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विराट पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
तां वेलां नर्तनागारे पाञ्चालीसङ्गमाशय़ा ||
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
तां वै शक्तिं लेलिहानां प्रदीप्तां; पाशैर्युक्तामन्तकस्येव रात्रिम् |
५४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४
शल्य उवाच
तां वय़ोरूपसम्पन्नां दृष्ट्वा देवीमुपस्थिताम् ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
तां शक्तिं पतितां दृष्ट्वा कार्ष्णिः परमकोपनः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
तां शक्तिपाषाणपरश्वधानां; प्रासासिवज्राशनिमुद्गराणाम् |
२९ क
विराट पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
तां शमीमुपसङ्गम्य पार्थो वैराटिमव्रवीत् |
१ क
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
तां शरैरावृतां दृष्ट्वा नदीं गङ्गां तदन्तिके |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६३
सञ्जय़ उवाच
तां शरैर्दशभिः कर्णः सुपुङ्खैः सुसमाहितैः |
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
तां शरौघमहाफेनां प्रासमत्स्यसमाकुलाम् |
४३ क
कर्ण पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
तां शस्त्रवृष्टिं वहुधा छित्त्वा कर्णः शितैः शरैः |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
तां शस्त्रवृष्टिमतुलां वज्राशनिसमस्वनाम् |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
तां शस्त्रवृष्टिमुरसा गाहमानं; कर्णं चैकं तत्र राजन्नपश्यम् ||
४३ ख
आदि पर्व
अध्याय ११४
वैशम्पाय़न उवाच
तां शिलां चूर्णितां दृष्ट्वा पाण्डुर्विस्मय़मागमत् ||
१३ ग
वन पर्व
अध्याय ६०
वृहदश्व उवाच
तां शुष्यमाणामत्यर्थं कुररीमिव वाशतीम् |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
तां श्रुत्वा श्रेय़ आदत्स्व यदि साध्विति मन्यसे ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय २१९
वैशम्पाय़न उवाच
तां स कृष्णार्जुनकृतां सुधां प्राप्य हुताशनः |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
तां स दीर्घतमाङ्गेषु स्पृष्ट्वा देवीमथाव्रवीत् |
३१ क
वन पर्व
अध्याय ६०
वृहदश्व उवाच
तां स दृष्ट्वा तथा ग्रस्तामुरगेणाय़तेक्षणाम् |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय १०७
वैशम्पाय़न उवाच
तां स मांसमय़ीं पेशीं ददर्श जपतां वरः ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८९
भीष्म उवाच
तां स राजा प्रिय़ां भार्यां द्रुपदः कुरुनन्दन |
११ ख
मौसल पर्व
अध्याय ६
वैशम्पाय़न उवाच
तां स वृष्ण्यन्धकजलां हय़मीनां रथोडुपाम् |
८ क
विराट पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
तां स वेलामिवोद्धूतां शरवृष्टिं समुत्थिताम् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय १२२
लोमश उवाच
तां सखीरहितामेकामेकवस्त्रामलङ्कृताम् |
१० क
सभा पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
तां सभामभितो नित्यं पुष्पवन्तो महाद्रुमाः |
३१ क
वन पर्व
अध्याय ५९
वृहदश्व उवाच
तां सभामुपसम्प्राप्य तदा स निषधाधिपः |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
तां समर्प्य ततः सङ्ख्ये लघुहस्तः शितैः शरैः |
२६ क
वन पर्व
अध्याय २५१
वैशम्पाय़न उवाच
तां समाचक्ष्व कल्याणीं यदि स्याच्छैव्य मानुषी ||
४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
तां समाश्वासय़ामास पृथा पृथुललोचना |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
तां समासाद्य वित्रस्तां कृष्णां कमललोचनाम् |
९ क
वन पर्व
अध्याय ६५
वृहदश्व उवाच
तां समीक्ष्य विशालाक्षीमधिकं मलिनां कृशाम् |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
तां समुद्रमिवोद्धूतां शरवृष्टिं समुत्थिताम् |
३३ क
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
तां सर्वशक्त्या प्रहितां स शक्तिं; युधिष्ठिरेणाप्रतिवार्यवीर्याम् |
४८ क
वन पर्व
अध्याय २२२
वैशम्पाय़न उवाच
तां सर्वां शृणु मे सत्यां सत्यभामे यशस्विनि ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय ३३
द्रौपद्यु उवाच
तां सिद्धिमुपजीवन्ति कर्मणामिह जन्तवः ||
२६ ख
विराट पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
तां सुदेष्णे परीप्सस्व माहं प्राणान्प्रहासिषम् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय २७७
मार्कण्डेय़ उवाच
तां सुमध्यां पृथुश्रोणीं प्रतिमां काञ्चनीमिव |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय २०८
वैशम्पाय़न उवाच
तां स्त्रिय़ं परमप्रीत इदं वचनमव्रवीत् ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
तां स्म तत्र मय़ेनोक्ता रक्षन्ति च वहन्ति च |
२५ क
वन पर्व
अध्याय २७९
अश्वपतिरु उवाच
तां स्वधर्मेण धर्मज्ञ स्नुषार्थे त्वं गृहाण मे ||
८ ख
विराट पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
तांश्च गाण्डीवनिर्मुक्तैः प्राहिणोद्यमसादनम् ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय २७२
मार्कण्डेय़ उवाच
तांश्च तौ चाप्यदृश्यः स शरैर्विव्याध राक्षसः |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
तांश्च प्रद्रवतो दृष्ट्वा जय़ं प्राप्ताश्च पाण्डवाः |
४५ क
आदि पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
तांश्च प्राप्तांस्तदा वीराञ्जज्ञिरे न नराः क्वचित् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५४
भीष्म उवाच
तांश्च मातुः प्रिय़ाञ्जानन्नाक्रम्य वहुधा नराः |
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४३
भीष्म उवाच
तांश्च वद्धा कपोतान्स सम्प्रमुच्योत्ससर्ज ह ||
१० ख
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
तांश्च विक्रमसे जेतुं जित्वा च परिरक्षसि ||
५२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४५
सञ्जय़ उवाच
तांश्च विद्ध्वा पुनर्वीरान्वीरः सुनिशितैः शरैः |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
तांश्च वृष्ण्यन्धकश्रेष्ठान्धर्मराजो युधिष्ठिरः |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
तांश्च शैलान्व्रजन्पार्थः प्रेक्षते सहकेशवः |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय ९७
सञ्जय़ उवाच
तांश्च सञ्चोदय़न्सर्वान्घ्नतैनमिति भारत |
१८ क