chevron_left  तच्चarrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय १८५
मार्कण्डेय़ उवाच
तच्च नौवन्धनं नाम शृङ्गं हिमवतः परम् |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
तच्च पश्यामि तत्त्वेन यत्ते रूपं सनातनम् ||
५८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
तच्च पश्यामि तत्त्वेन यत्ते रूपं सनातनम् |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
तच्च पाशुपतं घोरं प्रतिज्ञाय़ाश्च पारणम् ||
७९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
तच्च भर्त्रा धनं दत्तं नादत्तं भोक्तुमर्हति ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५१
धृतराष्ट्र उवाच
तच्च मन्दा न जानन्ति दुर्योधनवशानुगाः ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०
धृतराष्ट्र उवाच
तच्च मर्षितवाञ्शक्रो जानंस्तस्य पराक्रमम् |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६८
सञ्जय़ उवाच
तच्च मे कृन्तते मर्म यन्न तस्य शिरो मय़ा |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
तच्च मे नाकरोद्वाक्यं त्वदर्थे मधुसूदनः |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८२
भीष्म उवाच
तच्च मे शृणु कार्त्स्न्येन वदतो वलसूदन ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६२
नारद उवाच
तच्च मेघगतं वारि शक्रो वर्षति भारत ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय ५४
सूत उवाच
तच्च युद्धं कथं वृत्तं भूतान्तकरणं महत् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
तच्च राजन्नपश्यन्त्याः का शान्तिर्हृदय़स्य मे ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
तच्च राजन्नपश्यन्त्याः का शान्तिर्हृदय़स्य मे ||
१६ ग
आदि पर्व
अध्याय १९७
विदुर उवाच
तच्च राधासुतः कर्णो मन्यते न हितं तव ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय १२८
लोमश उवाच
तच्च लक्षणमस्यासीत्सौवर्णं पार्श्व उत्तरे |
८ क
वन पर्व
अध्याय ६७
वृहदश्व उवाच
तच्च वाक्यं तथा सर्वे तत्र तत्र विशां पते |
२२ क
स्त्री पर्व
अध्याय १
धृतराष्ट्र उवाच
तच्च वाक्यमकृत्वाहं भृशं तप्यामि दुर्मतिः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय १९०
वैशम्पाय़न उवाच
तच्च विवेश ||
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
तच्च विश्वेश्वरस्थानं यत्र तद्विमलं सरः ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
तच्च शुश्रूषितं सर्वं वरदानं च भारत ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
तच्च शूलं विनिर्धूतं हुङ्कारेण महात्मना |
४६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः |
७७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६६
भीष्म उवाच
तच्च सर्वं नरव्याघ्र पानीय़ात्सम्प्रवर्तते ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
तच्च सर्वं यथाभूतं भविष्यति वरानने |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
तच्च सर्वं यथावृत्तमनुसस्मार पाण्डवः ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय ३९
सूत उवाच
तच्च सर्वं स राजेन्द्रः प्रतिजग्राह वीर्यवान् |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
तच्च सर्वं सवैय़ाख्यं प्राप्तवान्कुरुसत्तमः ||
१० ख
सभा पर्व
अध्याय ४३
दुर्योधन उवाच
तच्च सर्वमतिक्रम्य स वृद्धोऽप्स्विव पङ्कजम् ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३४
कुन्त्यु उवाच
तच्चकार तथा सर्वं यथावदनुशासनम् ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
तच्चक्रं भृशमुद्विग्नाः सञ्चिच्छिदुरनेकधा |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय ६१
सञ्जय़ उवाच
तच्चाकरोत्तथा वीरः पाण्डुपुत्रो धनञ्जय़ः ||
१० ख
मौसल पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
तच्चाग्निदत्तं कृष्णस्य वज्रनाभमय़स्मय़म् |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
तच्चाचष्ट वहु व्यासो मरुत्तस्य धनं नृपाः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
तच्चान्तरममोघेषौ त्वय़ि तेन समाहितम् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९४
वसिष्ठ उवाच
तच्चापि द्विविधं ध्यानमाहुर्वेदविदो जनाः ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
तच्चापि नाकरोद्वाक्यं श्रुत्वा कृष्ण सुय़ोधनः |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
तच्चापि नासौ कृतवान्वीतवुद्धिः सुय़ोधनः ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय ११९
वैशम्पाय़न उवाच
तच्चापि भुक्त्वाजरय़दविकारो वृकोदरः ||
४० ख
उद्योग पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
तच्चापि वाक्यं परिनिन्द्य तस्य; समाददे वाक्यमिदं समन्युः ||
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
तच्चापि शल्यस्य निशम्य कर्म; महात्मनो भागमथावशिष्टम् |
३७ क
वन पर्व
अध्याय ११२
ऋश्यशृङ्ग उवाच
तच्चापि हत्वा परिवर्ततेऽसौ; वातेरितो वृक्ष इवावघूर्णः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
तच्चाप्यतीत्य नृपतिरुत्तमाश्रमसंय़ुतम् |
३ क
वन पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
तच्चाप्यपहरिष्यामि सव्यसाचाविहागते ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय २८४
जनमेजय़ उवाच
तच्चाप्यपहरिष्यामि सव्यसाचाविहागते ||
२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
तच्चाप्यप्रिय़मस्माकं पुत्रस्ते समुपाचरत् |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
तच्चाप्युपस्पृश्य वलः सरस्वत्यां महावलः |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८७
भीष्म उवाच
तच्चामिषेण विधिना विधिः प्रथमकल्पितः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७६
भृगुरु उवाच
तच्चाम्भसा पूर्यमाणं सशव्दं कुरुतेऽनिलः ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
तच्चावहसनं प्राप्य सभारोहणदर्शने ||
९९ ख