chevron_left  तस्मात्तेऽहंarrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय १८३
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्मात्तेऽहं प्रदास्यामि विविधं वसु भूरि च ||
२९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १४८
शौनक उवाच
तस्मात्तेऽहं प्रवक्ष्यामि धर्ममावृत्तचेतसे |
१ क
वन पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मात्त्यक्ष्यन्ति सङ्ग्रामे प्राणानपि सुदुस्त्यजान् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९
युधिष्ठिर उवाच
तस्मात्त्यागः प्रधानेष्टः स तु दुःखः प्रवेदितुम् ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
शुनःसख उवाच
तस्मात्त्रिदण्डाभिहता गच्छ भस्मेति माचिरम् ||
४७ ख
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मात्त्वं किल्विषादस्माच्छूद्रय़ोनौ जनिष्यसि ||
८० ख
वन पर्व
अध्याय २७६
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्मात्त्वं कुरुशार्दूल मा शुचो भरतर्षभ |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मात्त्वं जीव मे वत्स सुसुखी शरदां शतम् ||
६३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २५
दुर्योधन उवाच
तस्मात्त्वं पुरुषव्याघ्र निय़च्छ तुरगान्युधि ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
तस्मात्त्वं पुरुषव्याघ्र प्रकर्षेथा महाचमूम् ||
३० ग
विराट पर्व
अध्याय ५३
अर्जुन उवाच
तस्मात्त्वं प्रापय़ाचार्यं क्षिप्रमुत्तर वाहय़ ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९६
भीष्म उवाच
तस्मात्त्वं विरजाश्चैव वितमस्कश्च पार्थिव ||
५० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
तस्मात्त्वं वै महावाहो मम पार्थस्य चोभय़ोः |
११० क
शान्ति पर्व
अध्याय २९३
वसिष्ठ उवाच
तस्मात्त्वं शृणु राजेन्द्र यथैतदनुदृश्यते |
२९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३०
अलर्क उवाच
तस्मात्त्वचं पाटय़िष्ये विविधैः कङ्कपत्रिभिः ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय १६६
गन्धर्व उवाच
तस्मात्त्वत्तः प्रवर्तिष्ये खादितुं मानुषानहम् ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय १२१
लोमश उवाच
तस्मात्त्वमत्र राजेन्द्र भ्रातृभिः सहितोऽनघ |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय १६६
गन्धर्व उवाच
तस्मात्त्वमद्य प्रभृति पुरुषादो भविष्यसि ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय २४७
व्यास उवाच
तस्मात्त्वमपि कौन्तेय़ न शोकं कर्तुमर्हसि |
४४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३२
नारद उवाच
तस्मात्त्वमपि कौन्तेय़ पितृदेवद्विजातिथीन् |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
भीष्म उवाच
तस्मात्त्वमपि कौन्तेय़ भक्त्या परमय़ा युतः |
१०३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
तस्मात्त्वमपि कौन्तेय़ रथात्तूर्णमपाक्रम ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२१
नारद उवाच
तस्मात्त्वमपि गान्धारे मानं क्रोधं च वर्जय़ |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १३
वासुदेव उवाच
तस्मात्त्वमपि तं कामं यज्ञैर्विविधदक्षिणैः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११
शकुनिरु उवाच
तस्मात्त्वमपि दुर्धर्ष धैर्यमालम्व्य शाश्वतम् |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय १७३
गन्धर्व उवाच
तस्मात्त्वमपि दुर्वुद्धे मच्छापपरिविक्षतः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय १७१
वसिष्ठ उवाच
तस्मात्त्वमपि भद्रं ते न लोकान्हन्तुमर्हसि |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३२
नारद उवाच
तस्मात्त्वमपि वार्ष्णेय़ द्विजान्पूजय़ नित्यदा |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
भीष्म उवाच
तस्मात्त्वमपि विप्रेभ्यः प्रय़च्छ कनकं वहु |
७० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १
सर्प उवाच
तस्मात्त्वमस्मिन्हेतौ मे वाच्यो हेतुर्विशेषतः ||
३८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
तस्मात्त्वमस्य पापस्य कर्मणः फलमाप्नुहि |
१० क
वन पर्व
अध्याय २१८
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्मात्त्वमस्या विधिवत्पाणिं मन्त्रपुरस्कृतम् |
४५ क
भीष्म पर्व
अध्याय २५
श्रीभगवानु उवाच
तस्मात्त्वमिन्द्रिय़ाण्यादौ निय़म्य भरतर्षभ |
४१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३३
श्रीभगवानु उवाच
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व; जित्वा शत्रून्भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् |
३३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मात्त्वमेनां धर्मज्ञे समनुज्ञातुमर्हसि ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३१
युधिष्ठिर उवाच
तस्मात्त्वमेव राधेय़ं भीमसेनः सुय़ोधनम् |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८४
भीष्म उवाच
तस्मात्त्वमेवं प्रणय़ेः सदैव; मन्त्रं प्रजासङ्ग्रहणे समर्थम् ||
५२ ख
वन पर्व
अध्याय १००
लोमश उवाच
तस्मात्त्वां देव देवेश लोकार्थं ज्ञापय़ामहे |
२४ क
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मात्त्वां पूर्वमेवाहं नेष्यामि यमसादनम् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय १८५
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्मात्त्वां वोधय़ाम्यद्य यत्ते हितमनुत्तमम् ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय १२०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मात्तय़ोर्नाम चक्रे तदेव स महीपतिः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७५
भीष्म उवाच
तस्मात्पद्मात्समभवद्व्रह्मा वेदमय़ो निधिः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२१
युधिष्ठिर उवाच
तस्मात्परतरं यच्च तन्मे व्रूहि पितामह ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मात्परतरो योऽसौ क्षेत्रज्ञ इति कल्पितः |
६७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
तस्मात्परिग्रहे भूमेर्यतन्ते कुरुपाण्डवाः |
७३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
तस्मात्परिवृते दद्यात्तिलांश्चान्ववकीरय़ेत् ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५७
सञ्जय़ उवाच
तस्मात्पर्णानि शाखाश्च स्कन्धं चोत्सृज्य सूतज |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १००
भीष्म उवाच
तस्मात्पलाय़मानानां कुर्यान्नात्यनुसारणम् ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९७
नारद उवाच
तस्मात्पातालमित्येतत्ख्याय़ते पुरमुत्तमम् ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६६
भीष्म उवाच
तस्मात्पानीय़दानाद्वै न परं विद्यते क्वचित् |
१६ क