ श्वोभूते चक्रिरे तथा |
१७ क
वन पर्व
अध्याय २२९
वैशम्पाय़न उवाच
ते तथेत्येव कौरव्यमुक्त्वा वचनकारिणः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६२
सञ्जय़ उवाच
ते तथैव महाराज दंशिता रणमूर्धनि |
१ क
वन पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
ते तदस्त्रं विधूय़ाशु विव्यधू रुधिराशनाः |
१८ क
सभा पर्व
अध्याय १६
कृष्ण उवाच
ते तदाम्रं द्विधा कृत्वा भक्षय़ामासतुः शुभे |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय १७४
वैशम्पाय़न उवाच
ते तदाशंसिरे लव्धां श्रिय़ं राज्यं च पाण्डवाः |
८ क
विराट पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
ते तद्व्यतीय़ुर्ध्वजिनामनीकं; श्वेता वहन्तोऽर्जुनमाजिमध्यात् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
ते तपः समुपातिष्ठन्व्रह्मोक्तं वेदकल्पितम् |
४० क
कर्ण पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
ते तमभ्यर्दय़न्वाणैरुल्काभिरिव कुञ्जरम् |
२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७६
वैशम्पाय़न उवाच
ते तमाजघ्निरे वीरं निवातकवचान्तकम् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
ते तमाज्ञाय़ तत्त्वेन पुनरागम्य पाण्डवाः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय १८२
वैशम्पाय़न उवाच
ते तमूचुर्महात्मानं न वय़ं सत्क्रिय़ां मुने |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
व्यास उवाच
ते तमूचुर्महात्मानं सर्वे देवाः सवासवाः |
५५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६४
भीष्म उवाच
ते तमूचुर्महाराज प्रेष्या रक्षःपतेर्द्विजम् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १११
भीष्म उवाच
ते तरन्तीह दुर्गाणि न मेऽत्रास्ति विचारणा ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय ९४
लोमश उवाच
ते तस्मै कथय़ामासुर्वय़ं ते पितरः स्वकाः |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १११
सञ्जय़ उवाच
ते तस्य कवचं भित्त्वा तथा वाहुं च दक्षिणम् |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
ते तस्य कवचं भित्त्वा पपुः शोणितमाहवे |
५८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
ते तस्य कवचं भित्त्वा पपुः शोणितमाहवे ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०६
सञ्जय़ उवाच
ते तस्य कवचं भित्त्वा पपुः शोणितमाहवे ||
३१ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
ते तस्य कवचं भित्त्वा पपुः शोणितमाहवे |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
ते तस्य कवचं भित्त्वा पपुः शोणितमाहवे ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०९
सञ्जय़ उवाच
ते तस्य कवचं भित्त्वा स्वर्णपुङ्खा महौजसः |
२५ क