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शान्ति पर्व
अध्याय ८१
भीष्म उवाच
तस्मिन्कुर्वीत विश्वासं यथा पितरि वै तथा ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८७
भीष्म उवाच
तस्मिन्कुर्वीत विश्वासं राजा कस्याञ्चिदापदि |
२८ क
वन पर्व
अध्याय १७३
जनमेजय़ उवाच
तस्मिन्कृतास्त्रे रथिनां प्रधाने; प्रत्यागते भवनाद्वृत्रहन्तुः |
१ क
विराट पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्कृते तदा देवी कीचकेनोपमन्त्रिता |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४४
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्कोलाहले युद्धे वर्तमाने निशामुखे |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय १२९
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्कोलाहले वृत्ते तदद्भुतमभूत्तदा ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्क्रतुवरे वृत्ते सङ्ग्रामः समजाय़त |
१३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १८
वासुदेव उवाच
तस्मिन्क्रुद्धेऽभवत्सर्वमस्वस्थं भुवनं विभो |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्क्षणे तस्य यन्ता तूर्णमश्वानचोदय़त् |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्क्षणे नरश्रेष्ठ गजवाजिनरक्षय़ः |
४३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्क्षणे पाण्डवस्य वाह्वोर्वलमदृश्यत |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०९
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्क्षणे महाराज नवभिर्नतपर्वभिः |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्क्षणे समभवत्संवर्तक इवानलः ||
५२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्क्षणे सात्यकिः सत्यसन्धः; शिनिप्रवीरोऽभ्यपतत्पितामहम् |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्क्षणे सूतपुत्रस्तु पार्थं; समाचिनोत्क्षुद्रकाणां शतेन ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय १२
विदुर उवाच
तस्मिन्क्षणेऽथ प्रववौ मारुतो भृशदारुणः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय २३५
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्गते कौरवेय़े कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय २२०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्गते महाभागे लपितां प्रति भारत |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
धृतराष्ट्र उवाच
तस्मिन्गते महाश्वेतः शरीरात्तस्य निर्ययौ |
५३ क
आदि पर्व
अध्याय ५
सूत उवाच
तस्मिन्गर्भे सम्भृतेऽथ पुलोमाय़ां भृगूद्वह |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्गां मधुपर्कं च उपहृत्य जनार्दने |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्गिरिवरे पुत्र पुष्पितद्रुमकानने |
३२ ख
वन पर्व
अध्याय १७४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्गिरौ प्रस्रवणोपपन्ने; हिमोत्तरीय़ारुणपाण्डुसानौ |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २६
व्राह्मण उवाच
तस्मिन्गुरौ गुरुवासं निरुष्य; शक्रो गतः सर्वलोकामरत्वम् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
तस्मिन्गृहवरे राजंस्तय़ा रेमे स गौतमः ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय २३१
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्गृहीते राजेन्द्र स्थितं दुःशासनं रथे |
७ क
विराट पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्गृहीते विरथे त्रिगर्तानां महारथे |
३३ क
विराट पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्गृहीते विरथे विराटे वलवत्तरे |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय ८२
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्ग्रामे प्रधानास्तु य आसन्व्राह्मणा नृप |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्घोरे कुरुवीरावमर्दे; कालोत्सृष्टे क्षत्रिय़ाणामभावे |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
व्यास उवाच
तस्मिन्घोरे तदा पार्थ सङ्ग्रामे लोमहर्षणे ||
१४ ग
वन पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्दशार्हाधिपतौ प्रय़ाते; युधिष्ठिरो भीमसेनार्जुनौ च |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्दाशरथे युद्धे वर्तमाने भय़ावहे |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१०
भीष्म उवाच
तस्मिन्दिव्ये वने रम्ये देवदेवर्षिसङ्कुले |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय १११
तापसा ऊचुः
तस्मिन्दृष्टे फले तात प्रय़त्नं कर्तुमर्हसि |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८२
भीष्म उवाच
तस्मिन्देवसमावाय़े सर्वभूतसमागमे |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्देशे च राजेन्द्र यत्र तद्द्रव्यमुत्तमम् |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्देशे त्वनिरिणे तत्र युद्धमरोचय़न् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
भीष्म उवाच
तस्मिन्देशे प्रसुष्वाप पतितो यत्र भारत ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
तस्मिन्देशे मानुषाणामगम्ये; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१११ ख
वन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्देशे यदा वृक्षाः सर्व एव निपातिताः |
५१ क
शल्य पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्देशे व्यवस्थाप्य यत्र शारद्वतः स्थितः ||
४७ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्देशे स शुश्राव समन्ताद्वदतां नृप ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५३
अर्जुन उवाच
तस्मिन्द्यूतमिदं वद्धं मन्यते स्म सुय़ोधनः |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्द्रुते गजानीके जलसन्धो महारथः |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्द्रोणेन निहताः पाञ्चालाः पञ्चविंशतिः |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्द्रोणो वाणशतं पुत्रगृद्धी न्यपातय़त् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
धृतराष्ट्र उवाच
तस्मिन्द्विजवरे राजन्वत्स्याम्यहमनिन्दितम् |
४७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६२
विदुर उवाच
तस्मिन्द्वौ शकुनौ वद्धौ युगपत्समपौरुषौ |
७ क
सभा पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्धर्मविदां श्रेष्ठो धर्मराजस्य धीमतः |
२१ क