शान्ति पर्व
अध्याय
१६२
भीष्म उवाच
तस्य क्षय़मुपागम्य ततो भिक्षामय़ाचत |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
२९५
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य गत्वा पदं शीघ्रमासाद्य च महामृगम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७७
भृगुरु उवाच
तस्य गन्धस्य वक्ष्यामि विस्तराभिहितान्गुणान् |
२७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४९
व्रह्मो उवाच
तस्य गन्धस्य वक्ष्यामि विस्तरेण वहून्गुणान् ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य गात्राणि सर्वाणि चूर्णय़ामास पाण्डवः |
५९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
राजो उवाच
तस्य गृत्समदः पुत्रो रूपेणेन्द्र इवापरः |
५५ क
वन पर्व
अध्याय
२६३
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्य गृध्रः शिरःकम्पैराचचक्षे ममार च ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
तस्य घोराणि रूपाणि दीप्तानि च वहूनि च |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
२९०
सूर्य उवाच
तस्य च व्राह्मणस्याद्य योऽसौ मन्त्रमदात्तव |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
तस्य च व्राह्मणो मूलं भवांश्च व्रह्मवित्तमः ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४९
व्राह्मण उवाच
तस्य चाक्लेशकरणं स्वस्तिकारसमाहितम् |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
महेश्वर उवाच
तस्य चाक्ष्णो महत्तेजो येनाय़ं मथितो गिरिः |
४५ क
शल्य पर्व
अध्याय
३४
जनमेजय़ उवाच
तस्य चागमनं भूय़ो व्रह्मञ्शंसितुमर्हसि ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
तस्य चाज्ञानमाधारः प्रमादः परिषेचनम् |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
अग्निरु उवाच
तस्य चातमसो लोका गच्छतः परमां गतिम् |
५९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३९
सञ्जय़ उवाच
तस्य चानुचरांस्तीक्ष्णैर्विव्याध परमेषुभिः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
तस्य चानुचरान्सर्वान्क्रुद्धः प्राच्छादय़च्छरैः ||
४३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
तस्य चानुचरैः शूरैस्त्रिगर्तानां महारथैः |
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२६
व्राह्मण उवाच
तस्य चानुमते कर्म ततः पश्चात्प्रवर्तते |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
तस्य चान्येऽपि दिङ्नागा वभूवुरनुय़ाय़िनः ||
५० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
तस्य चापच्युतैर्वाणैः परदेहविदारणैः |
२८ क
स्त्री पर्व
अध्याय
५
विदुर उवाच
तस्य चापि प्रशाखासु वृक्षशाखावलम्विनः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
तस्य चापि भवेत्कार्यं विवृद्धौ रक्षणे तथा |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५६
वासुदेव उवाच
तस्य चापि वधोपाय़ं वक्ष्यामि तव पाण्डव ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१००
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य चापि शतं पुत्रा भविष्यन्ति महावलाः |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
तस्य चाप्लवतः शीघ्रं वृषसेनस्य सात्यकिः |
६५ क
आदि पर्व
अध्याय
२०५
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य चार्तस्य तैर्वाक्यैश्चोद्यमानः पुनः पुनः |
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
तस्य चास्त्राणि दिव्यानि विविधानि महात्मनः |
३३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य चाहं प्रसादेन तव कल्याणि तेजसा |
५० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४९
व्राह्मण उवाच
तस्य चाहमसांनिध्यं श्रुतवानस्मि तं गतम् |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
तस्य चाह्नस्त्रिभागेन क्षय़ं जग्मुः पतत्रिणः ||
११९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
तस्य चिच्छेद तां शक्तिं पञ्चधा पञ्चभिः शरैः |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
तस्य चित्यैर्महाराज क्रतूनां दक्षिणावताम् |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय
२०७
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य चित्राङ्गदा नाम दुहिता चारुदर्शना |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४८
भीष्म उवाच
तस्य चिन्ता समुत्पन्ना संहारं प्रति भूपते |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
२४३
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य चिन्तापरीतस्य वुद्धिर्जज्ञे महात्मनः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३३
नरनाराय़णावू ऊचतुः
तस्य चिन्तय़तः सद्यः पितृकार्यविधिं परम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
तस्य चिन्तय़तः सृष्टिं महानात्मगुणः स्मृतः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
धृतराष्ट्र उवाच
तस्य चिन्तय़तस्तात छाय़ाभूतं महाद्युते |
४५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४२
भीष्म उवाच
तस्य चिन्तय़तस्तात वह्व्यो दिननिशा यय़ुः |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
तस्य चिन्तय़तस्त्वेवं फल्गुनस्य महात्मनः |
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य चिन्तय़तो दुःखमनिशं पार्थिवस्य तत् |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य चिन्तय़मानस्य वुद्धिः समभवत्तदा |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य चीनैः किरातैश्च काञ्चनैरिव संवृतम् |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य चैतत्प्रदानस्य फलमद्यानुपश्यसि |
४१ क
सभा पर्व
अध्याय
३८
शिशुपाल उवाच
तस्य चैव समभ्याशे निक्षिप्याण्डानि सर्वशः |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२२
स्त्र्यु उवाच
तस्य चोत्तरतो देशे दृष्टं तद्दैवतं महत् ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
तस्य चोद्धरणे यत्नमकुर्वंस्ते सहस्रशः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
तस्य जज्ञे तदा नद्यां कन्या राजीवलोचना |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२५६
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य जानुं ददौ भीमो जघ्ने चैनमरत्निना |
५ क