शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
तूर्यशव्देन महता नादय़न्तश्च मेदिनीम् ||
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
तूर्याणि गणिका वारास्तथैव नटनर्तकाः |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
तूर्याणि चाजघ्नुरतीव हृष्टा; वासांसि चैवादुधुवुर्भुजांश्च |
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
तूर्यौघशतसङ्कीर्णः परार्ध्यागुरुधूपितः |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
तूलराशिं समासाद्य यथा वाय़ुर्महाजवः ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
तूलराशिमिवाधूय़ मारुतः सर्वतोदिशम् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
१३५
लोमश उवाच
तूष्णीं गङ्गां च कौन्तेय़ सामात्यः समुपस्पृश ||
७ ख
विराट पर्व
अध्याय
४
धौम्य उवाच
तूष्णीं त्वेनमुपासीत काले समभिपूजय़न् ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
तूष्णीं दध्यौ महीपालः पुत्रव्यसनकर्शितः |
४५ ख
विराट पर्व
अध्याय
४५
अश्वत्थामो उवाच
तूष्णीं धारय़ते लोकान्वसुधा सचराचरान् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
तूष्णीं ध्यानपरो धीमानेकान्ते समुपाविशत् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
तूष्णीं भव न ते सौम्य त्वरा कार्या न सम्भ्रमः |
८८ क
आदि पर्व
अध्याय
२१२
वैशम्पाय़न उवाच
तूष्णीं भूतास्ततः सर्वे साधु साध्विति चाव्रुवन् ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
तूष्णीं वभूव कौरव्यः स मुहूर्तमरिन्दम ||
१ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
तूष्णीं वभूव गान्धारी शोकव्याकुललोचना ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३९
वाय़ुरु उवाच
तूष्णीं वभूव नृपतिः पवनस्त्वव्रवीत्पुनः |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
तूष्णीं वभूव मेधावी तमुवाचाथ केशवः ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
तूष्णीं वभूव राजेन्द्र रुजासौ विह्वलो भृशम् ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
२२६
वैशम्पाय़न उवाच
तूष्णीं वभूवतुरुभौ वाक्यान्ते जनमेजय़ ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
तूष्णीं वभूवू राजानः सर्व एव विशां पते ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
धृतराष्ट्र उवाच
तूष्णीङ्गङ्गां दशगङ्गां महाह्रदमथापि च ||
४६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
तूष्णीमासीच्छल्यसन्तप्तमर्मा; यत्वात्मानं वेदनां संनिगृह्य ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३७
व्यास उवाच
तूष्णीमासीत निन्दाय़ां कुर्वन्भेषजमात्मनः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
तूष्णीमासीत्ततः पार्थमित्युवाच जनार्दनः ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५०
नारद उवाच
तूष्णीमासीत्ततो देवो देवानामीश्वरेश्वरः ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
तूष्णीमासीत्तदा कन्या प्रोवाच भृगुनन्दनम् ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
तूष्णीमासीदर्जुनस्तु पवनस्त्वव्रवीत्पुनः |
१ क
विराट पर्व
अध्याय
१७
द्रौपद्यु उवाच
तूष्णीमास्ते यथा मूढः स्वानि कर्माणि चिन्तय़न् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
ऋषभ उवाच
तूष्णीमेवाभवत्तत्र न च प्रत्युक्तवान्नृपम् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
वृहस्पतिरु उवाच
तूष्णीम्भावेऽपि हि ज्ञानं न चेद्भवति कारणम् |
४६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४३
सनत्सुजात उवाच
तूष्णीम्भूत उपासीत न चेष्टेन्मनसा अपि |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
तूष्णीम्भूतं तु राजानं पुनरेवार्जुनोऽव्रवीत् |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
तूष्णीम्भूतं तु राजानं शोचमानं युधिष्ठिरम् |
१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
तूष्णीम्भूतांस्ततस्तांस्तु वाष्पकण्ठान्महीपतिः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
तूष्णीम्भूतान्यनीकानि योधा युद्धादुपारमन् |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
तूष्णीम्भूताभवत्साध्वी न चोवाचाथ किञ्चन ||
६० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
भीष्म उवाच
तूष्णीम्भूताभवद्राजन्दह्यमानेन चेतसा ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५२
वैशम्पाय़न उवाच
तूष्णीम्भूते तदा भीष्मे पटे चित्रमिवार्पितम् |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
तूष्णीम्भूते महाराज भीष्मे शन्तनुनन्दने ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
तूष्णीम्भूतेषु सर्वेषु समुत्तस्थुर्नरेश्वराः ||
१ ख
मौसल पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
तृणं च मुसलीभूतमपि तत्र व्यदृश्यत |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
तृणकाष्ठकरीषाणि कदा चिन्नसमीक्षय़ा |
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
तृणगोमय़पर्णाशी निःस्पृहो निय़तः शुचिः ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
तृणच्छन्नानि वेश्मानि पङ्केनापि प्रलेपय़ेत् |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
इन्द्र उवाच
तृणपूर्णमुखश्चैव तवास्मीति च यो वदेत् ||
४७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
सञ्जय़ उवाच
तृणप्रस्पन्दनाच्चापि सूतपुत्रं स्म मेनिरे ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
तृणप्राय़ं ज्वलनेनेव दग्धं; ग्रामं यथा धार्तराष्ट्रः समीक्ष्य |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
२६५
मार्कण्डेय़ उवाच
तृणमन्तरतः कृत्वा तमुवाच निशाचरम् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
७३
केशिन्यु उवाच
तृणमुष्टिं समादाय़ आविध्यैनं समादधत् ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२५
सञ्जय़ उवाच
तृणवत्तमहं मन्ये स कर्णो निर्जितो युधि ||
७ ख