आदि पर्व
अध्याय
२५
सूत उवाच
तस्य कण्ठमनुप्राप्तो व्राह्मणः सह भार्यया |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
१०४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य कन्या पृथा नाम रूपेणासदृशी भुवि ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
तस्य कन्याभवद्राजन्नाम्ना सत्यवती प्रभो |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
कृष्ण उवाच
तस्य कर्णः शरैः क्रुद्धश्चिच्छेद ज्यां सुतेजनैः ||
५३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
तस्य कर्णः शितान्वाणान्प्रतिहन्य हसन्निव |
४५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
तस्य कर्णश्चतुःषष्ट्या व्यधमत्कवचं दृढम् |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३
नारद उवाच
तस्य कर्णस्तदाचष्ट कृमिणा परिभक्षणम् |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
तस्य कर्णात्मजश्चापं छित्त्वा केतुमपातय़त् |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
तस्य कर्णो धनुर्मध्ये द्विधा चिच्छेद पत्रिणा |
३३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
तस्य कर्णो धनुश्छित्त्वा स्वर्णपुङ्खैः शिलाशितैः |
५७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
तस्य कर्णो महाराज शरं कनकभूषणम् |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
तस्य कर्णो महेष्वासः साय़कांश्चतुरोऽक्षिपत् |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४२
सञ्जय़ उवाच
तस्य कर्णो हय़ान्हत्वा शरैः संनतपर्वभिः |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
तस्य कर्णो हय़ान्हत्वा सारथिं च त्रिभिः शरैः |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय
२६
श्रीभगवानु उवाच
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
तस्य कर्माणि सिध्यन्ति न च सन्त्यज्यते श्रिय़ा ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
तस्य काञ्चनसूत्रस्तु शरैः परिवृतो मणिः |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
११६
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य कामः प्रववृधे गहनेऽग्निरिवोत्थितः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०६
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य कामांश्च भोगांश्च नरा नित्यमतन्द्रिताः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
११०
पाण्डुरु उवाच
तस्य कामात्मनः क्षेत्रे राज्ञः संय़तवागृषिः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
११६
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य कामात्मनो वुद्धिः साक्षात्कालेन मोहिता |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४
व्यास उवाच
तस्य कारन्धमः पुत्रस्त्रेताय़ुगमुखेऽभवत् |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
तस्य कार्यं त्वय़ा वीर रक्षणं सुमहात्मनः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
तस्य कार्ष्णाय़सं वर्म हेमचित्रं महर्द्धिमत् |
५५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१८
व्राह्मण उवाच
तस्य कालपरीमाणमकरोत्स पितामहः |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय
१०१
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य कालेन महता तस्मिंस्तपसि तिष्ठतः |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१११
नारद उवाच
तस्य कालोऽपवर्गस्य यथा वा मन्यते भवान् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
तस्य काल्यं गता भार्या चरितुं नाभ्यवर्तत |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य काष्ठे विलग्नाभूज्जटा रूप्यसमप्रभा |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
तस्य काय़ं विनिर्भिद्य ममज्ज धरणीतले |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७४
युधिष्ठिर उवाच
तस्य किं च फलं दृष्टं श्रुतं यः सम्प्रय़च्छति ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
तस्य कीर्तिमतस्तात पुरा रामेण धीमता |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
तस्य कीर्तिमतो लक्ष्म सूर्यप्रतिमतेजसः |
४३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य कृष्ण महावुद्धेर्गम्भीरस्य महात्मनः |
५३ क
आदि पर्व
अध्याय
१००
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य कृष्णस्य कपिला जटा दीप्ते च लोचने |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
तस्य कोपं समुद्वीक्ष्य चित्तज्ञः केशवस्तदा |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२५८
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्य कोपात्पिता राजन्ससर्जात्मानमात्मना ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
तस्य कोशवलज्यान्या सर्वलोकपराभवः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४४
सञ्जय़ उवाच
तस्य क्रुद्धः कृपो राजञ्शक्तिं चिक्षेप दारुणाम् |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
तस्य क्रुद्धः स नागेन्द्रो वृहतः साधुवाहिनः |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
तस्य क्रुद्धस्य नेत्राभ्यां पावकः समजाय़त |
८६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
सञ्जय़ उवाच
तस्य क्रुद्धस्य राजेन्द्र वपुर्दिव्यमदृश्यत |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
तस्य क्रुद्धो महाराज पाण्डवः शत्रुकर्शनः |
३९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
तस्य क्रुद्धो महाराज पार्षतः परवीरहा |
४७ क
शल्य पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य क्रुद्धो महाराज वसिष्ठो मुनिसत्तमः |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
तस्य क्रुद्धो महाराज सात्यकिः सत्यविक्रमः |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
तस्य क्रोधं सञ्जय़ाहं समीके; स्थाने जानन्भृशमस्म्यद्य भीतः ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
तस्य क्रोधाभिभूतस्य संय़ुगेष्वनिवर्तिनः |
६६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
तस्य क्रोधेन सर्वेभ्यः स्रोतोभ्यस्तेजसोऽर्चिषः |
७ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२०
गान्धार्यु उवाच
तस्य क्षतजसन्दिग्धं जातरूपपरिष्कृतम् |
८ क