शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
तीर्थानि नगराय़न्ते कूले वै दक्षिणे तदा ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय
१२१
वैशम्पाय़न उवाच
तीर्थानि रमणीय़ानि तत्र तत्र विशां पते ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०९
वैशम्पाय़न उवाच
तीर्थानि शोधय़ित्वा तु तथानुज्ञाय़ ताः प्रभुः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
तीर्थानि सरितः शैलाः पुण्यान्याय़तनानि च |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
भीष्म उवाच
तीर्थानि सर्वाणि परिक्रमन्तो; माघ्यां यय़ुः कौशिकीं पुण्यतीर्थाम् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
तीर्थानि हि महावाहो तपोविघ्नकरैः सदा |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
२०८
वैशम्पाय़न उवाच
तीर्थानीमानि वर्ज्यन्ते किमर्थं व्रह्मवादिभिः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
९२
लोमश उवाच
तीर्थान्यगच्छन्विवुधास्तेनापुर्भूतिमुत्तमाम् ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१०
वैशम्पाय़न उवाच
तीर्थान्यनुचरन्तं च शुश्राव मधुसूदनः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
तीर्थान्युक्तानि धौम्येन नारदेन च धीमता |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
तीर्थाभिगमनं पुण्यं यज्ञैरपि विशिष्यते ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय
९२
लोमश उवाच
तीर्थाभिगमनात्पूता दर्शनाच्च महात्मनाम् ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
माण्डव्य उवाच
तीर्थाभिषेकं सफलं त्वमविघ्नेन चाप्स्यसि |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
नाचिकेत उवाच
तीर्थावाप्तिर्गोप्रय़ुक्तप्रदाने; पापोत्सर्गः कपिलाय़ाः प्रदाने ||
४९ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तीर्थे च सर्वदेवानां स्नात्वा भरतसत्तम |
७४ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तीर्थे तु सर्वदेवानां स्नातः स पुरुषर्षभ |
१५१ क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
तीर्थे सलिलराजस्य स्नात्वा प्रय़तमानसः ||
८५ ख
वन पर्व
अध्याय
११८
वैशम्पाय़न उवाच
तीर्थेषु सर्वेषु परिप्लुताङ्गः; पुनः स शूर्पारकमाजगाम ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
तीर्थेष्वनभिसन्त्यज्य प्रव्रजिष्यसि चेदथ ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय
४१
सूत उवाच
तीर्थेष्वाप्लवनं कुर्वन्पुण्येषु विचचार ह ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
तीर्थेष्वाप्लुत्य पुण्येषु विपाप्मा विगतज्वरः |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
तीर्थय़ात्रा ततः पर्व कुरुराजस्य धीमतः ||
४३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
तीर्थय़ात्रा तथैवात्र पाण्डवानां महात्मनाम् |
१११ क
मौसल पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
तीर्थय़ात्रा समुद्रे वः कार्येति पुरुषर्षभाः ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५५
च्यवन उवाच
तीर्थय़ात्रां गमिष्यामि पुरा कालोऽतिवर्तते ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
तीर्थय़ात्रां परिक्रामन्नपश्यद्वै पराशरः ||
५६ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तीर्थय़ात्रां पुरस्कृत्य कुरुक्षेत्रं गताः पुरा ||
९२ ग
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
तीर्थय़ात्रां यय़ौ राजन्कुरूणां वैशसे तदा |
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
तीर्थय़ात्रां यय़ौ रामो निवर्त्य मधुसूदनम् ||
३४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
तीर्थय़ात्रां समाजग्मुः सरस्वत्यां महीपते ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
तीर्थय़ात्रां हलधरः सरस्वत्यां महाय़शाः |
१२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
युधिष्ठिर उवाच
तीर्थय़ात्राप्रसङ्गेन सम्प्राप्तोऽय़मनुग्रहः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
११
मैत्रेय़ उवाच
तीर्थय़ात्रामनुक्रामन्प्राप्तोऽस्मि कुरुजाङ्गलम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
तीर्थय़ात्राश्रय़ं पुण्यमृषीणां प्रत्यवेदय़त् ||
११४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
तीव्रं तप्त्वा तपः पूर्वं ततो योक्तुमुपक्रमेत् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
६०
वृहदश्व उवाच
तीव्ररोषसमाविष्टा प्रजज्वालेव मन्युना ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
७४
वृहदश्व उवाच
तीव्रशोकसमाविष्टा वभूव वरवर्णिनी ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
तुङ्गकारण्यमासाद्य व्रह्मचारी जितेन्द्रिय़ः |
४३ क
आदि पर्व
अध्याय
११८
वैशम्पाय़न उवाच
तुङ्गपद्मकमिश्रेण चन्दनेन सुगन्धिना |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
तुण्डमासीन्महाराज भीमसेनो महावलः ||
६ ग
वन पर्व
अध्याय
२६९
मार्कण्डेय़ उवाच
तुण्डेन च नलस्तत्र पटुशः पनसेन च ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
तुण्डय़ुद्धमथाकाशे तावुभौ सम्प्रचक्रतुः |
४६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
तुतुषुर्देवताः सर्वाः सिद्धाश्च परमर्षय़ः ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२०
वैशम्पाय़न उवाच
तुतोष तस्य नृपते मुनेरमिततेजसः |
३० ख
सभा पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
तुतोष नारदः पश्यन्धर्मराजस्य धीमतः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
तुतोष पुत्रं सौभद्रं प्रेक्षमाणो धनञ्जय़ः ||
६७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३
नारद उवाच
तुतोष भृगुशार्दूलो गुरुशुश्रूषय़ा तथा ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
तुतोष लोकः सकलस्तेषां शौर्यगुणेन च ||
८१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
तुतोषास्त्रविदां श्रेष्ठस्तथा देवाः सवासवाः |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
तुदन्तौ विशिखैस्तीक्ष्णैर्मत्तवारणविक्रमौ ||
२७ ख