द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्हते महेष्वासे राजपुत्रे महावले |
३६ क
शल्य पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्हते महेष्वासे हतशिष्टास्त्रय़ो रथाः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
३३
सूत उवाच
तस्मिन्हते यज्ञकरे क्रतुः स न भविष्यति ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्हते राजपुत्रे पाञ्चालानां यशस्करे |
४८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१
जनमेजय़ उवाच
तस्मिन्हते स कौरव्यः कथं प्राणानधारय़त् ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्हते हतं मन्ये सर्वसैन्यमशेषतः ||
३० ग
शल्य पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्हते हतं सर्वं धार्तराष्ट्रवलं महत् ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५७
धृतराष्ट्र उवाच
तस्मिन्हते हता हि स्युः सर्वे पाण्डवसृञ्जय़ाः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८३
पराशर उवाच
तस्मिन्हतेऽथ स्वं भावं प्रत्यपद्यन्त मानवाः |
१७ क
सभा पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्हि ततृपुर्देवास्तते यज्ञे महर्षिभिः ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११
भीष्म उवाच
तस्मिन्हि धर्मः सुमहान्निविष्टो; व्रह्मण्यता चात्र तथा प्रिय़त्वम् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्हि पुरुषव्याघ्रे कर्मभिः स्वैर्दिवं गते |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
तस्मिन्हि पूज्यमाने वै देवदेवे महेश्वरे |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्हि यात्रा लोकस्य भूतानामीश्वरो हि सः |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्हि विजय़ः कृत्स्नः पाण्डवेन समाहितः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३७
व्यास उवाच
तस्मिन्हुतं तर्पय़तीह देवां; स्ते वै तृप्तास्तर्पय़न्त्यास्यमस्य ||
३३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्ह्यस्त्राणि दिव्यानि दिव्यं संहननं तथा |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्ह्रदं प्रविष्टे तु त्रीन्रथाञ्श्रान्तवाहनान् |
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९१
उतथ्य उवाच
तस्मिन्ह्रसति हीय़न्ते तस्माद्धर्मं प्रवर्धय़ेत् ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
तस्मै कर्णः शतं राजन्निषूणां गार्ध्रवाससाम् |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
तस्मै कर्णः शितान्वाणान्कर्मारपरिमार्जितान् |
४० क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
तस्मै कामं मय़स्तं तं विदधे माय़या तदा ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मै कृष्णो ददौ राज्ञे महार्हमभिपूजितम् |
९ क
वन पर्व
अध्याय
१२७
लोमश उवाच
तस्मै क्षत्ता यथावृत्तमाचचक्षे सुतं प्रति ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५२
सञ्जय़ उवाच
तस्मै गुर्वीं गदां घोरां स विनद्योत्ससर्ज ह ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय
९६
लोमश उवाच
तस्मै चार्घ्यं यथान्याय़मानीय़ पृथिवीपतिः |
३ क
वन पर्व
अध्याय
१६४
अर्जुन उवाच
तस्मै चाहं यथावृत्तं सर्वमेव न्यवेदय़म् |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
तस्मै जय़ाशिषः पूर्वं यथान्याय़ं प्रय़ुज्य सः |
१८० क
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
तस्मै तत्सर्वमाचख्युर्यद्वृत्तं यच्च वै श्रुतम् ||
४१ ख
विराट पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मै तत्सर्वमाचष्ट राष्ट्रस्य पशुकर्षणम् ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
तस्मै तदहमाचक्षं सर्वं प्रत्यक्षदर्शिवान् |
४५ क
वन पर्व
अध्याय
२७५
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्मै तद्भरतो राज्यमागताय़ाभिसत्कृतम् |
६४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
तस्मै तुष्टः स शिष्याय़ प्रसन्नोऽथाव्रवीद्गुरुः |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
व्यास उवाच
तस्मै तुष्टाः प्रय़च्छन्ति वरानपि सुदुर्लभान् ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
तस्मै त्वां विसृजेय़ं वै स त्वां रक्षेद्यथार्जुनः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
तस्मै दत्त्वा स सत्कारं विधिदृष्टेन कर्मणा |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मै ददावभिज्ञानं स चेक्ष्वाकुवरस्तदा ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
तस्मै दद्यामभिप्रेतं वरं यं मनसेच्छति ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
तस्मै दद्यामहं यो मे प्रव्रूय़ात्केशवार्जुनौ ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६०
गन्धर्व उवाच
तस्मै दातुं मनश्चक्रे तपतीं तपनः स्वय़म् ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मै दित्सति कन्यां तु व्राह्मणाय़ महात्मने |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
व्यास उवाच
तस्मै नमध्वं देवाय़ निर्गुणाय़ गुणात्मने |
९० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
तस्मै नमस्तु कुर्वन्तो देवास्तिष्ठन्ति वै दिवि |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२११
भीष्म उवाच
तस्मै परमकल्पाय़ प्रणताय़ च धर्मतः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
तस्मै पर्णमय़ं दिव्यं दिव्यपुष्पाधिवासितम् |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
तस्मै पाञ्चालको राजा गामर्घ्यं च सुसत्कृतम् |
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
९९
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मै पूजां ततोऽकार्षीत्पुरोधाः परमर्षय़े |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय
९९
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मै पूजां तदा दत्त्वा सुताय़ विधिपूर्वकम् |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८४
धृतराष्ट्र उवाच
तस्मै पूजां प्रय़ोक्ष्यामि दाशार्हाय़ महात्मने |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
१५४
व्राह्मण उवाच
तस्मै पौत्रान्समादाय़ वसूनि विविधानि च |
१७ क