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शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
नारद उवाच
तस्य योनौ प्रसक्तस्य गर्भो भवति वा न वा |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य राजन्गुरुकुले वसतो नित्यमेव ह |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७४
भीष्म उवाच
तस्य राजन्फलं विद्धि स्वर्लोके स्थानमुत्तमम् |
३९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
तस्य राजन्सनिस्त्रिंशं सुप्रभं च शरावरम् |
३० क
आदि पर्व
अध्याय ३७
कृश उवाच
तस्य राजा धनुष्कोट्या सर्पं स्कन्धे समासृजत् ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
तस्य राजा महाप्राज्ञो धर्मराजो युधिष्ठिरः |
४१ क
सभा पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य राजा सिंहगतेः सखेलं; दुर्योधनो भीमसेनस्य हर्षात् |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय १६३
गन्धर्व उवाच
तस्य राज्ञः पुरे तस्मिन्समा द्वादश सर्वशः |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
तस्य राज्ञः शुभैरार्यैः कर्मभिर्निर्वृताः प्रजाः |
४१ क
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
तस्य राज्ञः सुतो वीरः श्रीमान्सत्यपराक्रमः |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९२
उतथ्य उवाच
तस्य राज्ञानुकर्तव्यं यन्तव्या विधिवत्प्रजाः ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय १६८
गन्धर्व उवाच
तस्य राज्ञोऽऽज्ञय़ा देवी वसिष्ठमुपचक्रमे ||
२१ ख
विराट पर्व
अध्याय ५५
अर्जुन उवाच
तस्य राधेय़ कोपस्य विजय़ं पश्य मे मृधे ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २४
व्रह्मो उवाच
तस्य रामेति विख्यातः पुत्रस्तेजोगुणान्वितः ||
१३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४४
व्यास उवाच
तस्य रूपं गुणं विद्यात्तमोऽन्ववसितात्मकम् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय २२
वासुदेव उवाच
तस्य रूपं प्रपततः पितुर्मम नराधिप |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
तस्य रूपं वभौ राजन्भारद्वाजं जिघांसतः |
१४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
तस्य रूपं शरस्यासीद्धनुर्ज्यामण्डलान्तरे |
११५ क
आदि पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य रूपगुणोपेता गङ्गा श्रीरिव रूपिणी |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७०
सञ्जय़ उवाच
तस्य रूपमभूद्राजन्भीमसेनस्य संय़ुगे |
५६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
तस्य रूपेण संमत्ता देवगन्धर्वदानवाः |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य रेतः प्रचस्कन्द चरतो रुचिरे वने |
३९ क
वन पर्व
अध्याय ११०
लोमश उवाच
तस्य रेतः प्रचस्कन्द दृष्ट्वाप्सरसमुर्वशीम् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४८
भीष्म उवाच
तस्य रोषान्महाराज खेभ्योऽग्निरुदतिष्ठत |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
तस्य लक्ष्म न पश्यामि तेन विन्दामि कश्मलम् ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
तस्य लक्ष्म न पश्यामि भीमसेनानुजस्य ते ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय २३६
जनमेजय़ उवाच
तस्य लज्जान्वितस्यैव शोकव्याकुलचेतसः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
तस्य लाघवमाज्ञाय़ सत्त्वं चामिततेजसः |
७४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
तस्य लाघवमार्गस्थमलातसदृशप्रभम् |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
तस्य लाघवमार्गस्थमादित्यसदृशप्रभम् |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
तस्य लाघवमुद्वीक्ष्य तुतुषुर्देवता अपि ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य लाङ्गूलनिनदं पर्वतः स गुहामुखैः |
६१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
तस्य लालप्यतः श्रुत्वा वृद्धः कुरुपितामहः |
१ क
स्त्री पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य लालप्यमानस्य वहुशोकं विचिन्वतः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५४
भीष्म उवाच
तस्य लिङ्गानि वक्ष्यामि येषां समुदय़ो दमः ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
उत्तङ्क उवाच
तस्य लोकस्य च द्वारं ददर्श स भृगूद्वहः |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७३
भीष्म उवाच
तस्य लोकाः किलाक्षय़्या दैवतैः सह नित्यदा |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
तस्य लोकाः शुभा दिव्या देवराजर्षिपूजिताः |
११६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
दिलीप उवाच
तस्य लोकान्स व्रजतु यस्ते हरति पुष्करम् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
भीष्म उवाच
तस्य लोपः कथं न स्याल्लोकेष्ववहितात्मनः |
९ ख
वन पर्व
अध्याय २०१
व्याध उवाच
तस्य लोभाभिभूतस्य रागद्वेषहतस्य च |
५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
तस्य लोहितसिक्तस्य दीप्तखड्गस्य युध्यतः |
४१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९१
भीष्म उवाच
तस्य वंशे महाराज दत्तात्रेय़ इति स्मृतः ||
४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २०
गान्धार्यु उवाच
तस्य वक्त्रमुपाघ्राय़ सौभद्रस्य यशस्विनी |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
तस्य वर्म मुखत्राणं शातकुम्भपरिष्कृतम् |
४६ क
वन पर्व
अध्याय १८
वासुदेव उवाच
तस्य वर्म विभिद्याशु स वाणो मत्सुतेरितः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्य वर्षशतं सन्ध्या सन्ध्यांशश्च ततः परम् |
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
तस्य वर्षसहस्रं तु निय़मेन तथा गतम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२६
भीष्म उवाच
तस्य वाक्चैव चेष्टा च सामान्ये राजसत्तम ||
९ ख