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वन पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य देवेश न वय़ं विद्मः सर्वे चिकीर्षितम् |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३११
भीष्म उवाच
तस्य देवेश्वरः शक्रो दिव्यमद्भुतदर्शनम् |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
तस्य देवोऽददत्पुत्रान्सहस्रं क्रतुसंमितान् |
६१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
तस्य देहपरित्यागादिष्टाः कामाक्षय़ा मताः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय २६३
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्य देहाद्विनिःसृत्य पुरुषो दिव्यदर्शनः |
३६ क
वन पर्व
अध्याय २७४
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्य देहाद्विनिष्क्रान्ताः शतशोऽथ सहस्रशः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५४
भीष्म उवाच
तस्य देहाद्विमुक्तस्य भय़ं नास्ति कुतश्चन ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३७
व्यास उवाच
तस्य देहाद्विमुक्तस्य भय़ं नास्ति कुतश्चन ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय ६२
वृहदश्व उवाच
तस्य दैवात्प्रसङ्गोऽभूदतिमात्रं स्म देवने |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१५
भीष्म उवाच
तस्य दोषवती प्रज्ञा स्वमूर्त्यज्ञेति मे मतिः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय २७८
राजो उवाच
तस्य दोषो महानेको गुणानाक्रम्य तिष्ठति ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
तस्य दौःशासनिर्विद्ध्वा चतुर्भिश्चतुरो हय़ान् |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
तस्य द्रोणः पुनश्चापं चिच्छेदामित्रकर्शनः |
६५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
तस्य द्रोणः शरान्पञ्च प्रेषय़ामास भारत |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
तस्य द्रोणः शितैर्वाणैस्तीक्ष्णधारैरय़स्मय़ैः |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
तस्य द्रोणः सुसङ्क्रुद्धः परासुकरणं दृढम् |
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९७
सञ्जय़ उवाच
तस्य द्रोणसुतश्चापं द्विधा चिच्छेद भारत |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
तस्य द्रोणो धनुर्मध्ये क्षुरप्रेण शितेन ह |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
तस्य द्रोणो धनुश्छित्त्वा तं द्रुतं समुपाद्रवत् ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
तस्य द्रोणो धनुश्छित्त्वा विद्ध्वा चैनं शिलीमुखैः |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
तस्य द्रोणो महाराज स्वर्णपुङ्खाञ्शिलाशितान् |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३०
सञ्जय़ उवाच
तस्य द्रोणो हय़ान्हत्वा सारथिं च महात्मनः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
तस्य द्रोणो हय़ान्हत्वा सारथिं च महावलः |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
तस्य द्रोणोऽच्छिनन्मुष्टौ खड्गं मणिमय़त्सरुम् |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
तस्य द्रोणोऽवधीदश्वाञ्शरैः संनतपर्वभिः |
१७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य द्वाराणि कार्याणि पर्याप्तानि वृहन्ति च |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
तस्य द्वावनुपश्येत तमेकमिति साधवः ||
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०१
भीष्म उवाच
तस्य द्वे नामनी लोके दक्षः क इति चोच्यते ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६१
कपिल उवाच
तस्य द्वेषश्च कामश्च क्रोधो दम्भोऽनृतं मदः |
५१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
तस्य द्वेषेण संय़ुक्तः परिदह्ये धनञ्जय़ |
१७ क
वन पर्व
अध्याय २
युधिष्ठिर उवाच
तस्य धर्मं परं प्राहुः कथं वा विप्र मन्यसे ||
५९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
महेश्वर उवाच
तस्य धर्मक्रिय़ा देवि व्रतचर्या च न्याय़तः |
३२ क
सभा पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य धर्मप्रवृत्तस्य पार्थिवत्वं चिकीर्षतः |
३६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४
व्यास उवाच
तस्य धर्मप्रवृत्तस्य व्यशीर्यत्कोशवाहनम् |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
तस्य धर्मसुतो राजन्क्षुरप्रेण महाहवे |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य धर्मस्य कृत्स्नस्य क्षत्रिय़ः परिरक्षिता ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७३
वाय़ुरु उवाच
तस्य धर्मस्य सर्वस्य भागी राजपुरोहितः ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय १६५
गन्धर्व उवाच
तस्य धर्मात्मनः पुत्रः समृद्धवलवाहनः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय ११९
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य धर्मादपेतस्य पापानि परिपश्यतः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय २००
व्याध उवाच
तस्य धर्मादवाप्तेषु धनेषु द्विजसत्तम |
४४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
महेश्वर उवाच
तस्य धर्मार्जिता लोकाः प्रजापालनसञ्चिताः ||
४८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२०
भीष्म उवाच
तस्य धर्मार्थविदुषो दृष्ट्वा तद्विपुलं तपः |
२ क
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य धर्मार्थहीनस्य कामान्ते निधनं ध्रुवम् |
२७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २४
नारद उवाच
तस्य धूमस्तमोरूपं रजो भस्म सुरेतसः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य नप्तारमाय़ान्तं शैव्यं कः समवारय़त् |
६६ क
द्रोण पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
तस्य नागं मणिमय़ं रत्नचित्रं ध्वजे स्थितम् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
तस्य नादं ततः श्रुत्वा सिंहस्येवामिषैषिणः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य नादं विनदतो महाहासं च मुञ्चतः |
५० क
भीष्म पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
तस्य नादेन महता मनोहृदय़कम्पिना |
३५ क
वन पर्व
अध्याय १२
विदुर उवाच
तस्य नादेन सन्त्रस्ताः पक्षिणः सर्वतोदिशम् |
१० क