कर्ण पर्व
अध्याय
३१
शल्य उवाच
तिष्ठत्यसुकरः सङ्ख्ये परैः परपुरञ्जय़ः ||
६४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
तिष्ठत्यस्पृशती तद्वत्त्वय़ि वत्स्यामि मैथिल ||
१७३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
तिष्ठत्येकस्य च वशे तं चेदनुविधीय़ते ||
१३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२७
व्यास उवाच
तिष्ठत्येतेषु गृहवान्षट्सु कर्मसु स द्विजः |
५ क
सभा पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
तिष्ठत्वय़ं प्रश्न उदारसत्त्वे; भीमेऽर्जुने सहदेवे तथैव |
२४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
तिष्ठत्सु मन्त्रपूतेषु तस्याग्निषु महावने |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
५३
वृहदश्व उवाच
तिष्ठत्सु लोकपालेषु कथं मानुषमिच्छसि ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
तिष्ठध्वं युद्धमनसो दर्पं विनय़ितास्मि वः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
तिष्ठध्वं समरे शूरा भय़ं त्यजत फल्गुनात् ||
५८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
तिष्ठन्तं च शय़ानं च मृत्युरन्वेषते यदा |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
तिष्ठन्तमग्रतो दृष्ट्वा प्रतिविन्ध्यं तमाहवे |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
तिष्ठन्तमजरं तं तु यत्तदुक्तं मनीषिभिः ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
तिष्ठन्तमुपसङ्गम्य ववन्दे सारथिस्तदा ||
११ ख
सभा पर्व
अध्याय
६०
द्रौपद्यु उवाच
तिष्ठन्ति चेमे कुरवः सभाय़ा; मीशाः सुतानां च तथा स्नुषाणाम् |
४५ क
वन पर्व
अध्याय
२३८
दुर्योधन उवाच
तिष्ठन्ति न चिरं भद्रे यथाहं मदगर्वितः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६२
युधिष्ठिर उवाच
तिष्ठन्ति यत्र सुहृदस्तिष्ठन्तीति मतिर्मम ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२५३
वैशम्पाय़न उवाच
तिष्ठन्ति वर्त्मानि नवान्यमूनि; वृक्षाश्च न म्लान्ति तथैव भग्नाः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
१७१
और्व उवाच
तिष्ठन्ति वहवो लोके तदा पापेषु कर्मसु ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
२८०
मार्कण्डेय़ उवाच
तिष्ठन्ती चापि सावित्री काष्ठभूतेव लक्ष्यते ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
२४८
वैशम्पाय़न उवाच
तिष्ठन्तीमाश्रमद्वारि द्रौपदीं निर्जने वने ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११४
भीष्म उवाच
तिष्ठन्त्येते यथास्थानं नगा ह्येकनिकेतनाः |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
तिष्ठेत कस्तस्य मर्त्यः पुरस्ता; द्यः सर्वदेवेषु वरेण्य ईड्यः |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३८
वाय़ुरु उवाच
तिष्ठेत्कथमिति व्रूहि न किञ्चिद्धि तदा भवेत् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
तिष्ठेत्पितृमते धर्मे यदि दण्डो न पालय़ेत् ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
तिष्ठेत्प्रिय़हिते राज्ञ उभौ लोकौ हि यो जय़ेत् ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१८
शक्र उवाच
तिष्ठेथा मय़ि नित्यं त्वं यथा तद्व्रूहि मे शुभे |
१८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
११
धृतराष्ट्र उवाच
तिष्ठेथा राजशार्दूल वैतसीं वृत्तिमास्थितः ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
तिष्ठेदानीं न मे जीवन्सूतपुत्र गमिष्यसि |
६३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
तिष्ठेदानीं रणे पार्थ पश्य मेऽद्य पराक्रमम् ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
तिष्ठेदानीं रणे यत्तः कौरवोऽसि विशेषतः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
तिष्ठेद्यथेष्टं यश्चापि गङ्गाय़ां स विशिष्यते ||
४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
तिष्ठेद्युगसहस्रं तु पादेनैकेन यः पुमान् |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४८
वासुदेव उवाच
तिष्ठेय़ुः पाण्डवाः सर्वे हित्वा मानमधश्चराः ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
तिष्ठेय़ुरप्यभुञ्जाना वहूनि दिवसान्यपि |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
सञ्जय़ उवाच
तिष्ठेय़ुर्दंशिता यत्र सर्वे युद्धविशारदाः |
५५ क
वन पर्व
अध्याय
२८०
मार्कण्डेय़ उवाच
तिसृणां वसतीनां हि स्थानं परमदुष्करम् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
तिसृष्वन्यासु पुण्यानि दिक्षु तीर्थानि मे शृणु |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८७
वैशम्पाय़न उवाच
तिस्रः कक्ष्या व्यतिक्रम्य केशवो राजवेश्मनः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२०९
मार्कण्डेय़ उवाच
तिस्रः कन्या भवन्त्यन्या यासां स भरतः पतिः |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
तिस्रः कृत्वा पुरो भार्याः पश्चाद्विन्देत व्राह्मणीम् |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
१६५
अर्जुन उवाच
तिस्रः कोट्यः समाख्यातास्तुल्यरूपवलप्रभाः |
११ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तिस्रः कोट्यस्तु तीर्थानां तस्मिन्कूपे महीपते |
१५३ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तिस्रः कोट्यस्तु तीर्थानां सरके कुरुनन्दन |
६३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
तिस्रः क्षत्रिय़सम्वन्धाद्द्वय़ोरात्मास्य जाय़ते |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
तिस्रः प्रकृतय़ो राजन्देहवन्धेषु निर्मिताः |
६३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५९
वासुदेव उवाच
तिस्रस्तु पाण्डुपुत्राणां चम्वो वीभत्सुपालिताः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
तिस्रो देवीर्यदा चैव भजते भुवनेश्वरः |
८९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
तिस्रो भार्या व्राह्मणस्य द्वे भार्ये क्षत्रिय़स्य तु |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
तिस्रो रात्रीरद्भिरुपोष्य भूमौ; तृप्ता गावस्तर्पितेभ्यः प्रदेय़ाः |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
तिस्रो रात्रीस्त्वद्भिरुपोष्य भूमौ; तृप्ता गावस्तर्पितेभ्यः प्रदेय़ाः |
४१ क